प्रणाम साधक मुद्रित मन साधक आज हम यात्रा में विशुद्धी चक्र पर सारा ध्यान केंद्रित करते हैं विशुद्धी चक्र अमारे गर्दन में यहां से लेके पीछे रीड की हडी तक विशुद्धी चक्र में जब हम उसको उर्जा से बर्कूर कर देते हैं और वो वहां पे एक सोला दल का कमल खिल जाता है तो हमारी वाणी और मधर हो जाती है हम अपने बोलने की शक्ति में और भी ज़्यादा दैविय शक्तियों का मिश्रण कर लेते हैं विशुद्धी चक्र अगर हम कुंडालनी शक्ति की प्रक्रिया से चले तो ये नीले रंका एक कमल होता है यहाँ पे जिसकी सोला पंक्रिया होती है और इसका बीज मंत्र हाँ होता है मैं इतना पलिफाइड नहीं हूँ कि मैं वो चीज आपके साथ शेर कर सकता हूँ लेकिन इस चक्र में अगर हम अपनी ही कल्पना से उर्जा पुंज को लेके आए तो इस चक्र को भी हम फूर्णा से भर सकते हैं आज की यत्रा शुरू करते हैं मन को मुद्रित कर ले और बाया हाथ दाईना हाथ और प्राम से इसको गोद में अपनी नाभी के पास रखे साधक लंबा सा सास ले जैसे कल हमने किया था पूरी छेव प्रक्रिया से लंबा सा सास ले पहला चरण नासिका,
दूस्रा चरण मोड,
तीस्रा चरण गला,
चोथा चरण रीड की घड़िया,
कॉलर बोंस चोथा चरण,
पाँच्वा चरण हमारी रिब केज की एकस्पेंशन आगे,
पीछे और सामने और उसके बाद छटा चरण हमारी नागी का पीछे खिच के हमारी रीड की घड़ी को चूना,
इसका हमने प्रयास कल किया था,
तो आईए हम आज विशुद्धी चक्र के लिए अपना आसन और अपने शरीर को स्थेर करते हुए,
श्वासों को स्थेर करते हुए,
ओम के उच चारण को करते हुए,
अपने विशुद्धी चक्र में उर्जा को अवतरित करें। आज हम शुरू करते हैं। आखें दीरे दीरे बन,
लंबा सा सांस लें,
सांस छोड़ दें,
लंबा सा सांस लें,
सांस अंदर तक नाभी पे,
नाभी को पीछे पीठ को चूता हुआ,
अंद गर्धे की नसे धीली,
धीली,
धीली,
गर्धन की नसे धीली,
धीली,
धीली,
कनपटियों की नसे धीली,
धीली,
धीली,
पूरा मस्तक शान,
शान,
शान,
पूरा मस्तक शान,
शान,
शान,
दोनों भुजाएं धीली,
धीली,
धीली,
कोहनियों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
कलाईयों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
पूरी पीठ शान,
शान,
शान,
पूरे दोनों धीले,
धीले,
धीले,
जंगाएं धीली,
धीली,
धीली,
गुटनों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
पीडियों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
पैरों के सारे जोड धीले,
धीले,
धीले,
पूरा शरीर स्थे,
पूरा शरीर शान,
अंदर साधक सजव,
अंदर साधक सावधान,
अंदर साधक उपरस्थे,
पूरा शरीर स्थे और शान,
साधक अपना सारा ध्यान अपनी श्वासों पर लेके आए,
इधर उधर से भटकता ध्यान,
बाहर की ध्वनियों पे किंद्रत ध्यान,
एक विचार से दूसरे विचार पे भटकता ध्यान,
उसको धीरे धीरे अंदर समेट ले और अपना पूरा ध्यान अपनी श्वासों पर कर ले,
श्वास हलके हलके हलके,
श्वास धीमे धीमे धीमे,
बाईनासिका से अंदर जाता श्वास धीमा धीमा धीमा,
चोटा श्वास धीमा धीमा धीमा,
केवल नाभी से अंदर नाभी को थोड़ा सा अंदर को खीचते हुए श्वास को बाहर निकाले,
बहुत ही हलका श्वास बाहर,
और नाभी को हलके से छोड़ दे,
जिस से के हमारे फेफरों में थोड़ी सी हवा आजा,
हमारा श्वास हलका धीमा धीमा धीमा,
नाभी को धीरे से अंदर को खीचे,
धीरे से अंदर को खीचे,
और नाभी को छोड़ दे,
हमारे पेफ़डे भी बाहर को नहीं जादा पढ़ रहे,
और हमारे कोई भी और शरीर का मसल जो है वो इसमें एक्शन नहीं कर रहा है,
एक्शन सिरफ हमारी नाभी पे है,
नाभी को धीरे से अंदर करे,
नाभी को धीरे से बाहर करे,
नाभी को धीरे से अंदर करके उसको छोड़ दे,
वो स्वध है,
बाहर को अपनी जगा पे पहु� श्वासों की लय बहुत ही धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
धीमी,
� जादा वेग की जरृत नहीं है,
वो हमारी नासिका के अद्रभाग से एक या दो उंड्ली तक जाएगा,
और उसके बाद वो पूरे वाटावरण में विलीज़ हो जाएगा। अलका श्वास,
धीमा श्वास,
सहज श्वास,
अलका श्वास,
धीमा श्वास,
सहज श्वास,
अपने सभी विचार शान,
शान,
शान,
विचारों से सारी उर्जा को समेट लें और उस उर्जा को अपने शरीर के पोशन में लगाएं,
सभी विचार शान,
सभी कल्पनाएं शान,
सभी समस्याओं का समाधान करने में जो मांसिक उर्जा लगती है उस समाधान को वही छोड़ दें और मांसिक उर्जा को अंदर को कर लें,
अपनी मांसिक उर्जा अपने मस्तिश्क के मद्यभाग में लेके आएं और वहां पे जो अनन्द का जर्णा फूट रहा है उस अनन्द के जर्णे में उस उर्जा को लगा दें,
अनन्द का जर्णा और भी ज़ादा वेग से फूट रहा है,
और भी ज़ादा वेग से फू� अपने आज के इस पल से खीच के अपनी स्मृति में पिछले किसी एक्शन पे ले जाती हैं या कोई चलचेतर सा हमारे मानस पटल पे चलाती हैं,
वो सभी स्मृतियां शान,
शान,
शान उन स्मृतियों में जितना भी विश है,
वो हमारे आनंद के जर्णे से साप हो जाता है,
और वो सारी स्मृतियां एक उर्जा पुझ बनके उसको हम अपने मस्तिष के पिछले भाग में खीच लेते हैं,
वहाँ सय्यम का अपार भंडा है,
वो सय्यम हमारे रक्त में खुल जा और पूरा शरीर पोशित हो जाता है,
सादक मनुभव करें,
अनुभव,
अनुभव करें के शरीर का पोशिन हो रहा है,
संशे को छोड़ दें विल्कुल,
कोई संशे को करने की कोई भी अवश्यक्ता नहीं है,
संशे से केवल हमारी उर्जा जो है,
वो खलित होगी,
और कुछ नहीं होगा,
सारा,
सारा ध्यान इसमें लगा दें,
के हमारी जितनी भी कल्पनाओं की उर्जा है,
जो हमारे रक्त में,
उसका उर्जा कोई सम्मिलित हो गया है,
वो पूरे शरीर को पोशित कर रहा है,
पूरा शरीर पोशित हो रहा है,
शरीर स्थेर है,
श्वास नियंतरित है और मन शांत,
एकड़म शांत,
शांत,
शांत,
शांत साधक,
ओम का उचारण शुरू करेंगे,
ओम का उचारण,
अपने ब्रह्मरंद्र से खीचके,
उसको केवल अपने गले में लेके आना है,
गले से नीचे नहीं लेके जाना है,
गले में लेके आना है और कल्पना करनी है कि वहाँ के एक नीले रंग का जूति पुंज प्रजलित होना शुरू हो गया,
अपनी गती से,
अपने लहे से,
अपनी शरीर की स्थिती से और हम ओम का उचारण शुरू करते हैं,
एक ओम का उचारण शुरू करेंगे,
लंबा सा सास खीचें और दूसरा ओम का उचारण शुरू करेंगे,
आपकी गती और मेरी गती में मेल नहीं होगा,
लेकिन उस पे कोई ध्यान नहीं देना,
ध्यान अपना सारा रखना है,
अपने विशुद्धी चक्र पे,
यानि अपने गर्दन में के मद्ध में,
एक उर्जा पुंज,
जो नीले रंग का बनना शुरू हो जाएगा,
अर ओम के उचारण से वो और भी ज़्यादा प्रगाड हो जाएगा,
और भी ज़्यादा प्रगाड हो जाएगा,
और भी धनन हो जाएगा,
और भी प्रगाड हो जाएगा,
आईए,
शुरू करते हैं,
और ध्यान सादक अपने विशुद्धी चक्र पे,
और कल्पना में एक नीले रं� वहाँ पे पढ़ता जा रहा है,
अपना पूरा ध्यान अपने गर्दन पे कर ले,
पूरा ध्यान,
और जिस थान से हमारी आवाज निकल रही है,
आवाज की ध्यानी जहाँ उत्पन हो रही है,
उस जगा को टेटोल के वहाँ पे अपना ध्यान ले जाएगा,
अपना पूरा ध्यान अपनी गर्दन के विर्कुल मध्य में,
जहाँ पे जिसको वोकल कॉर्ड कहते हैं,
उस जगा पे अपना पूरा ध्यान के इंद्रित कर ले और साथक ये अनुभव करें के वहाँ पे एक मनी की भाथी ज्योती पुंच नीले रग का जगना शुरूप हो गया उरी गर्दन में एक जहाँ पे ध्यानी उत्पन होती है,
वहाँ पे एक नीले रग का उर्जा पुंच जगना शुरूप हो गया है वह उर्जा पुंच हमारी भाशा में जितनी भी उसमें हमारी भाशा को एकडम पवित्र कर देती है अपवित्रता हमारी भाशा से निकल जाती है ये नीला नीले रग का उर्जा पुंच हमारी भाशा को पवित्र कर देता है हमारे कंठ से कुछ भी अपवित्र नहीं निकलता,
अशुब नहीं निकलता,
अप्रियर नहीं निकलता जितने भी हमारी नकारात्मकता है,
उस सभी नकारात्मकतार को हमारे शरीर से बाहर प्रसारन नहीं करने देता,
यहीं जला देता है हमारा कंठ एक उर्जा का पुंच बन जाता है विशुद्धी चक्र कहा गया है,
शुद्धी से भी आगे,
विशुद्धी चक्र,
संपूर्ण तया शुद्ध,
शुद्ध और स्वच से आगे,
विशुद्धी चक्र हम अपने कंठ को और ज़्यादा अपनी सजजगता में ले आते हैं,
अभी तक हम अपने कंठ को कभी भी सजजगता में नहीं ले के आए थे,
कुछ भी बोलें,
तो बोलने से पहले एक मीले रंका उर्जा पुंच का अपतरन अपने कंठ में कर ले,
और उसके बाद बोलना श हमारे विचार शुद्ध हो जाएंगे,
जिन विचारों को हमारी वानी का अरोपन हुआ है,
उनमें कोई भी मलिंता या कलिंता नहीं रहेगी,
कोई भी कालिक नहीं रहेगी,
हमारे विचार अत्यंत शुद्ध हो जाएंगे,
हमारी भाषा बहुत मधर हो जाएंगी,
कोई भी अपशब्द नहीं बनेगा,
अपशब्द बनने से पहले ही ये नीले रंग का उर्जा पुझ उस अपशब्द को अपनी उर्जा में जला देगा.
सादक विशुद्धी चक्र में आखें खोल के जब हम अपने पूरी दिन चर्या का काम करेंगे और चलते चलते हर समय हम यही सजगता रखेंगे,
के हमारे विशुद्धी चक्र से हमारे कंठ से जो भी निकले वो पवित्र हो,
उस पे ना क्रोध का अरूडन हो,
ना उस पे ईर्शा हो,
ना लोब हो,
ना माया हो,
वो सभी नकारात्मक्ताएं हमारे कंठ में आके जल जाएंगे.
साधक धीरे धीरे शरीर बोत प्राप्त करें,
पैरों की उंग्लिया हिलाएं,
आथों की उंग्लिया हिलाएं,
और आथ भी खोनें.
साधक,
यह जगह है इस पूरे के इतम मध में,
जहां से हमारी पूरी भाषा निकलती है,
जो भी हम बोलते हैं अलग अलग भाषा में,
लेकिन हमारे मन के विचार है,
वो विचार जब भाषा में परिवर्तित होते हैं,
और परिवर्तित भाषा में जब वो ध्वनी में परि� करते हैं,
हम इसी जगा को पवित्र कर लेते हैं,
और ये पवित्र करने का हमारा प्रयास सारा दिन चलता रहते हैं,
इसमें अलग से बैटके इसको पवित्र करने की जरुत नहीं है,
तो जब भी हम किसी को कुछ भी बोलेंगे,
बोलने से पहले अगर हम अपने कंट पे अपन होगी हमारे स्वर्वजन इत्ताए,
बहुजन सुखाए,
यही बाते निकलेंगे,
और हमारा जीवन और हमारे रिलेशन्शिप्स बहुत ही उजगोटी पे चलेंगे.
तो सादक,
आज की यात्रा यहीं तक,
कल सुबह फेर मिलेंगे 7 बजे,
तब तक के लिए ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
दन्यवाद सादक.