प्रणाम साधक,
मुदद मन,
हम पिछले 20 दिनों से अपनी इस यात्रा पर निकले हुए हैं और इस यात्रा से ओम के गुञ्जन ने हमारे भौतिक स्थूल शरीर पे अपना असर दिखाया है और इसी तरह हमारे सूक्ष्म सत्ताओं को भी इसने विवस्थित किया है जो भौतिक शरीर में हमारे स्थूल शरीर की विवस्थाएं हैं उसमें ओम के गुञ्जन के कुछ लाब हुए हैं पहला लाब ये हुआ है कि हम 20-25 मिनट तक स्थिर बैठ सकते हैं दूसरा लाब ये हुआ है कि हम अपने ध्यान को इस 20-25 मिनट में केंद्रित कर सकते हैं हमारी ध्यान केंद्रित करने की ख्यम्ता बढ़ी है और तीसरा लाब ये हुआ है कि हम जब चाहें अपनी कल्पना को जागरित कर सकते हैं हम स्वेच्छा से कल्पना को जागरित करके मन के विचारों का जो ज्वार भाटा चल रहा है उसको हम शांत कर सकते हैं हम कल्पना के वेग में नहीं बहते हम कल्पना का इस्तमाल करके हम अपने विचारों को विवस्थित करते हैं आज से हम आगे का प्रयास यह एक स्थर आगे ले जाएंगे अब हमारा पूरा ध्यान ओम के गुञ्जन में उन सूक्ष्म सत्ताओं से अपने आपको सजग कराना है जो हमारे चारों तरफ व्याप्त है यह सूक्ष्म सत्ताओं हमारे चारों तरफ व्याप्त है हमने अपने आपको इन से अवगत कराना है हम शरीर को स्थिर कर लेते हैं श्वासों पर नियंत्रन ले आते हैं और ओम का उचारन शुरू करते हैं और ओम का उचारन करते हुए हमारा सारा ध्यान हमारे अपने कानों पर होगा जिसमें हम अपना उचारन ही सुनेंगे और ओम का हम अपना उचारन जो सुनेंगे उसमें हम कोशिश करेंगे क्या कोई एक सूक्ष्मत ध्वनी और आ रही है जो हम नहीं निकाल रहे है और वो सुक्ष्मत ध्वनी से हमारा अवगत करने का जो प्रयास है ये सफल एक दो दिन में नहीं होगा इसलिए हमको साधना करनी पड़ेगी तब करना पड़ेगा और तभी साथ सत्तर दिन के बाद दो महीने के बाद हमें अपनी आत्म उतकर्ष के लिए उन्ही सुक्ष् तो हम बहुत कुछ विवस्थित कर सकते हैं अपने इस जीवन में और बहुत कुछ परिश्कृत कर सकते हैं अपने आपको हमारा अपना आत्म उतकर्ष होता है तो आज का अभ्यास शुरू करते हैं जिसमें जब ओम का गुज्जन करेंगे तो सबसे पहले हम अपना ध्यान सिर्फ अपने कंठ में लेके जाएंगे सिर्फ कंठ में जहां से ओम की उत्पत्ति हो रही है और कंठ से शुरू करके हम अपने कानों की तरफ अपने ध्यान को लेके जाएंगे और जब हमारा ओम अपनी पूरी चर्म सीमा पर होगा तब हम ध्यान लगाएंगे कि क्या कुछ और सुन रहा है हमें यह एक बहुत ही सुक्षन अनुभूति है जिसमें बहुत बहुत ही जदा एकागरता की जरृत होती है हम ध्यान की अभ्यास से प्रती दिन ध्यान की अभ्यास से हम इस सुक्षन सता तक पहुंच जाएंगे और फिर जो हमारे अंदर आंतरिक हमारे परिवर्तन होंगे वो देखके हमारा मन मुद्धत हो जाएगा तो आये हम शुरू करते हैं अपने शरीर को बिल्कुल स्थिर कर ले लंबा सा सांस ले सांस छोड़ दे कंदे की नसें धीली धीली धीली गर्दन की नसें धीली धीली धीली कंपटियों की नसें धीली धीली धीली पूरा मस्तक शांत शांत शांत दोनों बुजाएं धीली धीली धीली कोनियों के जोर धीले धीले धीले कलाईयों के जोर धीले धीले धीले भूरी पीट धीली धीली धीली दोनों लातें धीली धीली धीली गुटनों के जोर धीले धीले धीले वीडियो के जोर धीले धीले धीले फूरा शरीर स्थिर शांत मन बदित और अंखें धीले से बंद कर ले ध्यान अपने श्वासों पे किंदरित करें श्वास नाक से आ रहे हैं और पूरे हमारे अंदर जाते हुए नाभी तक पहुंच रहे हैं और नाभी से श्वास फिर बहर आ रहे हैं और हमारे नाक से बहर निकल रहे हैं श्वास को और हलका धीमा धीमा कर ले श्वास को और हलका धीमा धीमा कर ले और धीमा श्वास एकदम धीमा एकदम धीमा श्वास विल्कुल धीमा धीमा उम का गुञ्जन करेंगे हम ने इस चीज पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना कि आ कहां बजेगा,
ओ कहां बजेगा,
म कहां बजेगा आ और उ मिलके ओ ही बन जाते हैं इसलिए ओ,
म ऐसे करके हमने लंबा सा अपनी अपनी गती के अनुसार उम का गुञ्जन करना है और शुरू के थोड़ी थोड़े 8-10 उम के गुञ्जन में हम अपना ध्यान केवल जहां से उम की उत्पत्ती होती है अपने गर्दन में,
अपने कंठ में,
वहाँ पे सिर्फ वहीं पे अपना सारा ध्यान के अंजुत करेंगे शुरू करते हैं पूरा ध्यान अपने कंठ में जहां से उम का उचारन शुरू होता है ओम पूरी एकागरता अपने कंठ पर और ओम के उचारन में इस पे बहुत सूक्षनता से ध्यान दें के हमें कुछ और तो सुनाई नहीं दे रहा है हमारे ओम के अतिरिक एक ध्वनी और भी है हमने उस ध्वनी को पकड़ना है हमारा प्रयास आज से अगले 20-25 दिन तक यही होगा कि हम अलग अलग तरीके से उस ध्वनी को पकड़ने की कोशिश करें जो बहुत ही सूक्षन है और हमारे अंदर बज रही है अलग अलग सभी को कौन सी ध्वनी सुनती है सभी की अपनी अपनी क्षमता और पूर्व अरजित साधना पे निर्भर करता है हम ओम का उचारन अब जब और करेंगे तो अपना ध्यान और इस चीज पे केंदरित करेंगे कि क्या हमें कुछ और भी सुन रहा है हमारा स्वारा ध्यान हमारे कंट पर केंदरित है सब तरफ से ध्यान बटोर के हम अपने कंट पे लेके आते है और हम ओम का गुञ्जन अपनी गती से करते हैं और हम अपने ही ओम के गुञ्जन में अंदर से उसमें कोई सूक्ष्म धनी को तलाचते हैं प्रारंब में संदेह बहुत आएगा कि मुझे को कुछ भी सुराई नहीं दे रहा है मुझे को अपनी धनी ही अपने कानों में सुन रही है और कुछ नहीं सुन रहा है हमने इसी संदेह को पार करना है हमने इसी अपनी जित की एकागरता की इस सीमा से आगे जाना है हमने अपनी अवेरनस को इस उप्स्ट्रेकल से अदर साइड पे लेके जाना है हमारी अवेरनस जो है वो इसी लिमिट की वेट कर रही थी कि कब हमारी अवेरनस में हम भी इसी चीज़ का इंतजार कर रहे थे कि कब हमारे ध्यान में वो सीमा है जहां पे हम यह बोल पायें नहीं मुझसे नहीं हो पाएगा वहीं पे होगा उसी लिमिट से आगे चलेंगे तो हम इस उम का उचारन और करते हैं इसी की में अपनी सादना को अपने तप को और प्रगाड करते हैं अपनी एकागरता सब जगा से बटोर के सिरफ अपने कंठ पे ले आते हैं एकागरता उन्ह कंठ पे सादक कल्पना करें हम जंगल में जा रहे हैं पक्डंडी पे दोनों तरफ फूल खिले हुए हैं और भवरों का गुञ्जन हो रहा है मदुमक्षियों और भवरों का गुञ्जन हो रहा है पहुँच से पक्षियों की आवाज चह चहाने की हमको सुन रही है कल्पना करें कि इस सब प्राकृतिक आवाजों में हम उस भवरे की गुञ्जन को सुन पा रहे हैं धीरे धीरे आगे जाते हैं एक बहुत बड़ा जलाशे आ जाता है हम उसके कुने में बैठ जाते हैं उसका जल एकदम स्वच्च निर्मल इस जलाशे का नाम हमने अमरित जलाशे रखा हुआ है हम इस अमरित जलाशे में अपनी अंजली बर के अपने पानी लेते हैं और उसको अपने सिर पे डाल लेते हैं एकदम थंडक सिहरन का अनुभव होता है वही सिहरन का अनुभव हम दुबारा करते हैं और जब हम तीसरी बार करते हैं तो सारा जल हमारे मस्तिश्क में चला जाता है मस्तिश्क के सभी विचार शान्त हो जाते हैं मस्तिश्क में जलाशे की भाती शान्ती आ जाती है बिलकुल शान्ती और इस शान्ती में हम उस भमरे की गुञ्जन का प्रयास करते हैं हम प्रयास करते हैं कि हमको वो भमरे की गुञ्जन सुनाई दे हमारा पूरी एकागरता हमारे कानों पे आ जाती है और हमारी पूरा मस्तिश्क शान्त हो जाता है मस्तिश्क में कोई भी विचार नहीं उठता एकागरता दोनों कानों पे रहती है और हम धीरे धीरे उस ठंडक को अपने शरीर में आत्मसात करते हैं पूरा शरीर एकडम अमरित में हो जाता है पूरा शरीर पवित्र हो जाता है पूरा शरीर सजग हो जाता है पूरा शरीर अमरित में हो जाता है कोई भी विकार नहीं मन में,
कोई भी विचार नहीं मन में,
कोई भी वासना नहीं मन में,
कुछ भी बंदन नहीं हम स्वच्च पवित्र हैं,
हम स्वच्च पवित्र हैं इस पवित्र मानस्पटल पे हम उस भंवरे की गुञ्जन का बहुत जादा इंतजार कर रहे हैं हम कोशिश कर रहे हैं के वो भंवरे का गुञ्जन हमारे कानों में पढ़े इसी पवित्र मानस्थिती की कलपना से हम ये अनुभव करते हैं के भंवरे का गुञ्जन हमारे कानों में पढ़ रहा है और हम ओम का उचारन कुछ खणों के लिए दुबारा करते हैं कलपना में हम वही पे हैं उस अमरित तालाब के सामने और कलपना में हम उसी जलाशे के साथ हैं और हम वहाँ पे बैठ के अपना जो हमारा कालपनिक स्वरूप जो बैठा हुआ है वहाँ पे जिसको हम देख रहे हैं उस कालपनिक स्वरूप में हम उस स्वरूप से ओम का गुञ्जन करवाते हैं और वह जो हमारी कलपना के अंदर हम खुद हैं उससे हम ओम का गुञ्जन शुरू करवाते हैं ओम अपनी कलपना से बाहर आएं शरीर बोध प्राप्त करें पैरों की उंगलियां धीरे धीरे हिलाएं हम इस अभ्यास को और दोहराएंगे अलग अलग तरीके से ताकि हम उन सूक्ष्मत धुनियों को सुन सकें जो हमारे अंदर इस ब्रमान्दिय मन दौरा हमारे ब्रमान्दिय मन दौरा हमको खुद हैं मिल रही हैं आज इतना ही हम कल सुबह फिर साथ बजे मिलेंगे ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है