प्रणाम साधक मुदेद मन साधक अपनी इस यात्रा में हम अपने गंतव्य तक पहुँचने की स्थिति में आ गए हैं गत सत्तर दिनों में हमने एक बहुत लंभी यात्रा करी है और इस यात्रा में अब हम उस जगा पर पहुँच गए हैं जहाँ द्यागपक आप से रास्ते की ख्यमा माँगेगा अब यहां से आगे का रास्ता आपका अपना है आपके अनुभव अपने हैं आपका ध्यान अपना है तो इस ध्यान की पद्धती जो हमने द्रिद भूमी करी है पिछले कुछ दिनों में आईए इसका अभ्यास में जो मेरी तरफ से एक आपको पग पग पे गाइडेंस मिल रही थी उसको मैं थोड़ा कम कर लेता हूँ और आप उस गाइडेंस को अपने आप करना शुरू करें और आज और कल की दो कक्षाओं में हम इसको ध्रिद भूमी कर लेते हैं और उसके बाद फिर सत् चेत आनन अपनी अपनी अपना अपना रास्ता अपने अपने गंतवे अपना अपना ध्यान अपने अपने अनुभव आप अपने अनुभव मेरे से साजा कर सकते हैं मैंने अपना इमेल आईडी जो है वो अपनी इस ध्यान के उसमें शुरू में रखा हुआ है वहाँ पे आप मेरे इमेल आईडी पे अपने अनुभव मेरे से साजा कर सकते हैं खुशी बाटने से बढ़ती है ठीक है तो ठीक है यही ध्यान का होता है तो आईए आज की यात्रा शुरू करते हैं आज की यात्रा में हम सबसे पहले अपने शरीर को जब भी हमने ध्यान लगाना है सबसे पहले अपने शरीर को बहुत ही आराम दे पुजिशन में लियाना है बिल्कुल अगर आल्थी पाल्थी मारके नीचे बैठा जा सकता है तो भाँ बै और लंबा सा सांस लेके छोड़ दें अब साधक हम दोनों अब धीरे धीरे आँखें बंद करेंगे और शरीर को स्थिर करने की जो प्रक्रिया मैं पहले बोल बोल के करता था उसको मैं अपने मन में करूँगा आप भी अपने मन से अपने शरीर को स्थिर करें और जब यह स्थिर शरीर हो जाएगा मैं बोलूँगा नहीं आप शरीर को स्थिर स्वयम कर लंबा सा सांस लें आँखें बंद करें और शुरू करें अपने कंधों से और हाँ हर अंग प्रत्यंग पे तीन बार जरूर बोलें यह एक पद्धति हमको कौतम बुद्ध के बारे में जितने भी लिखेवे लिटरेचर हैं उसमें से मिलती हैं उन्होंने कभी भी अपने बिक्षियों को एक बार नहीं बोली तीन बार बोली है तो तीन बार बोलने से हमारा भी शायद मन एक आगरचित हो जाता है आई शुरू करते हैं लंबा सा सास लें आखें बंद कंदे की नसे धीली धीली धीली यहां से आगे आप अपने आप करें पूरा शरीर स्थिर पूरा शरीर शान पूरा शरीर स्थिर पूरा शरीर शान हमारी सादना का यह पहला चरण है अपने शरीर को स्थिर करना हमारी सादना का पहला चरण है आप अपनी पदती अपनी स्मरिती के अनुसार पना सकते हैं कंधों से शुरू करके मस्तिष्क को स्थिर करके पीट से नीचे उतरके लातों को स्थिर कर ले और पीट पे उतरने से पहले अपनी बुजाओं को स्थिर कर ले इस पदती को दृड़ भूमी कर ले और ये अनुभव करें के पूरे शरीर के हर अंग प्रत्यंग जो है वो स्थिर है अब हम दूसरा चरन पकड़ते हैं शरीर को स्थिर करने के बाद अपनी श्वासों को स्थिर करें श्वासों को स्थिर करने के लिए श्वासों का पूरा छे चरनों का प्रयोक करें और अपनी नाभी तक जाएं और अपने श्वासों को धीरे धीरे हलका हलका करते जाएं नासिका से श्वास अंदर बाई नासिका से अंदर उपर मुड़ी मुड़के गर्दन में पहुँची कंट से फेफलो में फेफलो से नीचे हमारी नाभी पर और नाभी से चूटती हुई हमारी श्वास नासिका से बाहर ध्यान में देने वाली बातें हमारी श्वास धीमी करने के लिए हम अपनी नाभी का प्रयोक करेंगे हम कल्पना करेंगे के अंदर से नाभी को हम खीच के अलकासा अपनी रीड की हड़ी की तरफ लेके जा रहे हैं और फिर हम इसको छोड़ देते हैं जैसे हम इसको छोड़ेंगे हमारे फेफलो में हवा आ जाएगी जितनी मत्रा में चाहिए उतनी ही आएगी शुरू करें ध्यान श्वास तेर तेर तेर श्वास शान्त शान्त शान्त ध्यान कहीं भटक रहो उसको श्वासों पे वापस ले आए दोनों अनुभव इकठे करें हमारा शरीर स्थिर और हमारी श्वास नियंतरन में अलकी धीमी श्वास ये ध्यान का दूसरा चरण है ध्यान के तीसरे चरण में हम अपने सभी प्रकार के विचारों को शान्त करेंगे उनकी उर्जा अंतर मुखी करेंगे तो विचारों को शान्त करने के लिए सबसे पहले विचारों को शान्त फिर कल्पनाओं को शान्त फिर स्मृतियों को शान्त अगर हम अपनी कल्पनाओं और स्मृतियों को शान्त कर ले तो हमारा मन भटकना बंध हो जाये सभी विचार शान्त शान्त शान्त स्मृतियों के विश्च को मस्तिश के मध्य भाग से धोना ना भूले और इसको पिछले भाग में खीच के सैयम में मिश्रित कर ले और ये सैयम रक्त में खुल गया खुल गया खुल गया उपना ध्यान तीनों चर्णों पे इकठा करें मेरा शरीर स्थिर है मेरी श्वास नियंत्रत है मेरा मन शान्त है और भभूत पूर शान्ती का अनुपव करते रहें कोई विचार अगर इस शान्ती को भंग करता है तो उस विचार की उर्जा को खीच के अंदर ले आएं और कहां लेके जाएं अपने मस्तिश के पिछले भाग में सैयम से मिला दें उसे सैयम से संयोग तीस्रा चरन पूरा करने के बाद हम चोथे चरन में ओम का उचारन करेंगे अपने आप जब आप ओम का उचारन शुरू करें तो आप उंगलियों पे गिनते हुए कर सकते हैं अगर मन स्थिर नहीं हो रहा अगर मन स्थिर हो रहा है और ओम के उचारन में रस का अनुभव हो रहा है तो जब तक रस का अनुभव है आप इसको खीचते जाएं किसी दिन कम ओम का उचारन के बाद मन करेंगा उठने का कभी मन करेंगा लगातार करने का तो आईए ओम का उचारन करते हैं बहुत ही मधुर,
सौफ्ट,
सौम्य और अपने आप सहज,
सहज,
लय में और मधुर साथक शरीर को स्थिर करने से श्वासों को नियंत्रित करने से विचारों को शांत करने से और ओम का उचारन करने से हमारा अंत करन शुद्ध हो जाता है और अब पिलकुल शांती से इस अवस्था को जितना लंबा ध्यान लगाना है लगाते रहें मन उखड के दाएं बाएं जाएगा,
कोई स्मृति जागेगी,
कोई कल्पना उठेगी,
उन सब स्मृतियों और कल्पनाओं पर मस्कुरा के देखना है वो लुप्त हो जाएगी,
उसकी ऊर्जा आपकी मस्कुराहट में आजाएगी और इस ध्यान की अवस्था में बैठे रहें,
बैठे रहें,
बैठे रहें अन्धर यंदर आनंद के ज्झरणे का अनुभव करते रहें,
करते रहें,
ध्यान कहीं भी भटके,
हमने अपनी पिछली तक्डिबं दो महीने की तपस्या में बहुत सारी विचारों को हमने द्रिणभूमी किया है,
उनमें से हम किसी पर भी ध्यान लगा सकते हैं,
हम अमरित सरोवर पर ध्यान लगा सकते हैं,
हम ब्रह्म रिशीयों के तप पर ध्यान लगा सकते हैं,
हम उस घाटी पर ध्यान लगा सकते हैं,
जहां सभी ब्रह्म रिशीयों हमको अशीरवात दे रहे हैं,
हम देवताओं पर ध्यान लगा सकते हैं,
जहां उनकी अनुकम्पा से हमारे मन में,
हमारे हुदे में बुद्धी आ रही है,
हम विराट रूप पर ध्यान लगा सकते हैं,
हम अपराशक्ती पर ध्यान लगा सकते हैं,
हम किसी भी विचार पर,
किसी भी धे पर,
जो हमने पिछले सत्तर दिनों में एकठे किये हैं,
हम उन सब में किसी पर भी ध्यान लगा सकते हैं,
और उस ध्यान की प्रक्रिया को हम अपनी जंगल की पक्डंडी से शुरू कर सकते हैं,
जंगल की पक्डंडी में चलें,
उस कल्पना को जितना प्रगार करना है,
प्रगार करने,
हम कल्पना का सहारा लेके हम ध्यान की उस सवस्ता में पहुंचते हैं,
जहां हम कल्पना को भी और केवल और केवल आनन्द का अनुभव करेंगे,
आनन्द,
और ये आनन्द का अनुभव हम अरोपित नहीं करेंगे अपने उपर,
ये अंदर से फूटेगा,
ये अंदर से निकलेगा,
हमने दो महिने के अभ्यास में बहुत जादा प्रगती कर ली हैं,
अब हम अपने विचारों के साक्षी बन सकते हैं,
हम अपनी कल्पना के साक्षी बन सकते हैं,
हम कल्पना के वेग में बह नहीं जाते हैं,
हम कल्पना के साक्षी बनते हैं,
और जैसे हम कल्पना के साक्षी बनते हैं,
हमारी कल्पना घुल जाती है,
हमारे आनंद में मिश्रत हो जाती हैं,
और आनंद हमारे रक्त में आ जाता है,
और रक्त पूरे शरीर को आनंद में ही कर देता है,
पूरा शरीर आनंद में ही हो जाता है,
हमारा ध्यान और प्रगाड हो जाता है,
आनंद में हमारी द्रिध शक्ती और बढ़ जाती है,
और बढ़ जाती है,
और बढ़ जाती है,
साधक इस ध्यान के वस्ता को जितना आगे बढ़ा सकेंगे,
हम बढ़ाएंगे,
इसमें हमारे � अभी तक के पूर जनम के किये हुए ध्यान भी आते हैं,
और हमारे शरीर की क्षमता भी आती है,
और हमारे विश्व के साथ राग और द्विश भी आते हैं,
इन सभी स्थितियों में को हम संतुलित करके एक सहज तरीके से अपने ध्यान को बढ़ाते रहें,
बढ़ाते रहे शरीर स्थिर,
श्वास नियंतरित,
विचार शान्त,
ओम का उचारण और ध्यान,
पूरे पाँच चरण हैं हमारी सादना के,
इन पाँचो चरणों को हम अपने आप,
अपने स्थितियों,
श्रवन हमने कर लिया,
कुछ अभ्यास भी कर लिया,
उस पे आप मनन भी कर लेंगे,
और इसको अपना निथी ध्यासन में परिणित कर लेंगे.
इसको करने का एक और तरीका भी है,
जितनी भी ये 70 के करीब वीडियोज हैं,
ये सारे इसी 7 am meditation की प्लेलिस्ट में होंगे,
इनको मैं नंबर कर दूँगा,
अभी तो डेट लिखी हुई है,
डेट की जगा इनको मैं नंबर कर दूँगा.
जिस भी नए साधक को आप जोड़ें,
उससे आगरह करें के नंबर कहीं से भी शुरू कर ले,
शुरू करके अगर उनको अच्छा लगे,
तो आप उनको कहें के नंबर एक और दो सबसे पहले देख ले,
और उसके बाद कोई साभी एक वीडियो देख ले,
हमारे पास 70 अलग ध्यान के ध्यान के केंद्र हमको मिल गए हैं,
हम उन सब में अपना ध्यान बढ़ाते रहेंगे,
कल हम एक बार और मिलेंगे और उसमें हम अपने इसी पददी को थोड़ा और मैं और अपना जो अभी आज तो मैंने काफी हद तक आपके साथ guidance दी है,
कल मैं अपनी guidance औ फिर आप अपने आप अपने प्यारों पे खड़े होके अपने ध्यान को आगे बढ़ाते रहेंगे साधक,
आज की यातरा यहीं तक,
कल सुबह फिर मिलते हैं,
सुबह साथ बजे,
तब तक के लिए ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
धन्यवाद साधक