21:53

पारिवारिक जीवन और अध्यात्म ले कर चलें संग (Hindi)

by Vikas Arya

Rated
4.6
Type
talks
Activity
Meditation
Suitable for
Everyone
Plays
44

क्या पारिवारिक जीवन और अध्यात्म साथ साथ चल सकते हैं? क्या ये दोनो पारस्परिक विरोधी हैं? क्या एक को चुनना दूसरे का त्याग है? या क्या एक दूसरे के मार्ग में बाधक है? आज हम इन और ऐसे ही कहीं प्रश्नों के समाधान पर चर्चा करेंगे। हम इस विषय को दो अलग अलग पहलुओं से समझेंगे। एक पहलू उन लोगों को सहायता देगा जो पारिवारिक जीवन में हैं और आध्यात्मिक बनना चाहते हैं। दूसरा पहलू उन लोगों के लिए है जो आध्यात्मिक है और वो कैसे पारिवारिक जीवन में जाएँ इसको समझने में सहायता देगा। इसके लिए हम चार सूत्र दे रहे हैं।

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Transcript

नमस्कार आज हम जिस विशे पर चर्चा करेंगे वो एक ऐसा विशे है जिसके बारे में समाज में काफी ब्रांतियां प्रचलित हैं क्या पारिवारिक जीवन और अध्यात्म साथ चल सकते हैं क्या ये दोनों पारसपर एक विरोधी हैं क्या एक का चुनना दूसे का त्याग है और क्या एक दूसे के मार्ग में बादक है आज हम इन और ऐसे ही कहीं प्रश्नों के समाधान पर चर्चा करेंगे हम इस विशे को दो अलग अलग पहलों से समझेंगे एक पहलों उन लोगों को सहता देगा जो पारिवारिक जीवन में हैं और अध्यात्मिक बनना चाहते हैं दूसरा पहलों उन लोगों के लिए है जो अध्यात्मिक हैं और पारिवारिक जीवन में जाएं भी या नहीं या फिर वो कैसे पारिवारिक जीवन में जाएं इसको समझने में सहता देगा आप देखेंगे कि इस चर्चा में दिये गए समाधान दोनों मार्कों के लिए एक समान ही हैं ये समाधान बिन होते वे भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं इन में से कुछ समाधान आपकी अभी की समझ से बिन हो सकते हैं ये उस सोच से भी बिन हो सकते हैं जो समाज में प्रचलित है मेरा उदिश्य केवल आप तक हर विशे को उसके प्राकरतिक और वास्तविक रूप मिलाना है इसलिए हो सकता है कि आपकी अभी की समझ इसका विरोध करें मेरी आपसे बस ये विंती रहेगी कि आप कुछ भी निशकश निकालने से पहले इस पर कुछ समय अपने अंतर मन में विमर्श करें आपको अवश्य ही वास्तविकता का आभास स्वतः ही हो जाएगा तो चलिए देखें कि पारिवारिक जीवन और अध्यात्म वास्तविकता में है क्या पारिवारिक जीवन और अध्यात्म को सही से समझने के लिए हमें इस विशे की गहराई में जाना पड़ेगा और उसके लिए हमें इने प्रतक रूप से समझना भी पड़ेगा पारिवारिक की सरल परिवाशा जो प्रचलित है वो है कि जिसका परिवार हो या जो सब परिवार हो परन्तु परिवार है क्या परिवार हमारे माता पिता है हमारे भाई भैन है या हमारे पती पतनी और बच्चे या हमारे रिष्टे नाते हैं अब ऐसे ही शोद करें तो क्या परिवार वो रिष्टे हैं जिनके साथ हमारा खून का रिष्टा है या यू कहें कि जो हमारी वंशावली के हैं या इसमें वो लोग भी सम्मिलित हैं जिनसे हमारा खून का रिष्टा नहीं है और जिनकी वंशावली हमसे भिन है और अगर ये परिवार हैं तो क्यों हमें इनसे अधिक साहेता और सुक अपने मित्रों से भी मिल जाता है क्यों हम अपने मित्रों के साथ अधिक खुले होते हैं और क्यों जब भी हम जीवन में आनंद पाना चाहते हैं तो परिवार को छोड़कर मित्रों को याद करते हैं और उनके साथ समय विताना पसंद करते हैं ये सारे पर्शन मैं आपके समक्ष केवल इसलिए रख रहा हूँ कि आप इन पर्शनों को अपने अंदर टोले और ये जानने का परियास करें कि कहीं आपके साथ भी तो ऐसा नहीं है और अगर है तो क्यों सरल भाशा में कहीं तो आप जानेंगे कि परिवार एक नाम है जो हमने रिष्टों के समों को दिया है अलग-अलग लोगों के लिए ये समों और इन में आने वाले लोग अलग-अलग हैं यहां सभी लोग एक समान भाव नहीं रखते कुछ लोग परिवार के परतिक अधिक भावनाय रखते हैं तो कुछ कम महत्पून विशय ये नहीं है कि आपकी किस में कितनी भावनाय ये जुड़ाव है महत्पून ये है कि हम ये समझें कि सबकी विचार धारा एक समान नही कठिनाई ना बढ़ाते हुए मैं परिवार की प्रचलित परिभाशा को लेकर अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ यानि आज के इस चर्चा में हमारा परिवार से अभी प्राय है अपने सग्गे संभन्दियों से और जब हम परिवार की बात करें तो आप मुक्यता इन में � अध्यात्मिक बन सकते हैं क्योंकि जब हम रिष्टो की बात करते हैं तो हम इन रिष्टो से जुड़े अपने कर्तव की बात करते हैं इन में से काफी कर्तवे ऐसे हैं जिनको लेकर ये ब्रांतियां हैं कि ये भौतिक हैं और हमें अध्यात्म से दूर ले जाते हैं गहराई में देखने में आप जानेंगे कि वास्तविक्ता में ऐसा नहीं है ये हमें दी हुई शिक्षा की तुटी है जो इस कारण उत्पन हुई है क्योंकि हमने इसके सही अर्थ को जानने का प्यास ही नहीं किया हमें जैसा बताया गया हमने वैसा मान लिया परन्तु असल में हमारे कर्तव हमारे धर्म पालन का माध्यम मातर है यहां धर्म का अभी प्राय या अर्थ धार्मिक होने से नहीं बलकि उन अपेक्षाओं को पूरा करना है जिनका हम पर दाइत है यहां पर परिवार का अर्थ एक ऐसी चार दिवारी या सीमाओं से है जिसके अंदर आने वाली सभी व्यक्तियों और उनके जीवन के सभी जुड़े पहलूं के प्रती हमारे विवार कैसा हो हमारे विवार में हमारे परिवार के प्रती कर्तव का होना ही हमारा पारिवारिक धर्म अध्यात्म के रास्ते में बादक है क्योंकि हमें अपना पारिवारिक धर्म निभाने के लिए जीवन के अलग अलग पहलों में सम्मलित होना पड़ता है इसमें हमें जीवन या अपन के लिए धन भी अरजित करना पड़ता है और ऐसे निर्णे और आचरन भी करने पड़ते हैं जिससे परिवार की आवशक्ताओं को पूरा किया जा सके और उनका बचाव भी इसका अर है बिना इनमें आशक्त हुए हम परिवार के प्रती अपना पारिवारिक धर्म नहीं निभा सकते तो फिर हम ये सभी कर्तवे निभाते हुए आध्यात्मिक कैसे बने इससे पहले कि हम समधान की चर्चा करें हम जो लोग आध्यात्मिक हैं उनके दिर्शिकों भी समझ लें अगर आपने मेरा आध्यात्म ही है दुखों का स्थायी अंध वक्तवे सुना हैं तो आपको ग्यात होगा कि आध्यात्म एक प्राकरतिक संपधा है और सब के लिए एक समान है आध्यात्म में जाने के या इसके अनुसरन के कई मारग हैं रिशी पतंजली या योग के अनुसर चार मारग हैं जिनने हम भक्ति योग ज्यान योग कर्म योग और राज योग से जानते हैं इसी प्रकार गौतम बु� ऐसे ही पूरे संसार में समय समय पर अलग अलग महान आत्माओंने अलग अलग मारग सुझाए हैं आप तंत्र,

मंत्र और यंत्रक्रा भी उप्योक कर सकते हैं आप कुंदलीनी जागरन के मारग पे भी जा सकते हैं समझने की बात यह है कि यहाँ अध्यात्म अन्त नहीं केवल एक यात्रा है इस यात्रा के लिए जो आप सादन या वाहन चुनते हैं वह आपका मारग केलाता है इन दोनों का मेल आपको आपके गंतवे तक यह यूं कहें कि डेस्टिनेशन तक पहुँचने में सायता करता है इन मारगों का उल्लेक मैं केवल इसलिए कर रहा हूं कि आप अपनी समझ से चुनाव कर सकें मारग चाहे कोई भी हो आप पारिवारिक जीवन को साथ लेकर चल मिल जाएंगे मेरा अनुरोध आप से यह है कि हम इस पे विचार करें और यह देखें कि यह सब हमारा किसी वस्तव को देखने का और समझने का क्या द्रिश्टी कौन है उस पे निर्वर करता है कोई मंदर मस्जिद गुर्दुवारे या गिर्जागर में रहकर भी भक्त न है ऐसे ही हमारे पास कहीं उधारण उपलब्द है जिसमें आध्यात्मिक लोगों ने परिवार में रहते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति की है यह सारे विचार विशेष रूप से उन आध्यात्मिक साद्गों के लिए है जो या तो अभी पारिवारिक जीवन में आय नहीं है महत्तपून यह है कि आप अध्यात्म के मार्क में चुनाव में समय वेर्तना करते हुए यह जानें कि मार्क का चुनाव और पालन आपकी जागरती के साथ स्वतह ही हो जाएगा और यह भी सोचें कि आप जहां हैं वहां से क्या कर सकते हैं जो बीद गया वो बीद गया उ अपनी दिशा निधारित कर सकते हैं तो उसके लिए आप यह सोचें कि आप जहां हैं वहां से क्या कर सकते हैं और एक दूसरे को साथ लेकर कैसे चल सकते हैं इसका घ्यान अरजन करें और अब हम इसी घ्यान को समझेंगे अध्यात्म का आपके पारिवारिक जीवन से कोई � पारिवारिक धर्म का या कर्तव का पालन भी करते हैं तो आपके अध्यात्म में भादक ना होकर आपके अध्यात्म में सहयक हो सकता है आप कहेंगे कि ऐसा क्यों है कि हमें इन बातों का ध्यान रखना पड़ेगा उसके लिए आपको यह याद दिलाना मेरा कर्तव है कि हर क वो कौन सी बाते हैं जिनको ध्यान में रखकर हम परिवार और अध्यात्म में समन जैसे बना सकते हैं और दोनों को साथ ले सकते हैं इसके लिए आपको केवल इन चार सूत्रों का पालन करना अवश्यक है पहला कर्म करते समय आपकी जागरुकता दूसरा कर्म करने के आपक और चौता आध्यात्मिक क्रियाओं में आपकी निरंतर्ता आईये अब इन चारों को थोड़ा समझ ले पहला सूत्र है कर्म करते समय आपकी जागरुकता हम जब भी अपने कर्तवों की पूर्थी करें चाहे वो कितने भी भौतिक क्यों ना हो हम अपनी जागरुकता को बनाए रखें और अपने अंतर मन में बार बार ये स्मर्ण करते रहें कि हम जो ये कर्म कर रहें हैं वो केवल परिवार के निर्वर्ण के लिए हैं आप जब कौन्शेसनस में और लगाता स्मर्ण करते रहने पर अपने अवचेतन यानी सब कौन्शेस में जागरुकता ला सकेंगे ऐसा करने से आप कर्म करते समय जागरुक रहेंगे और आप जितनी जागरुकता के साथ अपने भौतिक कर्म करेंगे उसमें आपके आसत या लिप्त होने की संभावना अपने आप कम होती चली जाएगी दूसरा सूतर है किसी कर्म को करने के आपके भाव जब भी आप कर्तवों का पालियन करें अपने को ये बार बार स्मलन कराएं कि आप लालच या भोग के लिए नहीं बलकि कर्तवे के लिए कर्म कर रहे हैं अगर आप भोग के लिए कर्म करेंगे तो आप माया में और फस्त धर्म है और ये आपके जीवन को सफल बनाने में साधन भी है जिस काम को करें पूरी लगन से करें आपके अपने कर्मों में समर्पन्द से आपके अंतर मन में द्वन्द यहीं कहीं कि गलानी भाव उत्पन नहीं होंगे और आप अपने कर्मों को पूरी निष्ठा से पूरा कर सकेंगे और उतने ही आपको उसके लाब भी मिलेंगे अब क्योंकि आप जागरुख हैं अपने भावों को भी देख रहे हैं भोग या लालच से नहीं बल्कि धर्म का पालन करने के लिए कर्म कर रहे हैं तो इससे जड़ू हुई माया आप पारिवारिक जीवन में समय-समय पर हमें अपने कर्मों की समीख्षा या अवलोकन करना अनिवार रहे हैं हम जब-जब समीख्षा करते हैं तब-तब हमें आबास होता है कि कहां सुधार की होचकता है और आप ये भी जान पाएंगे कि कर्मों को करते समय आपके भाव कैसे � ये आटोमेटिक क्रियाएं या प्रतिक्रियाओं को भी देख सकेंगे और कहां कितना सुधार करना है ये भी जान सकेंगे ये है अवलोकन आपको अपनी गल्तियों को ठीक करने की समझ भी देगा और आपके भावों को सुधारने का अवसर भी समय के साथ साथ आप ये पाएंगे कि आप कर्म भी कर रहे हैं और आपके भावों पर आपकी पकड़ मजबूत भी होती जा रहे हैं जैसे जैसे आपकी समझ जागेगी वैसे वैसे आपका अपने भावों पर नियंतरन भी बढ़ेगा और जैसे जैसे आपका अपने भावों पर नियंतरन बढ़ेगा वैसे वैसे आप अध्यात्मिक मारंग में प्रगती कर सकेंगे चोथा सुत्र है अध्यात्मिक क्रियाओं में आपकी निरंतर्ता हम जब भी कर्म कर रहे हो और हमें ये ग्यात हो कि कर्मों को करना हमारा धर्म पालन का दाइत है तो ये और भी महत्वपून हो जाता है कि हम अध्यात्मिक क्रियाओं भी साथ साथ करते रहे हैं अब आप अध्यात्मिक क्रियाओं के लिए ध्यान करते हैं योग करते हैं पूजा पाठ करते हैं या कोई और अध्यात्मिक परक्रिया अपनाते हैं ये आप पर नरवर है लेकिन हमें अध्यात्मिक क्रियाओं में निरंतर्ता लानी है जो आपके अध्यात्म को गती भी देगा और आपको संसारोपी माया से दूर भी ले जाएगा ये अध्यात्मिक क्रियाओं इसलिए भी महत्स पून हो जाती है कि इससे आपके अंदर अध्यात्मिक उर्जा का विकास होता है जिकने नरंतर्ता आप अपने अध्यात्मिक क्रियाओं में लाएंगे उतने ही आपकी अध्यात्मिक उर्जा बढ़ेगी और जैसे जैसे आपकी अध्यात्मिक उर्जा का विकास होगा वैसे वैसे आपकी आशक्तिया,

वासनाय ये यूं कहें कि भोक की प्रवर्ती कम होती चली जाएगी इस प्रवर्ती को कम होने को आप माया के प्रफाव को कम होने के रुप में भी जान सकते हैं कुछ समय बाद आप स्वेम ही देखेंगे कि परिवार में रहकर और पारिवारिक जीवन का पालन करके भी आप अध्यात्म में आगे बढ़ रहे हैं अब जब आप अपनी ये बढ़ोतरी देखेंगे तो इससे आपको गलानी भाव उत्पन ना होगा और आप परिवार और अध्यात्म में सामंजस से बना पाएंगे क्योंकि आप परिवार और अध्यात्म दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं तो बस इतना ध्यान रखें कि दोनों में ही आपकी एक जैसी निष्ठा और निरंतर्ता अनिवार है अब जब कि हमने ये चार सूत जान लिये हैं तो आए एक ऐसे पहलू पर चर्चा करें जो जब भी हम परिवारिक जीवन और अध्यात्म की बात करते हैं तो ये प्रशन सबके सामने उपस्तित हो जाता है और वो है ब्रह्मचर्य का ब्रह्मचर्य को बहुत ही अलग रूप से जाना गया है और समय के साथ इसकी व्यक्ष्या और इसकी मूल समझ में भी परिवर्तन आया है वैसे तो हम इस विशे पर अपने अगले वक्तिव में चर्चा करेंगे परन्तु आपकी जानकारी के लिए ये बताना अनिवार है कि वैसे है उस पर भी केवल कुछ विशेश लक्षों को अगर हम छोड़ दें तो ब्रह्मचर्य का पालन आपके अध्यात्म के मार्ग में अवरोध नहीं बनेगा अभी के लिए आप केवल इतना जान लें कि अगर आप वासना के वशीभूत कारे करते हैं तो उसका आपको व पारिवारिक जीवन में आपको आपके धर्म का पालन अनिवारे है लेकिन ये भी ना हों कि आप अपने भोग विलासिता के प्रभाव में ये सब करें शारेरिक संबंद जीवन की एक सचाई है और अनिवारेता भी इसके आभाव में सुष्टि का श्रेजन और पालन संभव नहीं है ये उतना ही मायार स्वरूप है जितना ये जागरुकता और अध्यात्म में सहयक इस विशे पर निश्चित ही हम अगले वक्तवे में चर्चा करेंगे तो आईए अब उस प्रश्न पर आते हैं जिससे मैंने अपना ये वक्तवे आरंब किया था और वो है कि क्या पारिवारिक जीवन अध्यात्म में अवरोध है तो इसका अपतर है हां और ना हां अगर आ आपके भाव सही है और आप केवल कर्तवों का निर्वा कर रहे हैं तो ये आपके अध्यात्म में बादक नहीं है इसके लिए ये आवश्चक है कि हम दिये गए चार सूत्रों का पालन करें अभी के लिए आशा है कि आप ये समझ गए होंगे कि हम कैसे इन चार सूत्रों को ध्यान में रख कर परिवार में रहते हुए भी अध्यात्म में प्रगती कैसे करें वैसे आपको ये जान कर अचरज होगा कि अगर आप पारिवारिक हैं और अध्यात्मिक नहीं तो आपका अध्यात्मिक होना आपके पारिवारिक जीवन को भी सफल कर देगा ये आपके रिष्टो को नया आयाम भी देगा और आपको आपके परिवार में और भी अधिक महत्रपूम बना देगा समाज में भी इसका आपको सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा इस वक्तव में हमने केवल अध्यात्म और परिवार के विशे के मूल में जाने का एक दिश्टिक उन पाया है जो मूल रूप से परिवार और अध्यात्म के समावेश को समझने में सहयक है अगर आप इसको और सरलता से समझना चाहते हैं जिसमें आपको ये सूत दिन चरह में कैसे उतारने है या यूँ कहें कि जीवन और परिवार की छोटी-छोटी चीजों,

समस्याओं या गति-विद्यों में कैसे वैवार करना है ये समझना चाहते हैं तो उसके लिए आपको मेरे अगले वक्तव्य की पतिक्षा करनी पड़ेगी तब तक आप मुझे अपनी प्रतिक्रिया और प्रश्न कॉमेंट्स के माध्यम से दे सकते हैं मैं अपने विचार अपने आने वाले वक्तव्य में आपके प्रश्नों के साथ अवश्य ही सांजा करूँगा वैसे मेरा अगला वक्तव्य ब्रह्मचरे की समझ और से जुड़े पश्ण और पारिवारिक जीवन की चोटी चोटी गतिवेधियां कैसे करनी हैं इस विशे पर ही होगा तब तक इस आशा से कि आप अपनी समझ का विस्तार करेंगे और पारिवारिक जीवन को आध्यात्म के मार्ग में बादा ना मानते हुए अपने असली स्वरुप को जानने में सक्षम होंगे

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Vikas AryaCarmel, IN, USA

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