प्रणाम साधक,
प्रणाम मुदेद मन,
आज हम अपनी यात्रा में उमंग के सागर में डूबेंगे,
आईये यात्रा शुरू करते हैं,
बाया हाथ,
दाहिना हाथ,
अंगुठे जोड के अराम से अपनी गोद में रख ले,
और मन को उच्छा और उमंग से पहले ही भर ले,
मन को मुदेद कर ले,
और धीरे धीरे अपनी आँखें बंद कर ले,
लंबा सा सास लेके छोड़े,
कंदे की नसे धीली धीली धीली,
गर्दन की नसे धीली धीली धीली,
कनपटियो की नसे धीली धीली धीली,
मस्तप की नसे धीली धीली धीली,
पूरा मस्तक शांत,
सिर्फ का सारा बोजा समा,
दोनों भुजाए धीली धीली धीली,
कोहनियों के जोड धीले धीले धीले,
कलाईयों के जोड धीले धीले धीले,
पूरी पीठ शांत शांत शांत,
दोनों कुले धीले धीले धीले,
जंगाएं धीली धीली धीली,
कुटनों के जोड धीले धीले धीले,
इडियों के जोड धीले धीले धीले,
पैरों के सारे जोड धीले धीले धीले,
पूरा शरीर स्थिर,
पूरा शरीर शांत,
अंदर साधक सजग,
अंदर साधक शांत,
अंदर साधक सावधार,
पूरे शरीर की स्थिरता का अनुभव करें,
अनुभव में और कुछ भी ना लेके आएं,
शरीर स्थिर,
कोई भी मांस पेशी में कोई भी तनाव नहीं है,
पूरा शरीर स्थिर,
पूरा शरीर स्थिर,
अपना सारा ध्यान बटोर के अपने श्वासों पे ले आए,
बिखरा ध्यान,
भटका ध्यान,
स्मृतियों में उल्जा हुआ ध्यान,
किसी ना किसी योजणा का हल निकालने में उल्जा हुआ ध्यान,
पूरे ध्यान को हर जगा से इकठा करके अपने श्वासों पे ले आए,
हलका श्वास,
धीमा श्वास,
मधूर श्वास,
बाइना सिका से अंदर जाता श्वास,
गले से फेफ़डों को भरता,
हलके हलके भरता श्वास,
और नीचे हमारी नाभी को अंदर से चूता श्वास,
हलका श्वास,
धीमा श्वास,
नाभी को चूता श्वास,
जैसे ही श्वास नाभी को चूता है,
पूरे शरीर में एक तरंग सी फैल जाती है,
पूरा शरीर विद्धित में हो जाता है,
पुलकित हो जाता है,
जगमग हो जाता है,
चमकने लगता है,
हलका श्वास,
धीमा श्वास,
चूता श्वास,
दो तीन चोटे श्वासों के बाद एक लंबे श्वास से अपने पूरे फेफ़डों में हवा बरे और उसको सहैजता से निकल ले दे,
सहैजता से निकला हुआ श्वास,
नासिका से एक या दो उंगली तक ही आगे जाएगा,
उसके बाद वो मुढ के उपर होके पूरे वातावरण में सहैजता से विलीन हो जाएगा,
और आप नया श्वास खीचेंगे,
उन श्वासों के साथ प्राण उर्जा भी अंदर आए� वो प्राण उर्जा हमारे नासिका,
बाई नासिका से अंदर होती हमारे फेफ़डों से होती हुई प्राण उर्जा हमारी नाभी को चुएगी,
नाभी को चुते ही हमारे कन,
कन में,
रोम,
रोम में प्रसारत हो जाएगी,
मीठा श्वास,
चोटा श्वास,
धीमा श्वास शरीर स्थेल,
श्वास नियंत्र,
मन में एक आनंद और उमंग का सागर उचल रहा है,
मस्तिश्क के सभी विचार शान्त,
शान्त,
शान्त,
सभी कल्पनाएं शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शा कल्पना में हम जिस भी समस्या का हल ढूढने की कोशिश कर रहे हैं,
उस समस्या से हमारा राग,
द्वेश,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
� समस्या को वातावरण में छोड़ देते हैं,
अपने आप सुलज जाएगी,
अपने आप सुलज जाएगी,
हम उसको अपनी मानसिक शक्ती का ऊर्जा प्रदान नहीं करते हैं,
हम अपनी उर्जा अपने अंदर ही समेट लेते हैं,
मेरे राग,
मेरे द्वेश,
मेरे ही अंदर हैं,
मैंने उन सब के उपर अपने आनंद का जर्णे,
अपना अनंद के जर्णे की बोच्चार कर दी हैं,
मेरी सभी कल्पनाएं शान्त,
शान्त,
शान्त,
मेरी सभी स्मृतियां शान्त,
जितनी भी पुरानी स्मृतियां अच्छी,
बुरी उठती हैं,
वो सभी शान्त,
और हम जो स्मृति जादा जोर लगा के उठती हैं,
और हम उस स्मृति को अपने मते के अगले भाग से खीच कर मध्यभाग में ले जाते हैं,
और उस स्मृति के उपर हम अनंद के जर्णे की बोच्चार करते हैं,
उसका सारा विष्ण धुल जाता है,
मिधुल जाता है,
वो स्वच्च हो जाती है,
पवित्र हो जाती है,
शुच हो जाती है,
वो स्मृति के अपार में हमारी स्मृति की उर्जा सम्मिलित हो जाती है,
और वो सम्मिलित सैयम हमारे पूरे रक्त में घुल जाता है,
रक्त से पूरे शरीर को पोशित कर देता है,
जो स्मृति की उर्जा हम व्यार्च व्याय करते थे,
वातावरण में प्रसारण करने में,
उसी स्मृति की उर्जा को हम सम्मिलित करके,
कठा करके,
सैयम से मिलाके,
अपने शरीर को पोशित करते है,
हमारी कल्पनाओं के राग द्वेश अंतर मुखी हो गए,
हमारी स्मृति की उर्जा भी अंतर मुखी हो के सैयम में मिल गई,
हमारे अंदर भूत पूर उर्जा का स्रोत्र बढ़ना शुरू हो गया,
गढ़ना शुरू हो गया,
सादक कल्पना करें,
सादक कल्पना करें के हम उसी जंगल की पुरानी पकडंडी पे चल रहे हैं,
जिसके दोनों तरफ फूल खिले हैं,
उनपे तितलिया उड़ रही हैं,
और मंद-मंद तुशार बह रही है,
उस तुशार,
वो तुशार का अनभव हम अपने मुख पे कर र हम चलते जा रहे हैं,
आगे जलाश्रे आता है,
जिसको हमने अमरित सरोवर बोला था,
उसका पानी उठाके हम अपने मस्तिश्क पे डालते हैं,
हमारी सभी क्रूद अगनिया शांत हो जाती हैं,
हम दाइने देखते हैं,
एक पुल है,
हम उसको पार करते हैं,
और गो म� तपोवन से नंधनवन,
नंधनवन की चड़ाई पे चड़ना शुरू कर देते हैं,
और जैसे उपर जाके देखते हैं,
तो आमने एक बहुत बड़ी सफेध बरफ से अच्छादित घाटी है,
कहीं कहीं कोई एक पक्थर निकल रहा है,
हम चलते चलते उस घाटी के मद्ध मे हमारे चारो तरफ ब्रह्म रिशीयों के सूक्ष्म शरीर हैं,
सभी ब्रह्म रिशीयों अपना हाथ उठाते हैं,
और अपना तेज हमारे ब्रह्मरंद्र पे इकत्रित करके उसको वहाँ पे डालते हैं,
हमारे ब्रह्मरंद्र से हमारे मस्तिश्क में ब्रह्म रिशीयों का तेज आता है,
और ब्रह्म रिशीयों का तेज उस परवतों की घाटी में से हर एक सैक्डो अनेको ब्रह्म रिशीयों का तेज हमारे ब्रह्मरंद्र में आता है,
साधक,
दोनों कलपनाएं साथ साथ करें,
हमारे ब्रह्मरंद्र से हमारे मस्तिश्क को प्रकाशित कर रही है,
हमारे मस्तिश्क में कोई भी अंधेरा नहीं है,
मस्तिश्क प्रकाशित है,
और बाहर पूरी ब्रह्म रिशीयों का तेज प्रकाशित है,
और हम देखते हैं ब्रह्म रिशीयों के पीछे सभी देवी देवताएं उन पहाडों के चारो तरफ हैं,
उन सभी अपना हात उठाके अपना अशीर्वाद हमको दे रहे हैं,
और वो हमारे ब्रह्मरंद्र पे आ रहा है,
और उस ब्रह्म देवताओं के रिशीयों के पीछे हम देखते हैं विराट रूप में विश्णो जी,
जो उन्होंने अर्चुन को विराट रूप दिकाया था,
उस विराट रूप का हमको एक छलक मिलती है,
और उस विराट रूप के पीछे निराकार परमपिता परमात्मा क एक उर्जा पुझ है,
वो उर्जा पुझ सीधा हमारे मस्तिश्क में आ रहा है,
हमारे ब्रह्मरंद्र से अंदर आ रहा है,
हमारा ब्रह्मरंद्र एकदम पवित्र शुचित और बहुत ही सौम्य हो गया है,
अंदकार मलंता और नकारात्मक्ता कतम हो गयी है,
कुछ भी हमारे मन में ऐसा नहीं है,
जिससे के तमस आए,
सारा तमस खतम हो गया है,
और इसी उर्जा,
सफेद उर्जा पुझ को हम नीचे खीच के लेके जाते हैं,
और अपने रुदे में ले आते हैं,
रुदे में आते ही ये उर्जा पुझ लाल रंका हो जाता है,
मस्तिश्क में सफेद रंका उर्जा पुझ,
रुदे में लाल रंका उर्जा पुझ,
हम उर्जा से ओत प्रोत हो जाते हैं,
और इसी उर्जा को हम धीरे धीरे नीचे अपनी रीड की हडी से डालते हैं,
जैसे किसी मिट्टी के तेल में भिगोई हुई रस्ची को उपर से आ जा रही है,
हम अनुभव कर रहे हैं कि उश्मता और उर्जा हमारी रीड की हडी में नीचे जाते जाते हमारी रीड की हडी के बिलकुल अंतिम भाग पे पहुँच गई है और वहाँ पे पहुँचते ही जो हमारे अंदर की अपार शक्ती सुप्त अवस्था में है,
वो जा गई है और एक दिवाली में चलाने हुए अनार की तरह अनर्जी का उर्जा का एक सोत्र चर्स करके हमारी पूरी रीड की हडी को प्रकाशित कर देता है उसका प्रकाश हम अपने कंदे से दोनों बाज्जूओं में ले आते हैं और वो प्रकाश हमारी दोनों हतेलियों के म� जलने लगता है साधक साधक कल्पना को और प्रगाड करें बहर ब्रह्म रिश्यों का तेज है मस्तिश के अंदर सफेद उर्जा पूझ है रिदे में लाल उर्जा पूझ है और दोनों हतेलियों में आग जल रही है दोनों हतेली के मद में उर्जा इतनी एकत्रित हो गई है के वहाँ पे आग जल रही है हम में उमंग और उच्छा भर गया है हम में उमंग और उच्छा भर गया है और इस भरे हुए उमंग और उच्छा की स्थिती में हमारे मन में कोई विकार नहीं आ रहा है कोई विकार नहीं आ रहा है कोई भी विकार नहीं आ रहा है हममंग हममंग और उच्छा के पूरे साधर में डूब गये है डूब गये है दोनों हतेलियों में हमारे उर्जा भर गयी है दोनों हतेलियां गरम हो गयी है दोनों हतेली में हम कल्पना कर सकते है के दोनों हतेलियों के मद में आग जल रही है अग जल रही है उठो पार्थ गाण्डी सम्हालो क्रिशन जी का ये ब्रह्मवाक्य हम अपने को देते हैं हम खुदी अपने क्रिशन जी बन जाते हैं और हम खुदी अपने अंदर के चुब्द अर्जुन को जो विशाद में डूबा हुआ है उसको हम बोलते हैं उठो पा पार्थ गाण्डी सम्हालो और उसकी प्रतिंचा को चड़ा के तीर को कान के पास लाके छोड़ दो कौर्वो की सेना पे सामने संशे और संदेख की कौर्वो की सेना है उसको परास्त कर दो अपने मन को जीत लो अपने मन को उमंग और उत्सा से भरके उठो पार्थ गाण् ये एक ब्रह्मवाक्य हम अपने आपको अभेशा देते हैं और एक अन्य वाक्य हम अपने आपको देते हैं के वीर भोग्यो वसंदरा जिसने संगर्श करके संग्राम करके इस यद में जीत पाई है वो ही इस वसंदरा का भोग करेगा वसंदरा का भोग सिरफ वीरों के दाइत में है वीरों का अधिकार है वसंदरा के भोग को प्राप्त करना वीर भोग्यो वसंदरा उठो पार्थ गाण् दीर संभालो ताकि वीर भोग्यो वसंदरा ये जो एक भूत पूर्व कल्पना और भाव हमारा प्रगाड हुआ है इसको हम और द्रेड़ भूवी कर लेते हैं ओम के उचारन से हम छोटे क्षंद कुछ थोड़ी देर के लिए ही ओम का उचारन करेंगे लेकिन मन में भाव होगा उठो पार्थ गाण् दीर संभालो वी भूग्यो वसंदरा ओम का उचारन करेंगे जितना लंबा हो सकता है पूरी शक्ती से खीच के करेंगे केवल पाच बार ओम का उचारन करेंगे आँ हम इसके उपर दुख का अरोपन कर लेते हैं हमारा अधिकार इस उर्जा पूर्ण स्थिती पर ही है हमारा आवरण और अरोपन जो हम इसके उपर कालिका से कर लेते हैं उसको उठा के ठेक दो और उठो पार्थ गाणी संभालो वीर भूग्यो वसंदरा सादक धीरे धीरे शरीर बोध प्राप्त करे पैरों की उंग्लिया हिलाए आथों की उंग्लिया हिलाए और धीरे धीरे आखे कोई उठो पार्थ गाणी संभालो उठो खीचो अपने कान तक प्रतेंचा को और छोड़ दो हर काम को शुरू करने से पहले बोलो उठो पार्थ गाणी संभालो और गनेशी का स्परंध करो और ब्रह्मवाक्य हमेशा ध्यान में रखो वीर भूग्यो वसंदरा जो वीर है वो ही इस वसंदरा के सभी रिसौर्सिस को भूग करने की क्षमता रखते हैं वीर भूग्यो वसंदरा उच्छा और उमंग से अपने पूरे शरीर को ओत प्रोत रखें अपनी इस आज की जो हमने अपनी अंदर की अपनी मनस्थिती का जो हमने अवलोकन किया है इसी मनस्थिती में सारा दिन बिताएं जहां भी अपने उच्छा में थोड़ी सी कमी लगे या आपको लगे के मेरा मन थोड़ा उचट रहा है या मैं काम करना बंद कर दू या आलस का कौरव आ गया है उसी उसी चन अपने आपको बोलो उठो पार्थ गाड़ी सभालो वीर भोग्यो वसंदरा उठो पार्थ गाड़ी सभालो वीर भोग्यो वसंदरा आप सब का दिन मंगल में हो उत्साहित हो उमंग से बड़ा हो आज इतना ही बाकी हम कल सुभे फिर मिलेंगे साथ बजे हम होली से एक दिन पहले तक इस अनुष्ठान को पूरा कर लेंगे और उसके बाद फिर हम कुछ दिनों का एक मिश्राम लेंगे और फिर उसके बाद दुबारा शुरू करेंगे तब तक के लिए ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है धन्यवाद साधर