प्रणाम साधक मुदेत मन साधक हम अपनी इसी यात्रा में साथ्वें दिन पे आ गये हैं हमारे इस सत्तर दिवसीय शिवेर का आज साथ्वां प्रसारन है आज हम नाभी चक्र पर अपना ध्यान और किंद्रित करेंगे तो अपनी यात्रा शुरू करने से पहले हम सबसे पहले अपने शरीर को स्थिर करेंगे फिर हम अपने सांसों को नियंत्रित करेंगे फिर अपने मन को शांत करेंगे और फिर हम अपनी सारी ऊर्चा एकागरता को अपनी नाभी पे एकत्रित करेंगे और वहां पे ध्यान को लगाएंगे जिससे के हमारी सूक्षंक शमताएं जितनी है वो जागरत हो सके आये यात्रा प्रारंब करते हैं बाया हाथ,
दाहिना हाथ और इसको अराम से अपनी गोद में रख ले एक बहुत ही आराम दे पुजिशन में अपनी बैठ जेए और आखें धीरे धीरे बंद करनी शुरूग कर ले आखें धीरे धीरे बंद आखें धीरे धीरे बंद कर ले लंबा श्वास लेके छोड़े लंबा श्वास लेके छोड़े श्वास लंबा सा गर्दन की नसे धीली धीली धीली कंधे की नसे धीली धीली धीली कनपटियों की नसे धीली धीली धीली मस्तक की नसे धीली धीली धीली पूरा मस्तक शांत सिर का सारा बोजा समाप्त दोनों भुजाएं धीली धीली धीली कोहनियों के जोड धीले धीले धीले कलाईयों के जोड धीले धीले धीले पूरी बीट शांत शांत शांत कूले धीले धीले धीले जंगाएं धीली धीली धीली गुटनों के जोड धीले धीले धीले एडियों के जोड धीले धीले धीले पूरा शरीर स्थिर पूरा शरीर स्थिर साधक अंदर सजग,
साधक अंदर उपस्थेत साधक शरीर के अंदर सावधान साधक उमंग से भरा,
साधक उत्सः से भरा पूरा ध्यान सब जगा से बटोर ले बिखरा ध्यान बटोर ले और इसको अपनी श्वासों पे ले आए हलकी श्वास,
धीमी श्वास,
छोटी श्वास नासिका,
बाई नासिका से अंदर जाती श्वास पेफ़णों को भरती श्वास और श्वास की उर्जा नाभी को छूती श्वास की उर्जा नाभी को छूती और छूते ही वापस मुरती श्वास पेफ़णों से बाहर जाती श्वास,
नासिका से बाहर जाती श्वास धीमी हलकी श्वास,
बाहर जाते हुए नासिका से एक या दो उंगली आगे तक जाती श्वास जादा जोर से श्वास को बाहर ना निकाले,
हलके सहज सहज तरीके से प्यार से श्वास को छोड़े जैसे बहती नदी में हम हाथ से एक पूल की पंकड़ी छोड़ देते हैं और वो तैरती हुई चली जाती है उसी प्रकार अपनी श्वास को बहुत सहज प्रेम पूर्वग धीरे से छोड़ दे धीरे से छोड़ दे दो तीन चोटी श्वासों के बाद एक लंबी श्वास आएगी उससे पूरे अपने फेफ़डों को अवा से भर ले और धीरे धीरे आराम से छोड़ दे ना तो छोड़ते हुए रोकना है ना जोर लगाना है सहज सहज तरीके से अलकी सी श्वास धीमी सी श्वास और छोटी होती श्वास और छोटी होती श्वास धीमी श्वास धीमी श्वास अलकी श्वास अलकी श्वास पूरा मन विचार रहित विचार रहित मन में सभी विचार शांत सभी कलपनाएं शांत सभी स्मृतियां शांत स्मृतियां जो भी उठ रही हैं उसे मस्तिशक के अगले भाग से खीच कर मद्यभाग में ले आएं और मद्यभाग में एक आनंद का ज़र्ना बैरा है उस आनंद के ज़र्ने से उस स्मृति का सारा विश और सारी असयमता उस स्मृति की धो दे धो दे धो दे स्मृति विश हीन हो गई है स्मृति का कुछ भी हमारे उपर प्रभाव नहीं है वो स्मृति को चलने से ना मन में सुख है ना दुख है जो स्मृति का सुख तुख उसके साथ आरोपित था वो सारा सुख तुख उस स्मृति का हमने अपने आनंद के ज़र्ने से धो दिया धो दिया धो दिया स्मृति से स्मृति को चलाय मान करने से हमें कोई भी सुख या दुख की अनुभूती नहीं हो रही है केवल आनंद की अनुभूती है आनंद की अनुभूती है और दुली हुई स्मृति को हम अपने मस्तिश के पिछले भाग में ले जाते हैं वहाँ सैयम का अपार भंडार है उस सैयम के भंडार में स्मृति मिश्रित हो जाती है और वो सैयम की सारी उर्जा हमारे रक्त में घुल जाती है घुल जाती है घुल जाती है और वो रक्त हमारे शरीर को पोशित कर देता है रक्त हमारे शरीर को पोशित कर देता है जो स्मृति हमने अपने मस्तिश्क में सुख दुख जोड़के उसको पूरे बाहिय विश्व में प्रसारण करना था उही स्मृति को हमने अपने आनंद के जरणे में दोके अपने सैयम से मिश्रित करके अपने रक्त में घुल के अपने शरीर को पोशित कर दिया स्मृति से हमने अपने शरीर को सिंचित कर दिया स्मृति की उर्जा हमने अंतरमकी ही रहने दी स्मृति की उर्जा हमारे ही उतकर्श में बाध्य होने की जगा हमारे ही उतकरश का प्रसारण का कारण बनी हमारे उतकरश का कारण हमारी स्मृति की उर्जा भी है स्मृतिया सभी शान्त विचार सभी शान्त कलपनाएं सभी शान्त मन का भढकाओ शान्त बिलकुल शान्त मन दाएं बाएं उपर नीचे जो भटकता है वो भटकना शान्त शान्त शान्त मन को एक जगा मिल गई है मन को हमारे सैयम के भंडार में कुड़सी मिल गई है वहाँ पे बैठ गया है मन सैयम से भर गया है उसका दाएं बाएं जाना उपर नीचे स्मृतियों को पकड़ना स्मृतियों को खेड़ना स्मृतियों को दुबारा जीवित करना वो मन का जितना भी हमारा विखराव है वो सभी समाप्त हो गया मन सेम्मित होके हमारे मस्तिश के पीछे के सैयम काले भाग में आके बैठ गया अब हम ओम का उचारण करेंगे और ओम के उचारण में अपने दाहिने हाथ की तरजणी तरजणी इस दी इंडेक्स फिंगर तरजणी को हम अपनी नाभी में बाहर से लगाएंगे हमारे बाएं हाथ की तरजणी नाभी पे हम अभी लगा के रख लेते हैं और दाहिने हाथ की तरजणी हम पीछे अपनी पीठ में रीड की हड़ी पे लगा के रख लेते हैं जिससे के हम ये कलपना करें के हमारे बाएं हाथ की तरजणी से हमारे दाएं हाथ की तरजणी तक एक बहुत सुन्दर सीधी रेखा बन गई है जो हमारे पेट को बेदती हुई आगे से पीछे चली जाती है हमारे सारी तरजणी है इंडेक्स फिंगर प्लीज प्लेस इंडेक्स फिंगर अप्योर लेफ्ट हेड़ इन यो नेवल और प्लेस इंडेक्स फिंगर अप्योर राइट हेड़ जस्ट विहाइड उन्दू और यो बैकबोर्ण सो बोध इंडेक्स फिंगर्ज आर इन � स्ट्रेट लाई जस्ट विहाइड इन अस्ट्रेट लाई अब हम ओम का उचारण करेंगे ओम के उचारण का सबसे पहला अवतरण हमारे ब्रह्मरंद्र में होगा ब्रह्मरंद्र इस दी हाईयस्ट पॉइंट अवर हेड दी हाईयस्ट पॉइंट अवर हेड पॉइंट हमारे ब्रह्मरंद्र में ओम का उचारण हम शुरू करेंगे वहाँ से स्पंधन को नीचे लेके जाएंगे अपनी गर्दन में गर्दन से अपने बाए कंदे में बाए कंदे से बाए गोनी में बाए गोनी से अपनी बाए हाथ में और अपनी तरजनी में बाए तरजनी से उसको नाभी में अस्तांत्रित करेंगे नाभी में अंदर पीछे को ये उर्जा जाएगी और पीछे से हमारी दाहिनी तरजनी को चूती हुई दाहिनी भुजा से उपर चड़ती हु� साधक लंबा सा सान्स लें और ओम का उचारन शुरू करते हुए इस पूरे सर्किट को कमप्लीट करें साधक अपना दाहिना हाथ पीछे से हटाके ग्यान मुद्रा में अपने गुटने के पास रखने अब हम उर्जा को अपने ब्रह्मरंद्र से अंदर को खीचेंगे सफेद बहुत ही उजवल प्रकाश की एक उर्जा हमारी जितनी उंगली है उतने मुटापे की एक उर्जा का प्रकाश हमारे मस्तिश्क में हमारे ब्रह्मरंद्र से नीचे उत्रेगा उसका कल्पना करें के हमारे गर्दन तक जाएगा और वहाँ से बाएं कंदे में,
बाएं कंदे से बाएं कोहनी में,
बाएं कोहनी से बाएं कलाई में,
कलाई से हमारी तरजनी में और तरजनी से हमारी नाभी पे उर्जा का पुंज बन जाएगा एक सूर्य और ऐसे लगेगा एक बहुत ही प्रचंड सूर्य हमारी नाभी पे आ गया है और वो सूर्य की उर्जा हम पीछे को खीचते हुए अपनी पीठ पे ले जाएगे जहांपे हमने अपने दाहिने हाथ की तरजनी लगाई थी वहाँ पे लेके जाएगे और वहाँ पे हर ओम के उचारन से उस सूर्य की प्रचंडता बढ़ती जाएगी पेट में हमारे प्रकाश ही प्रकाश हो जाएगा और वो सारा प्रकाश हमारी रीड की हड़ी में पीछे बढ़ता जाएगा बढ़ता जाएगा बढ़ता जाएग अपने गुटने के पास रख लें अब ओम का उचारन हम शुरू करेंगे अपनी नावी से और नावी से उस उर्जा पुञ्ज को पीछे को लेके जाएगे और वो हमारी रीड की हड़ी में जाके एक प्रकाश में सूर्य बन जाएगा हर ओम से सूर्य को इकलपना करेंगे और प्रकाड़ और प्रकाशित हो रहा है साधक अनुभव करेंगे जब हम ओम का उचारन करते हैं तो हमारा पेट अंदर को होता है और अनुभव करेंगे हमारी नावी अंदर से खिस्ती हुई हमारी रीड की हड़ी को अंदर से छू रही है और वहाँ एक पहुत ही प्रकाड़ प्रकाश का पुञ्ज है साधक अपना पूरा ध्यान अपनी रीड की हड़ी के उस भाग पे केंद्रित करें जहां पे हमारी नावी खिच के अंदर जाके छू रही थी और वहाँ पे सूरे का एक प्रचन्ड प्रचन्ड पुञ्ज है एक ऐसे लग रहा है वहाँ पे एक इसी ने एक जोती जगा दी है और उस जोती की लालिमा बढ़ती जा रही है प्रकाड़ होती जा रही है और भी जादा प्रकाड़ होती जा रही है और उसकी प्रकाड़ता से हमारे पूरे शरीर में ऊर्जा भरती जा रही है भरती जा रही है हमारा शरीर उस ऊर्जा पुञ्ज से प्रफुलत हो रहा है हम में उत्साह बढ़ रहा है हम में उमंग बढ़ रही है हम में कारे शक्ती क्रिया शक्ती का बहुत जादा प्रदर्शन हो रहा है क्रिया शक्ती बढ़ रही है हमारी हमारी पीठ की रीड की हड़ी में उस ऊर्जा पुञ्ज से हमारे पूरे शरीर में उश्मता आ रही है हम अपने हाथों में हाथों में उश्मता को महसूस कर रहे है अनुभव कर रहे है अनुभव करें साधक अनुभव करें अनुभव करें के हमारे पीठ की रीड की हड़ी में पहुत उश्मता आ गई एक सूरे जल रहा है एक पीले रंग का सूरे जल रहा है पहुत ही प्रग प्रकाश है उस सुरे को और ज़्यादा अपनी कल्पना जो इदर उदर भाग रही है उसको समेट के फिर उसके लिए