प्रणाम साधक मदद मन साधक आज अपनी साधना में हम अपने हिदे के उपर ओम के गुञ्जन से उर्जा का प्रकाश करेंगे तो करने के लिए हम थोड़ा सा एक अनुमान लगा लेते हैं हिदे है कहाँ पे यह जो हमारी यहाँ पे यह जो हमारी रिब्स की जो हडिया है जहां यह हडि खतम होती है वहां पे आप हाट लगा के देख सकते हैं और उससे थोड़ा सा उपर जाके बाइन तरफ पे यहां पे हमारा हमारी मुठ्थी के आकार का है इस तरह यहां से ऐसे इसमें दो इससे है और दो इससे ऐसे है यह नीचे वाले दो चैंबर है यह उपर वाले दो चैंबर है यह यहां पे है इसका एक अनुभव कर ले एक अनुमान लगा ले के यहां अंदर में हमने इसको ज चूना तो आये यत्रा शुरू करते हैं बाया हाथ दाहिना हाथ और दोनों हाथ नीचे अपनी गोधी में एक लंबा सा सास लेके छोड़ दे आखें धीरे धीरे बंद कर ले धीरे धीरे आखें बंद कर ले कंधे की नसे धीली धीली धीली गर्दन की नसे धीली धीली धीली कनपटियों की नसे धीली धीली धीली मस्तक की नसे धीली धीली धीली सिर का सारा बोज़ा समाप समाप समाप दोनों भुजाये धीली धीली धीली कोनियों के जोड धीले धीले धीले कलाईयों के जोड धीले धीले धीले पूरी पीठ शान्त शान्त शान्त दोनों कुबले धीले धीले धीले जंगाये धीली धीली धीली गुटनों के जोड धीले धीले धीले इडियों के जोड धीले धीले धीले पैरों के जोड धीले धीले धीले पूरा शरीर स्थिर,
पूरा शरीर स्थिर,
पूरा शरीर तनाव रहे,
कोई भी अंग,
प्रत्यंग,
मास,
पेशियंग कुछ भी तनाव में नहीं है,
सब कुछ एकदम स्थिर अंदर साधक सजग,
अंदर साधक सावधान,
अंदर साधक उपस्थेत,
अंदर साधक सगजग,
सजग,
सजग,
सजग अपना सारा ध्यान,
हर विचार से,
हर कल्पना से बटोर के अपने श्वासों पे लियाए,
श्वास,
बाही नासिका से अंदर,
मुढते हुए गले में,
गले से फेफ़णों में,
फेफ़णों से नीचे नाभी को चूते हुए,
चोटे श्वास,
धीमे श्वास,
फलके श्वास,
धीरे धीरे श्वास की गती को कम करें,
धीरे धीरे श्वास पे लगने वाले पल को कम करें,
धीरे धीरे श्वास की अवती कम करें,
चोटे चोटे श्वास,
फलके श्वास,
धीमे श्वास,
दो तीन चोटे श्वासों के बाद एक लंबा सा श्वास ले ले,
पूरे अपने फेफ़णों को हवा से भर ले,
और धीरे धीरे उसको सहजता से,
अपने ही बल से बाहर निकल ले ले,
जब हवा नासिका से बाहर निकले,
तो केवल एक या दो उंगली आगे जाएगा,
उसपे कोई बल का प्रयोग नहीं कि हमने हवा का निशकासन बल पूर्वक करना है,
अलका श्वास,
धीमा श्वास,
सहज श्वास,
श्वास अंदर नासिका,
बाहर नासिका से अंदर जाता हुआ श्वास,
फेफ़णों में बढ़ता हुआ श्वास,
और हमारी नाभी को चूता हुआ श्वास,
जैसे ही श्वास की उर्जा नाभी को अंदर से चूएगी,
पूरे शरीर में एक तरंग सी पहल जाएगी,
हमारे शरीर के रोम,
रोम का एक धागा हमारी नाभी से जुड़ा हुआ है,
हमारी नसें,
हमारी नाभी से जुड़ी हुई है,
हर अंग,
प्रत्य अंग जो है,
वो हमारी नाभी से जुड़ा हुआ है,
तो जैसे ही हम इस उर्जा पुञ्च को अपनी नाभी पे रखते हैं,
हमारा पूरा शरीर पुलकित हो जाता है,
पूरा शरीर मुद्धत हो जाता है,
पूरा शरीर पोषित हो जाता है,
हमें हमारे हाथों में उश्मा का प्रभाव दिखता है,
लगता है,
हमारे हाथ गरम से होने लगते हैं,
पूरे शरीर में एक पुलकितता,
एक हर्षित हर्षित भाव भर जाता है,
शमा करें,
श्वास धीमी श्वास,
श्वास हलकी श्वास,
श्वास वायू कम,
ऊर्जा जादा,
प्राण जादा,
श्वास में प्राण जादा,
ऊर्जा कम,
ये अनुभव करें,
कि हम अंदर प्राण जादा खीच रहे हैं,
हवा तो हम खीच ही रहे हैं,
हम अंदर जीवन दाई प्राण को खीच के,
अपने शरीर में,
अपनी नाभी पे लेके जाते हैं,
और खाली श्वास बाहर,
प्राण श्वासों पे आरूड होके अंदर आते हैं,
और हमारे शरीर को,
हमारी नाभी से पोशित करते हुए,
बाहर निकल जाते हैं,
प्राण उर्जा,
जो पूरे ब्रह्मान्ड में व्याप्त है,
वो हमारे श्वासों के द्वारा,
हमारे शरीर में आ रही है,
और शरीर को पोशित कर रही है,
सबी श्व,
और हमारे श्वास,
बहुत ही धीमे,
सहे,
स सुन्दर,
मीठे हो जाते हैं,
बहुत ही सहेज,
सरल,
सुन्दर,
सौम्य,
मीठे,
अच्छे,
प्यारे,
प्यार से भरा,
हमारा श्वास,
प्यार से भरा हो जाता है,
प्रेम,
प्रेम अगनी में लिप्थ हो जाता है,
अलका श्वास,
मीठा श्वास,
धीमा श्वास,
चोटा श्वास,
मस्तिष्क के सभी विचार शान्त,
शान्त,
शान्त,
सभी कल्पनाएं शान्त,
शान्त,
शान्त,
कोई दूरगामी परिणाम की कोई कल्पना नहीं,
कोई मध्यमगामी काम की कोई कल्पना नहीं,
कोई कल्पना नहीं के इस सत्र के बाद क्या करेंगे,
सभी कल्पनाएं शान्त,
सभी स्मृतियों शान्त,
स्मृति की उर्जा जैसे ही उठती है,
हम उस उर्जा को अपने मस्तिष्क के मध्यबाग में ले आते हैं,
वहाँ पे आनन्द का ज़र्ना फूट रहा है,
उस आनन्द के ज़र्ने में हम अपनी स्मृति का विष्ण गोल देते हैं,
स्मृति धुल जाती है,
स्मृति पवित्र हो जाती है,
स्मृति केवल एक उर्जा पुञ्ज बन के रह जाती है,
और उस उर्जा पुञ्ज को हम अपने मस्तिष्क के पिछले भाग में ले जाते हैं,
वहाँ पे सैयम का अपार भंडार है,
हम उस अपार भंडार में स्मृति को गोल देते हैं,
और वह स्मृति गुली हुई,
वह सैयम हमारे पूरे शरीर में,
रक्त में गुलके मिल जाता है,
और पूरे शरीर को पोशित कर देता है,
जो स्मृति ने एक उर्जा पुञ्ज बनकर,
प्रकाशित होकर,
बाहे जगत में पैर ना था,
उस स्मृति को हम समे� ही शरीर की पोशन में लगा देते हैं,
हमारी उर्जा हमारे ही शरीर को पोशित करने लग पड़ती है,
सभी स्मृतियां शान्त,
सभी विचार शान्त,
सभी कल्पनाएं शान्त,
सभी विचार शान्त,
एक अद्बुत शान्ती,
शान्ती,
शरीर स्थिर है,
श्वासे नियंत्रन में है,
विचार,
कल्पनाएं,
स्मृतियां शान्त है,
इस शान्ती में एक अनन्द प्रफुलित होता है,
पूरे मस्तिष्क में आनन्द का ज़र्ना बैता है,
और वो आनन्द हमारे मस्तिष्क से निकलके,
हमारे सिर के बाहर से निकलके,
हमारे स्वजन,
प्रियजन,
मित्रों,
दुश्मनों,
सभी को,
पूरी धर्ती को सीच देता है,
अताह ये हमारा अन्दर का आनन्द का स्रोत्र है,
जो की पूरे विश्व में फैल जाता है,
पूरे ब्रह्मान्द में फैल जाता है,
यत पिंडे तत ब्रह्मान्दे,
जैसी आनन्द की स्थिति हमारे मस्तिष्क के पिंड में है,
वैसी ही आनन्द की स्थिति पूरे ब्रह्मा में है,
भूत पूर्व है और निर्वचनिय है,
इस आनन्द की और अनुभूती करें,
और और प्रगाड़ अनुभव करें,
कि एक आनन्द का जर्ना हमारे मस्तिष्क के मद्ध से फूट कर पूरे विश्व में फैल जाता है,
पूरे ब्रह्मान्द को आनन्द वही कर द हमको अपने आखों से जो दिखता है,
वो केवल आनन्द से भरा होता है,
हमें हमारी कानों से जो सुनेगा,
हम केवल उसके आनन्द से ही सुर्णित होंगे,
वो स्पंधन जो आनन्द का है,
वो ही हमको हमारे अंदर स्पंधित होगा,
हमें पूरे ब्रह्मान्द में आनन्द ही आनन्द है,
हमारे मस्तिश्क में भी आनन्द ही आनन्द है,
आए अब हम इस आनन्दमय वस्ता में ओम का उचारण करते हैं,
ओम के उचारण का प्रारंब हम अपने ब्रह्मरंद से करेंगे,
जो हमारे मस्तिश्क के खोपडी के सबसे उपर का पाग है,
वहाँ पर एक रुपय के सिक्के के आकार है,
उतना एक उस इलाके को हम ब्रह्मरं गहते हैं,
वहाँ से हम ओम का उचारण करना शुरू करेंगे और उसको धीरे धीरे नीचे खीच के लेके आएंगे और अपने रिदे पे लाके उसकी पूरी उर्जा को भर देंगे,
हम अपने रिदे को ओम के उचारण की उर्जा से भर देंगे,
हमारा आरंब हमारे ब्रह् रिदे में समा जाएगा,
रिदे में हमारे चार कोश हैं,
वो सभी चारो कोशों को प्रफुलत कर देगा,
आये शुरू करते हैं ओम साधः ध्यान अपने रिदे पे रखे हैं ओम साधः कल्पना करें हमारे ब्रह्मरंद्र में एक पहुत ही चमकता हुआ सूरज उग गया है और वो सूरज अपनी पूरी उश्मता और उर्जा से धीरे धीरे नीचे जा रहा है वो हमारे आँखों के स्थर से नीचे हो गया अब हमारे कानों के स्थर से नीचे हो गया अब हमारे मुख के स्थर से नीचे हो गया अब हमारी गर्दन में आ गया और गर्दन से नीचे होता होता हमारे रिदे में पहुँच गया जैसे ही वो उर्जा का पुझ हमारे रिदे में पहुँचता है उसका रंग सफेद से लाल हो जाता है हमारे मस्तिश्क में सूरज श्वेत रंग का रिदे में सूरज लाल रंग का इन दोनों कल्पनाओं को एक ही क्षण में करने का प्रयास करें सादक अपने पूरी कल्पनाशक्ति को लगा दें और ये कल्पना करें के हमारे मस्तिश्क में एक सफेद रंग का सूरज उगा हुआ है और हमारे रिदे में एक लाल रंग का सूरज है दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और हमारे रिदे को हमारे मस्तिश्क के साथ जोड़ने वाली जितनी भी सूक्ष्म सत्ताएं हैं सभी जागरित हो गई हैं जितनी भी सूक्ष्म सत्ताएं हैं सभी जागरित हो गई हैं और उसमें सबसे बड़ी सत्ता जो जागरित अपार्छमता में हुई है वो है सैयम,
हमारा विवेक,
हमारा सैयम,
हमारी बुद्धी इन सब को ऊर्जा मिली है,
हमारा मन नीचे हो गया है इंद्रियां हमारी सबी वश्मे हो गई है हमारा रिदे और हमारा मस्तिश्क दोनों मिल गए है रिदे और मस्तिश्क के इस मिलाप से हमारी बुद्धी में प्रचन्ड बुद्धी हुई है हमारे विवेक में प्रचन्ड बुद्धी हुई है हमारी सूक्ष्म शमताएं और भी जाग गई है और भी प्रचन्ड हो गई है ये एक बहुत ही अदबत सियोग हुआ है लाल रंका सूरज हमारे रिदे में और सफेद रंका सूरज हमारे मस्तिश्क में इन दोनों के मिलाप से हमारे पूरे शरीर में अदबत उर्जा आ गई है सादक अपने हाथों को महसूस करें वहाँ पे ऊश्मा है उर्जा है कुछ कुछ सादकों की हुआ थेलियों में थोड़ा पसीना भी आर सकता है इतनी उर्जा पूरे शरीर में भर गई है हम किसी भी कारे को करने के लिए तत्पर हो गए हैं हमारी क्रिया शक्ती का अपार बंडार आ गया है ज्ञान शक्ती इच्छा शक्ती से बढ़के अब क्रिया शक्ती आ गई है हमारा पूरा शरीर शक्ती से बर्पूर हो गया है मस्तिश्क में सफेद सूरज और रिदे में लाल सूरज मस्तिश्क में सफेद सूरज रिदे में लाल सूरज साधक इस कल्पना को और प्रगाड करें सूरज की शक्ती और उसके प्रकाश को और प्रगाड कर लें और प्रगाड कर लें जितनी मात्रा में हम इस कल्पना को उजागर करेंगे इस कल्पना को और विक्सित करेंगे इस कल्पना में और क्लैरिटी लेके आएंगे उतनी ही मात्रा में हमारे अंदर शक्ती का सुरण होगा स्पंदन होगा हमारे हृदे का स्पंदन और हमारे मस्तिष्ख का स्पंदन एक ही लय में हो गया है सादक एक बहुत ही उची साधना की स्थिती है जब हमारे हृदे का स्पंदन और हमारे मस्तिष्ख का स्पंदन एक हो गया है हमारा हृदे और मस्तिष्ख एक हो गये है हमारे मन के सारे भटकाव गिर गये है मन कहीं नहीं भटक सकता जब हमारा हृदे का सूरज और हमारे मस्तिषख का सूरज एक ही स्पंदन से लय बत हो गये है मन के भटकाव गिर गये है एकागरता का एक बहुत चरम सीमा पहुँच गयी है हमारी एकागरता बहुत अंशों में बढ़ गयी है हमारे को कोई भी चित वृत्ति जो है वो अपने अलक्ष से हिला नहीं सकती,
डिगा नहीं सकती चित की वृत्तियां सारी खीन हो गयी है चित की वृत्तियां सारी खीन हो गयी है हमारा संकल्प बढ़ गया है सपेध सूरज बहुत ही प्रगाड और बहुत ही अद्बत संयोग है बहुत ही अद्बत संयोग हो गया है अब हम किसी भी कारी को करने में संपूर्ण सक्षम है संपूर्ण सक्षमता आ गयी है संपूर्ण सक्षमता आ गयी है साधक धीरे धीरे शरीर बोध प्राप्त करें पैरों की उंगलियां हिलाएं हाथों की उंगलियां हिलाएं और बहुत धीरे धीरे अपनी आखें खोल ले साधक मैसूस करें हाथों में बहुत उर्जा आ गयी है गरम लग रहे है अपनी चेहरे पे लगा के देखेंगे तो हमारे हाथ गरम लग रहे है इतनी उर्जा हमारे अंदर आ गयी है ये बहुत ही बहुत ही सुक्ष्म और बहुत ही उच्छिक शिर्णी की साध्रा है जब हम अपने रिदे को अपने मस्तिश्ट से जूड लेते हैं इसके लिए उच्छिक शिर्णी की साध्रा है इसके लिए उच्छिक शिर्णी की साध्रा है इसके लिए बहुत ही सुच्छिक शिर्णी की साध्रा है बहुत ही उच्छिक शिर्णी की साध्रा है कल सुबह फिर मिलते हैं 7 बजे तब तक के लिए ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है