प्रणाम साधक,
मुधयत मान हम अपने इस सत्तर दिस शिविर के मद्दे भाग में पहुँच गए हैं,
हमने 35 दिन का अनुश्थान पूरा कर लिया हैं और इतनी ही यात्रा आगे है आज इस ध्यान शिविर के बाद बैठ के एक मनन करें कि कौन कौन सी सूक्ष्ण सत्ताएं हमारे अंदर विक्सित हो गई हैं क्या क्या हमने पाया है सूक्ष्ण सत्ताएं अववश्य विक्सित हुई हैं हमारे ग्यान में संग्यान में नहीं है बैठ के हम एक ये मनन कर सकते हैं आज का हमारा पढ़ाव सबल बुद्धी की ओर हैं जब हम ध्यान अवस्ता में पहुंच जाएंगे तो ध्यान अवस्ता में पहुंच कर हम उन सूक्ष्ण शक्तियों से अपना परीचे कराएंगे जो की नित्य बुद्ध,
नित्य शुद्ध और निर्विकार हैं हम मन से आगे निकलेंगे हम कल्पना से आगे निकलेंगे हमने कल्पना का बहुत अच्छा प्रयोग किया और अपने अंदर ब्रह्म रिशियों के तेज का अवतरन किया वो अपतरन हो चुका है,
अब हम अपनी कल्पना को भी छोड़ सकते हैं और हम अपनी बुद्धी के प्रवल्ता को और प्रगाड करने का प्रयास करते हैं आईये,
आज की यत्रा शुरू करते हैं अराम दे,
बिलकुल निश्चिल होके अराम दे पुजिशन में बैठ जाये बाया हाथ,
दाईना हाथ,
उंगुठा,
लंबा सा सांस ले के छोड़ दे लंबा सा सांस,
आखें धीरे धीरे धीरे बंद कर ले अंतर मुखी हो जाये,
विचारों को शांत कर दे,
समृतियों को बुला दे और एक प्रफुलता,
मुददता का,
अपने मन में एक मुददता का भाव ले के आए प्रफुलता था,
पुलकित,
मुददत लंबा शास ले के छोड़ दे और शरीर को स्थिर करने की यात्रा पे चल पड़े कंदे की नसे धीली धीली धीली,
गर्दन की नसे धीली धीली धीली कनपटियों की नसे धीली धीली धीली,
मस्तक की नसे धीली धीली धीली सिर का सारा बोजा समाप समाप समाप,
दोनों बोजाएं धीली धीली धीली कोहनियों के जोड धीले धीले धीले,
कलाईयों के जोड धीले धीले धीले पूरी पीत शांत शांत शांत,
दोनों कुले धीले धीले धीले,
जंगाएं धीली धीली धीली गुटनों के जोड धीले धीले धीले,
एडियों के जोड धीले धीले धीले,
पैरों के बकी सारे जोड धीले धीले धीले पूरा शरीर स्थेर शांत सजग,
स्थेर शांत सजग,
भावना स्थिरता की,
भावना शांती की,
परम शांती की भावना ध्यान सब जगा से बटोर के अपने श्वासों पे केंद्रित कर ले,
श्वास धीमी धीमी धीमी,
श्वास हलकी हलकी हलकी,
श्वास सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज,
सहज हल्की श्वास,
शान्ती का अनुभव,
सभी विचार शान्त,
शान्त,
शान्त,
सभी कल्पनाई शान्त,
शान्त,
शान्त,
सभी स्मृतियां शान्त,
शान्त,
शान्त,
विशेली स्मृतियों को मस्तिश के मद्य भाग में लाएं,
और आनंद से उनका मल धो दें,
उनको आनंद में मिश्रित कर दें,
और उनकी ऊर्जा मस्तद के पिछले भाग में ले जाएं,
जहां सैयम है,
वो अपार सैयम से मिल जाती हैं,
और वो सैयम हमारे पूरे शरीर को पोषित कर देता है,
सैयम और शान्ति हमारे रक्त में मिल जाती है,
और वो रक्त सैयम और शान्ति को पूरे शरीर में ले जाता है,
पूरा शरीर पोषित शान्त सैयमी,
सभी विचार शान्त,
सभी विचार शान्त,
सभी विचार शान्त,
अब भूत पूर शान्ति का भाव,
शान्ति,
ओम का उचारण करेंगे,
ओम के उचारण में एक मेरी धनी होगी,
एक आपकी धनी होगी,
मेरी धनी मेरी गती से,
आपकी धनी आपकी गती से,
मेरी धनी मेरी लह में,
आपकी धनी आपकी लह में,
और इन दोनों धनियों के बीच एक और अनहद नाद गुञ्जेगा,
कभी हमें पकड में आएगा,
कभी नहीं आएगा,
हमारा सारा ध्यान उस अनहद नाद को सुनने में लगेगा,
सारा ध्यान अनहद नाद पे,
और जब भी हमें सुनाई देता है या नहीं सुनाई देता है,
हमारे अंदर एक आनन्द का भाव उमड आएगा,
ओम के उच्छारन में आनन्द का भाव हमारे पूरे शरीर को पुलकित करेगा,
उसी आनन्द में जो हमारे ओम की धनिया और आनन्द का सम्मिश्रन है,
उसी में अनहद नाद भी सुनेगा,
प्रयास करने से सुनेगा,
और यका यक सुन जाएगा,
नंबा सा सान्स लेके छोड़े और ओम का उच्छारन शुरू करेगा,
परम शान्ती का अनुभव,
परम आनन्द का अनुभव,
हमारे सभी विचार हमारे मन में आते हैं,
विचार आते हैं चले जाते हैं,
कोई भी विचार नित्य नहीं रहता,
नित्य से जो रहती है वो हमारी बुद्धी है,
जो इन विचारों का अवलोकन करती है और इनको इनके यत्वचत स्थान पर भेज देती हैं,
हम इन विचारों की सीडी को छोड सकते हैं,
अब हम उपर पहुँच गए हैं,
नित्य शुद्ध,
नित्य बुद्ध,
निर्विकार,
हमारी बुद्धी का स्वरूप यही है,
नित्य शुद्ध,
नित्य बुद्ध,
निर्विकार,
मलंता जितनी भी है,
वो शुद्धता और पवित्तरता के उपर ही लगती है,
और हम केवल मलंता का ही अवलोकन कर पाते हैं,
तालाब के उपर काई जमी हुई है,
हम काई से नीचे तालाब की शुद्धता को नहीं पकड़ पाते हैं,
लेकिन हमारी सादना में अब इस बात का हमारे अंदर दिड़ भूमी हो गई है कि पवित्तरता इन सब प्रपंचों के नीचे है,
हम उस पवित्तरता के साथ अपना आत्मसार कर लेते हैं,
हम नित्यपवित्र,
नित्यशुद्ध,
नित्यबुद्ध और निर्विकार हैं,
विकारों में हमारी कल्पनाएं थी,
हमने कल्पनाओं का प्रयोग करके ब्रह्म रिशियों के तेज को अपने अंदर अवतरित किया,
और वो अवतरित तेज हमारे पूरे शरीर को पोशित कर दिया,
अब हमें कल्पना का कोई भी जर्रत नहीं है,
कल्पना की कोई भी जर्रत नहीं है,
हम कल्पना को भी छोड़ सकते हैं,
इस परमशान्ति के अनुभूति में अपनी पवित्रता के साथ रहते हैं,
अपनी शुद्धता के साथ रहते हैं,
अपनी बुद्धी के साथ रहते हैं,
परमशान्ति का अनुभव करें,
और इसी परमशान्ति के अनुभव में हमें हमारी बुद्धी की सबलता मिलती है,
जितना जादा हम अपनी शान्ति के साथ जुड़े रहेंगे,
उतनी हमारी बुद्धी प्रबल होती जाएगी,
हमारा संश्यात्मक मन,
हमारी बुद्धी को पथ ब्रश्ट नहीं कर सकता,
संश्यात्मक मन को हम खील कर देते हैं,
शान्ति से,
जब हम अपनी सजता को अपनी शान्ति पे रखते हैं,
तो संश्यात्मक मन खील हो जाता है,
और हमारी बुद्धी को सबलता प्रदान होती है,
हमारी बुद्धी की सबलता,
हमारी शान्ति और आनंद पर खील करता है,
आनंद की अनुभूती से जुड़ी हुई है,
यदि हम अपनी शान्ति से ज़्यादा प्रगाड अधिक संबंध वनाते हैं,
तो हमारी बुद्धी को सबलता प्रदान होती है,
सबल बुद्धी के लिए हमें मन से परे विचारों के नीचे का वो तत्व ढूरना है,
जो नित्य बुद्ध,
नित्य शुद्ध और निर्विकार है,
उस तत्व के साक्षातकार से हमारी बुद्धी को सबलता प्रदान होती है और सबल बुद्धी हमारे संश्यात्मक मन को निर्बल बना देती है,
हमारे अंदर के पांडव कौर्वो से जीत जाते हैं,
अंततह जीत जाते हैं,
उस अभूत पूर्व शान्ति का अनुभव करें और अनुभव करें के हमारी बुद्धी को सबलता प्रदान हो रही है,
साधक धीरे धीरे शरीर बोध प्राप्त करें,
पैरों की उंगलियां हिलाएं,
अलके से हाथों की उंगलियां हिलाएं और धीरे धीरे अपनी आँकें खोल लें,
अन्दर की शान्ति से बुद्धी को सबलता प्रदान होती है,
अपनी सजगता अपनी मन की शान्ति पर रखें,
आज के लिए इतना ही कल सुबं,
फिर मिलेंगे साथ पज़े,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,