
Understanding Sakshi Bhav or Non-Judgmental Awareness
by Raman Mittal
In this talk, Raman explains Sakshi Bhav, or non-judgmental awareness, a key quality of meditation. In your practice, it allows you to witness your thoughts, emotions, and sensations with gentle awareness without judgment, resistance, or attachment. It helps the mind settle naturally and deepen focus and insight. Beyond meditation, Sakshi Bhav/non-judgmental awareness nurtures emotional balance, conscious responses, and freedom from an overactive mind, allowing you to navigate daily life with greater clarity, calm and presence.
Transcript
Namaste.
अक्सर लोग पूछते हैं साक्षी भाव का क्या अर्थ होता है। साक्षी भावकार्थ होता है बस देखना दूर से बैठ कर दिखना कोमल आखों से,
निर्मल आखों से,
जो जैसा है उसको पूर्णते देखना। साक्षी भाव का मतलब होता है,
ना राग,
ना द्वेश.
जो भी अनुभव मेरी चेतना में उभर कर आ रहा है उसको पूरता देखना बिना बदलने की इच्छा के बिना बदलने की कोशिश के ये कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी ध्यान की विधी में अभ्यास में अगर साक्षिभाव नहीं है तो शायद आप किवल एक ritual कर रहे हैं,
एक अनुष्ठान कर रहे हैं,
एक करम कांड कर रहे हैं शायद वो आपको गहराईयों में ना लेके जा पाए साक्षी भाव क्यों जरूरी है?
हम ध्यान के अभ्यास में अपने जीवन में भी अलग-अलग अनुभव मैसूस करते रहते हैं। कभी विचार होते हैं,
कभी भावनाएं होती हैं,
कभी आसपा से आते हुई आवाजें होती हैं,
शरीर में होने वाली संवेदनाएं होती हैं,
श्वास की सम्वेदना होती है और हम अकसर अपनी अनुभवों में उल्लत जाते हैं। अक्सर अपने अनुभवों से या तो असकती बना लेते हैं या उनका विरूद करने लगते हैं। अब मान लिजी विचार हैं.
और एक चाहत है के विचार ना हो,
एक शांती हो,
वो विचार मुझे खलते हैं अगर मैं उनका विरोध करने लग गया,
तो इसका मतलब देशा के मैं जब तक अपने विचारों से लड़ता रहूँगा तब तक मैं राग और दुईश से परे एक घहरी शांती को कभी भी अनुबल नहीं कर सकता। दो स्रीचीज जब मैं अपने विचारों को दूर से बैठ कर देखता हूँ,
तो उनके पीछे के छुपी कहाने को देख पाता हूँ,
और ये कहाने ही होती है,
जो मुझे फसा कर रखती है,
ये कहाने ही होती है,
जो मुझे डर देती है,
और जब तक मैं उसे दूर से बैठ कर देखूंगा नही जाने कैसे दूँगा?
मैं उसके पार कैसे जाऊंगा?
पीस्रीचीस.
हमारे अंदर कुछ है जो सदैव है,
जो हमेशा निर्मल आखों से देखता है बसको हम द्रश्टा बोलते हैं और साक्षी भाव द्रश्टा की एक्वालिटी होती है जब मैं दूर से बैटकर अपने सारे अनुभवों को महसूस करता हूं,
देखता हूं,
जानता हूं,
तो मैं उस द्रश्टा के दर्शन भी कर पाता हूं। उससे पहले वो द्रश्टा विचारों में,
अनुभवों में,
भावनाओं में उल्जा रहता है,
छिपा हुआ रहता है। और जब मुझे उस द्रश्टा की अनुभूती होती है,
तो ये बहुत मुक्ती देता है,
बहुत बड़ी मुक्ती देता है,
मैं जान पाता हूँ कि अनुभव अलग हैं और मैं अलग हूँ अनुभव अलग हैं और द्रश्टा अलग है विचार अलद हैं और द्रश्टा अलद अरूस। जागरिती में उस देखने में उस experience में घेंच शान्ती भी छुपी हुई होती है मैं आपको एक example से समझाता हूँ माननी जिये हम ध्यान का बिहास कर रहे हैं हम श्वास पर सजक्ता का भ्यास कर रहे हैं और मेरा ध्यान बार-बार उन विचारों में खो जाता है जो कि पिछली शाम की पार्टी के बारे में हैं मेरा ध्यान बहुत सारे विचारों से घिर जाता है अब क्या किया जाए। अविचार तो हैं अब बजाए किस बात का विरूद करने के की विचार क्यूं है?
क्या मैं इस बात के प्रती साक्षी भाव बना सकता हूं,
मूश बना सकता हूं के हाविचार हैं। अगर मेरे अंदर कोई कुछ है जो उनका विरूद करता है तो क्या मैं उसके प्रती भी साक्षिभा बना सकता हूं। क्या मैं जान सकता हूँ कि मेरे अंदर कोई एक चीज है जो इन विचारों का विरोध कर रही है। जो चाहती है कि विचार ना हूँ,
ये अनुभव ना हूँ। तो हम उसके प्रती साक्षी भाव बना सकते हैं। तो जैसे जैसे मैं साक्षी भाव में स्थित होता हूँ मैं उन कहानियों को देख पाता हूँ गहरी शांती का नुभव कर पाता हूँ उस द्रश्टा को जान पाता हूं उसकी अनुभूती हुपाती है मेरी प्रार्टना है कि आपके जीवन में,
आपके अभ्यास में,
होश हो,
साक्षी भाव हो.
जागरिती हो,
द्रश्टा हो.
ये सारे अनुभव आपकी अभ्यास में आपके जीवन में प्रकट हो नमस्ते
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