नमस्ते मेरा नाम रमन है आज हम ओपन अवेरनेस यानि की मुग्ग जागरती के साथ विपश्णा ध्यान का अभ्यास करेंगे विपश्णा का मतलब है सपश्रूप से देखना जैसा है उसे वैसा ही देखना हम अपने ध्यान अभ्यास में यज समान्य जीवन में अपने शरीर को पांच इंद्रियों सपर्श स्वाध गंध,
ध्वनी और द्रिश्टी के माध्यम से अनुभव करते हैं हम अपने मन को अपने विचारों और भावनाओं के तल पर अनुभव करते हैं हम इन सब ही अनुभवों को हम एक द्रिश्टा के रूप में स्थापित होंगे और अपनी चेतना को एक अनुभव से दूसरे अनुभव पर जाने के अनुमति देंगे जो भी अनुभव इस शण में सबसे प्रबल और स्पश्ठ है हो सकता है आप एक पल में कुजली,
दबाव,
गर्मी,
हलकापन,
भारीपन,
जुनजुनी,
गुदकुदी या दर्द जैसे शारीरिक सम्वेदनाओं का अनुभव करें उसे साक्षी भाव से देखते रहें हो सकता है अगले पल में आप किसी विचारों का अनुभव करें उन्हें होने दे और साक्षी भाव से देखते रहें फिर हो सकता है कि कोई आसपास की ध्वनी आपका ध्याना करशित करे उस ध्वनी को पूरी जागरुक्ता और साक्षी भाव से सुने फिर हो सकता है कि श्वास की सम्वेदना सबसे प्रवल हो जाए फिर श्वास पर सजगता बना लें फिर हो सकता है कि आपको क्रोद,
चिन्ता,
अभार या प्रेम के अनुभूती हो जो भी अनुभव आपकी जागरुक्ता में आता है उसे पूरी सजगता और साक्षी भाव से देखते रहें बिना किसी आसक्ती या प्रतिरोद के किसी भी अनुभव को बदलना नहीं है ऐसा भी होगा कि हर थोड़ी देर में आविचारों में खो जाएंगे और ये पूरी तरहें से समन्य बात है जब भी आपको हिसास हो कि आविचारों में खो गए है फिर से एक द्रश्टा की स्थिती ले और उस शन में हुने वाले अनुभव के प्रति जागरुख हो जाएं तो आए एक अरामदायक जगे डून कर ध्यान की स्थिती में बैठ जाएं आप कुर्सी पर ये कुशन पर ये योगा मैट पर बैठ कर ये अभ्यास कर सकते हैं अगर आप कुर्सी पर बैठे हैं तो अपने पहरों को अरामसे जमीन पर ठिका कर रखें हाद गुटनों पर ये आपकी गोधी में हूं अगर आपने अपनी आखें बंद नहीं की हैं तो उन्हें बंद कर लें अपनी पीट को अरामदायक स्थिती में रखें सेर,
गर्दन,
वो रीड की हड़े एक सीधी रेखा में हो सतर्क लिकिन अरामदायक अब अपने माथे को धीला छोड़ दें अपनी आखों को नरम और कोमल कर लें गाल और जबड़ी एक दम नरम,
सहच अपने शरीर को एक दम धीला छोड़ दें अरामदायक स्थिती में अब अपने मन में संकल्प लें कि आप ध्यान के अंतक स्थिर बैठेंगे ध्यान के अभ्यास के दोरान अगर फिर भी अपने शरीर के किसी हिस्से को हिलाना है तो इसे बहुत धीरे और पूरी जागरुपता के साथ करें अब अपना ध्यान अपने आसपास से आने वाली ध्वनियों पर ले कर आए अब दूर से आने वाली ध्वनियों पर अपना ध्यान केंडरित करें पूरी सजगता से अलग-अलग ध्वनियों को सुनते रहें अब अपना ध्यान अपनी श्वास पर लाए अपनी श्वास की प्राकृतिक लै को महसूस करें श्वास आ रही है,
श्वास आ रही है अब अपनी जागरूपता को अपनी शरीर पर ले कर आए और इस शण में उपस्थित विबिन्द समवेदनाओं को साक्षी भाव से देखें क्या आपको अपनी शरीर में कहीं पर दबाव,
गर्मी,
ठंडक,
जुनजुनी,
कुदगुदी,
जलन,
दर्द,
असुविदा,
हलकापन या भारीपन महसूस हो रहे है इन समवेदनाओं को बिना किसी आसक्ती या प्रतिरोद के दूर से बैट के देखते रहे हैं अब अपनी जागरकुता को अपनी विचारों पर लाएं आपके मन में किस तरहें के विचार आ रहे हैं बस उनके प्रति जागरुक रहें उन्हें दूर भगाने की कुशिश ना करें अपने विचारों के पैटन को नोटिस करें जैसे के हाल-फिलाल या पुराने अतीत की कोई यादें या भविशे की ओजना या कोई कालपनिक बातचीत अब अपने शरीर को स्कैन करें और देखें की कोई प्रबल भावना है जैसे के गुस्सा,
अपरादबूद,
डर,
उदासी,
जलन,
चिंता किसी सुखत भावना से आसक्ती ना करें और किसी आपरिय भावना का विरोध ना करें बस साक्षी भाव से देखते रहें अब हम अपनी चेतना को मुख छोड़ देंगे जो भी अनुभव इस शन में सबसे प्रबल और स्पश लगता है उसे पूरी सजगता से देखते रहेंगे अपनी जागरुपता को एक अनुभव से दूसरे अनुभव पर जाने की अनुमती दें बस देखते रहें,
जानते रहें जो भी इस शन में सबसे प्रमुक है चाहे वो अपकी श्वास है,
ध्वनी है,
स्वाध है,
शरीर में समवेदनाएं हैं या कोई विचार या कोई भावना जो भी सबसे प्रमल है उसे साक्षी भाव से देखते रहें अपनी सजगता उज जागरिती बनाए रखें,
साक्षी भाव बनाए रखें बिना किसी धारणा के देखते रहें,
जिग्ग्यासा से देखते रहें अगर ये एक समवेदना है तो जाने कि ये कहां और कैसे महसूस हो रही है अगर ये एक विचार है तो जाने कि ये अतीत या भविशे के बारे में एक विचार है अगर कोई भावना है तो जाने के एक भावना है और आप उस भावना को नाम भी दे सकते हैं जब भी आपको ऐसास हो कि आप विचारों में भटक गए हैं तो बस जानना है कि आप भटक गए थे और बिना किसी चिट-चिडा हट के वापिस से द्रश्टा की स्थेति गरहन करें हर अनुभव को आने दें,
होने दें और जाने दें आप बस द्रश्टा बन कर पूरे ध्यान से हर अनुभव को देख रहे हैं,
जान रहे हैं ध्यान दें कि हर अनुभव आता है,
कुछ समय के लिए रहता है और फिर चला जाता है चहे सुखध हो या दुखध,
इसी को अनिच्चा कहा जाता है जिसका मतलब होता है इम्परमनेंस या फिर जो बदलता रहता है भगवान बुद्ध ने कहा है कि अनिच्चा को सपश्ट दर्शन हमें दुखों के पार ले जाता है जिग्यासा से देखते रहें,
दर्द है तो कहां है,
कैसा है,
खुजली है तो कैसी लगती है पूरे ध्यान से हर अनुभव को जानना है बिना उसे बदलने की कुशिश किए आप देखेंगी कि हर अनुभव बदलता रहता है,
बस देखने वाला द्रश्टा कभी नहीं बदलता अब हम कुछ समय मोन में बैटते हुए इस जागरिती और शांती का अनन्द लेंगे अपने भीतर की शांती को महसूस करें महसूस करें अपने होने के हिसास को क्या आप इस जागरिती के परती भी जागरुख हो सकते हैं?
क्या आप अपने अंदर के द्रश्टा के परती जागरुख हो सकते हैं?
जो हमेशा होता है बहुत ध्यान से देखें और जाचें कि क्या इस द्रश्टा का,
इस चेतना का कोई अकार या रूप है?
क्या ये आपकी होनी के हैसास से अलग है?
अब इस अभ्यास को समाप्त करने से पहले अपके लिए हूमवर्क है अब जब भी वाश्रुम चाएं तो उस शण में सबसे प्रबल अनुभव को नोटिस करें बिन उसे बदलने की कोशिश किये ना ही उसे अच्छा बुरा कहे बस देखें कि आपकी चेतना में क्या उबहर रहा है अब यदि आप वापिस आना चाहते हैं तो अपने पाऊं की उंगलियों को धेरे से हिलाएं अपने कंधों को कानों की तरफ खीचें अपनी हथेलियों को नमस्ते की मुद्रा में एक साथ लाएं और आपस में रगडें अपनी हथेलियों की गर्माहट को अपनी आखों पर महसूस करें और धीरे से सहजता से अपनी आखें खोलें मेरे साथ ध्यान करने के लिए आपका कूटी कूटी धन्यवाद आपका दिन बहुत बहुत शुब हो नमस्ते