प्रणाम साधक,
मुदेत मन आज की इस साधना में हम एक कड़ी और जोड रहे हैं हम आज की साधना के अंत में एक चोटा सा सत्संग करेंगे साधना खतम होने के पस्चात मैं बोलूगा सत्संग और उसमें मैं आपके साथ करम बंधन के उपर अपने विचार साझा करूगा अभी तक की साधना में हमने दुश विचारों को और हमारे मन की कुन्थाओं को दूर करने का प्रयत्म किया है अभी तक की यात्रा में हम इसमें काफी हद तक सफल भी हो गए है अब जो स्थान इन दुश प्रवृतियों ने और दुश विचारों ने हमारे मन में रखा हुआ था और जो स्थान इनके जाने से रिक्त हो गया है अब हम उस स्थान को अच्छे सूव विचारों से भरते हैं सत्संग उसी का एक प्रयास है तो आईए आज की साधना हाँ दूसरा आज की साधना में जब आज हम अपने उस प्रिय अमरित सरोवर से आगे जाके एक नया अनुभव जोडेंगे एक नयी कल्पना को जोडेंगे,
एक नया अनुभव जोडेंगे और एक नय तरीके से और आगे बढ़ेंगे तो आईए आज की साधना शुरू करते हैं,
आज का ध्यान लगाना शुरू करते हैं मन को एक दम मुद्धित कर ले,
मुद्धित मन,
कोई चिंता नहीं,
कोई भी,
किसी प्रकार की भी चिंता नहीं हम सुप्रीम परम आनंद के पात्र हैं,
हम दूसरों के लिए आनंद की प्रेर्णा का स्रोत्र हैं हमारा मुक सब के लिए एक प्रकाश पुझ है,
जिसको देखते ही सब के मन में शान्ती आ जाती है हमारी यही चेष्ठा हमेशा रहनी चाहिए,
आईए शुरू करते हैं लंबा सा सान्स ले और छोड़ दे,
लंबा सा सान्स छोड़ दे आखें धीरे धीरे बन,
शरीर एकड़ाम स्थेव कंदे की नसे डीली,
डीली,
डीली गर्दन की नसे डीली,
डीली,
डीली कनपटियों की नसे डीली,
डीली,
डीली पूरे मस्तक की नसे डीली,
डीली,
डीली पूरा मस्तक चा,
चा,
चा दोनों बुजाएं डीली,
डीली,
डीली कोनियों के जोड डीले,
डीले,
डीले कलायों के जोड डीले,
डीले,
डीले पूरी पीठ डीली,
डीली,
डीली दोनों कुले डीले,
डीले,
डीले दोनों जंगाएं डीली,
डीली,
डीली गुटनों के जोड डीले,
डीले,
डीले इडियों के जोड डीले,
डीले,
डीले दोनों पैरों के जोड डीले,
डीले,
डीले पूरा शरीर शाम,
शाम,
शाम श्वासे एकदम सहेज,
धीमी,
धीमी हलकी सी श्वास,
नाग से अंदर,
फेफ़डों से होती हुई नीचे,
नाभी को छूती हुई,
वापस निकल गई धीरे से,
हलकी सी श्वास,
श्वास पे सारा ध्यान केंद्रित अपना सारा ध्यान सभी चिंताओं,
आकांशाओं,
महत्वकांशाओं,
भय,
क्रोध से इकठा करके,
खीज के,
अपनी श्वासों पर ले आए,
हर विचार निरर्थक है,
केवल हमारी श्वासों पे हमारा ध्यान सार्थक है,
अपने ध्यान को अपनी श्वासों पे सार्थक करें,
और श्वासों को एकदम धीमा कर दें,
अत्यंत धीमा,
धीमा,
धीमा,
श्वास एकदम धीमे,
धीमे,
धीमे,
धीमे और धीमे,
धीमे,
धीमे,
धीमे भीमा श्वास सारा ध्यान श्वास पे केंद्रे,
श्वास का नासिका से शुरू गोना,
छाती में जाना,
नाभी को चूना,
और फिर मुड़ जाना और बिना श्वास के एक दो पल बिताना,
बाहर से श्वास अंदर आने से पहले एकदम धीमा श्वास,
सारा क्रोध शांत,
सारी चिंताएं शांत,
सारी आकांशाएं शांत सारा भय शांत,
सारी ईर्शा शांत,
सभी विचार शांत मन एकदम स्थिर,
मस्तिशक वृति हीन,
कोई भी वृति नहीं बन रही,
कोई भी स्मृति पुराने उठके नहीं आ रही मन एकदम स्थिर,
मस्तिशक एकदम स्थिर,
सिर का सारा भोजा समाथ,
सिर का सारा भोजा समाथ,
स्थिर,
स्थिर,
स्थिर अभूत पूर्व शांती का अनुभव,
अभूत पूर्व शांती,
शांती,
शांती,
सभी विचार शांत मन एकदम सुद्रिड और सजग,
मन सुद्रिड और सजग,
मन उपस्थेत,
साधक उपस्थेत,
साधक इन सब का द्रिष्टा,
साधक अपने पूरे शरीर की स्थिरता का द्रिष्टा,
साधक अपने मन का वृत्ती हीन होना,
उसका द्रिष्टा,
साधक अपने मन की मुद्धता का द्रिष्टा,
साधक सुप्रीम द्रिष्ठा,
साधक सर्वोपरी द्रिष्ठा,
साधक सजग,
साधक सजग,
साधक सजग,
मन शान्त,
श्वास नियंतरित,
शरीर स्थेर,
मस्तेश्क वृत्ती हीन,
मस्तेश्क वृत्ती हीन,
मस्तेश्क स्मृती हीन,
मस्तेश्क भय हीन,
मस्तेश्क एकदम शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
शान्त,
परम शान्ती का अनुभव,
परम शान्ती का अनुभव,
मुख पर एक चोटी सी मुस्कान के पूठने का अनुभव,
अनुभव,
अनुभव,
मन की मुदितता का अनुभव,
लंबा सा सांस लेके ओम का उचारन शुरू करेंगे,
ओम,
अपनी गती से,
अपनी क्षमता से,
अपने समय से,
ओम का उचारन शुरू करेंगे,
ओम,
विरित्ती हीन मस्तिश का अनुभव करेंगे,
परम शान्ती का अनुभव करेंगे,
और कल्पना करेंगे,
हम उसी पक्डंडी पे चलते जा रहे हैं,
जिसके दोनों तरफ गास है,
फूल उगे हुए हैं,
तितलियां उड़ रही हैं,
बमरे गुञ्जन कर रहे हैं,
तुशार मंद मंद बह रही है,
चार अत्रा पर्याली है जिंगल में,
और चलते चलते हमारे एक स्रोवर पे पहुंच जाते हैं,
जिसका जल एकदम शान्त,
निर्मल और स्वच्च है,
इतना साफ है कि उसके नीचे के पढ़ेवे कंकर भी दिखाई दे रहे हैं,
उसी जलाशे के कोने में एक चोटा सा पैदल पार करने वाला दाहिनी ओर एक पुल है,
हम उस पे पैदल चलते हुए आगे निकल जाते हैं,
आगे जाते हैं,
हम एक पहाडी मिलती है,
हम उस पहाडी पे चलना शुरू कर देते हैं,
धीरे धीरे हम उचाई प्राप्त करनी शुरू कर देते हैं,
और धीरे धीरे हम उस जगा पहुंझ जाते हैं,
जहां चारो तरफ बरफ ही बरफ है,
हिम एकडम,
हिम अच्छादित है,
पूरा सफेद,
एकडम सफेद,
और धीरे धीरे चलते चलते हम उस चोटी पहाडी के शिकर पर पहुँझ जाते हैं,
बहाँ पहुँझ के आगे जो द्रिश्य देखते हैं,
अद्भूत द्रिश्य,
पूरी घाटी सफेद,
हिम से भरी हुई है,
और हमारे सामने भगीरती की पीक है,
भगीरती जिसके नीचे नंधन काननवन है,
तपोवन की ये घाटी है,
तपोवन नंधनवन की घाटी है,
जहां असंग्य ब्रह्म रिशियों के सूक्ष्म शरीर तपस्या कर रहे हैं,
अब हम जब ओम का उचारण करेंगे,
जो दूसरा उचारण हमको सुनाई देगा,
वो उन ब्रह्म रिशियों के ओम का उचारण होगा,
ब्रह्म रिशियों,
रिशी भी तपस्या कर रहे हैं ओम मे और हम भी उस घाटी में धीरे धीरे आगे को सरकते हुए जा रहे हैं,
और हम भी ओम का उचारण कर रहे हैं,
हिम मचा देते एकदम स्वच्च निर्मल साव,
घाटी ओम सभी ब्रह्म रिशियों का संरक्षन हमको मिल जाता है,
सभी ब्रह्म रिशी हाथ उठाके हमको आशीर्वात देते हैं,
और ब्रह्म तेज हमारे अंदर अवतरित हो जाता है,
ब्रह्म तेज हमारे माथे के बिंदी वाले पॉइट से,
हमारे माथे से हमारे अंदर मस्तिष्ख में जाता है,
पूरा मस्तिष्ख एकदम जलन जले प्रज्जलित हो जाता है,
पूरा मस्तिष्ख जोतिपुञ्ज बन जाता है,
पूरा मस्तिष्ख,
और सभी ब्रह्म रिशी हमको अशीर्वात देते हैं,
हाथ उठाते हैं,
उनके हातों से ब्रह्म तेज निकलके,
हमारे मस्तिष्ख को एकदम प्रज्जलित कर देता है,
वही ब्रह्म तेज नीचे हमारे अंदर पूरे शरीर में रक्त में गुल जाता है,
और रक्त के साथ ब्रह्म तेज हमारे पूरे शरीर को पुलकित कर देता है,
ब्रह्म तेज,
ब्रह्म हो जाते हैं हम,
हम में ब्रह्म तेज आ जाता है,
पूरा प्रकाश,
प्रकाश का जो प्रकाश है,
वो ब्रह्म तेज होता है,
और प्रकाश के अंदर की जो ऊर्जा होती है,
वो ब्रह्म तेज है,
और ब्रह्म तेज हमारे पूरे शरीर में आ जाता है,
हमारा शरीर निरोग हो जाता है,
शरीर के सभी मल खतम हो जाते हैं,
और हमारा शरीर फुर्णा से भर जाता है,
सुर्ती से भर जाता है,
इस कल्पना को और प्रगाड करें,
कि हम उस नंदन बन की घाटी में हैं,
जिस घाटी में चारो तरफ बरफ है,
और बरफ में असंख ब्रह्म रिशी तपस्या कर रहे हैं,
उनके सूक्ष्म शरीर प्रकाशित है,
और उन सूक्ष्म शरीरों में से वो अपना हाथ उठाके हमको अपने ब्रह्म तेज से अवगत कराते हैं,
उनका हाथ का उठायावा ब्रह्म तेज हमारे शरीर में अवतरित होता है,
ब्रह्म तेज हमारे शरीर में अवतरित होके हमारे शरीर के सभी रोगी अंगों को निरोग कर देता है,
सभी रोगी अंगों को निरोग कर देता है,
अगर हम ब्रह्म तेज से जब हम कलपना करते हैं,
हमारे माथे से,
हमारे शरीर में,
हमारे रक्त में ब्रह्म तेज गुल गया है,
तो हम अपने उस अंग की भी कलपना करते हैं,
और हम उस ब्रह्म तेज को उसी तरफ प्रजुलित करते हैं,
हमारा अंग उस ब्रह्म तेज से और भी जलै मान हो जाता है,
और भी प्रजुलित हो जाता है,
स्वच हो जाता है,
निरोग हो जाता है.
ब्रह्म तेज का अवतरन,
ब्रह्म तेज के अवतरन का अनुभाव,
ब्रह्म तेज के अवतरन का अनुभाव,
नंधन वन की,
तपोवन की,
तपोवन की परंपूजनिय घाटरी,
और उस तपोवन की घाटी में असंख ब्रह्म रिशी,
सभी ब्रह्म रिशी अपना सन्रक्षन देते हैं,
और हमको अपने अंदर ब्रह्म तेज का अवतरन कराते हैं,
अनुभाव करते रहें कि ब्रह्म तेज का अवतरन और भी जादा और प्रगाड हो रहा है,
हमारा शरीर और भी जादा निरोग और स्वस्थ हो रहा है,
हमारे चित की शुद्धी हो रही है,
हमारा चित शुद्ध हो रहा है,
हमारा मस्तिश्क निरमल हो रहा है,
हमारा शरीर निरोगी हो रहा है,
ब्रह्म तेज हमारे प्राण शक्ती से मिलकर एक अद्भूत मिश्रन बनाता है,
जो अमरित है,
हमें हमारा अमरित मिल रहा है,
हमें हमारा अमरित मिल रहा है,
ये अमरित हमारे श्वासों से भी अंदर आ रहा है,
हमारे रक्त में घुला हुआ है,
और सभी ब्रह्म रिशियों का सन्रक्षन हमें चारों तरफ से एकड़म सुरक्षित कर रहा है,
हर आदि दैविक भौतिक और अध्यात्मिक ताप से हमारा सन्रक्षन है,
हम संरक्षित हैं,
हम सुरक्षित हैं,
हम सुरक्षित हैं,
ब्रह्म तेज,
ब्रह्म तेज हमारे पूरे शरीर में,
रक्त में घुलके पूरे शरीर को एकड़म निरोगी बना रहा है,
इस कलपना को और प्रगाड करें,
इस अनुभव में और विश्वास करें,
कि हाँ,
यह हो रहा है,
हो सकता नहीं है,
यह हो रहा है,
हमारा शरीर निरोगी हो रहा है,
हमारा मानस पटल साफ हो रहा है,
हमारी वृत्तियां शांत हैं,
हमारी कलपना में जो तपवन की घाटी है,
वो घाटी और प्रगाड हो रही है,
ब्रह्म रिशी और और जादा तेज,
और प्रगाड तेज हमारी अंदर अवतरित करा रहे हैं,
ब्रह्म रिशी अवतरित करा रहे हैं,
धीरे धीरे ध्यान से बाहर आएं,
सबसे पहले पैरों की उंग्लियों को हलके हलके हिलाएं,
उनकी तरंगों से पूरा शरीर हमारी सजगदा में आ रहा है,
आथों की उंग्लियों को हलके हलके हिलाएं,
और धीरे धीरे आउंग्लियों को,
इस परमशान्ति का अनुभव करें,
अनुभव करें जो अभी हम तपोवन जाके आये है,
उससे हमें कितना जादा लाब हुआ है,
अनुभव करें हमारा शरीर कितना जादा सवस्त हुआ है,
सत्संग,
आज से एक श्रिंखला शुरू करने की एक चेष्टा है,
जिसमें मैं एक श्रिंखला के विचारों को एक आपके साझा करता हूँ,
आज के विचार हम करम बंदन के उपर करते हैं,
करम क्या होते हैं,
करम वो होते हैं जो अहंकार वासना पूर्ती के लिए या फल एच्छा के लिए किये जाते हैं,
या अहंकार के बश में आके हम वासना की पूर्ती करते हैं,
या हम किसी फल की एच्छा से करते हैं,
इनमें प्रारब्ध वाले वो करम होते हैं जो इस जनम में चल पड़े,
हमने इस जनम में उन प्रारब्ध वाले करमों को तो उनका फल भोगना ही भोगना है,
और संचित करम वो होते हैं जो जनम जनमान तर से हमारे साथ चलते आ रहे हैं,
जब उनके फलने की परिस्थिती और स्थिती अनुकूल होती है तो वो फलित हो जाते हैं,
कुछ करम इस जनम में संचित करम में फलित होते हैं,
कुछ अगले जनमों में फलित होते हैं,
सभी करमों की गती स्वर्ग तक होती है,
उससे आगे नहीं होती है,
करम बंधन तब होता है,
जब हम कोई करम फलिच्छा से करते हैं,
हमने किसी को कुछ बुरा भला कहा,
तो हम करम बंधन में बंध गए,
अब इस करम का फल तो हमको मिलेगा,
इस जनम में नहीं तो अगले जन हमने कोई बहुत अच्छा काम किया है,
तब भी हम करम बंधन में बंध गए,
क्योंकि तब हमको इस अच्छे काम की,
या तो हम इस जनम में अच्छे काम का सुख भोगेंगे,
या यहां नहीं तो हम स्वर्ग में जाके उसका सुख भोगेंगे,
जब तक हमारे अच्छे कर्मों को सत् कर्मों का पल स्वर्ग में भोगते रहेंगे,
जब तक वो सारे शांत नहीं हो जाते हम स्वर्ग में रहेंगे,
उसके बाद फिर दुबारा जीवात्मा बनके वापस आ जाएंगे,
यह जनम,
मरन,
पुनर जनम,
मरन,
पुनर जनम,
जीव और फल की इच्छा के बिना किया हुआ काम,
बस,
फल इच्छा के बिना किया हुआ काम,
जितने भी हम करम करते हैं,
जिसमें हमारे फल की कोई इच्छा नहीं होती,
हम केवल करम करते हैं,
वो करम हमारे कभी भी हमें करम बंधन में नहीं बांधते,
फल की इच्छा हमें करम बंधन में बांधती है,
और वो करम बंधन हमारे साथ चलते रहते हैं,
कुछ चलैमान इस जनम में हो जाते हैं,
नहीं तो संचित हो जाते हैं,
अगले जनम में मिलते हैं,
और हर जनम के शु प्रारब्ध पे ही आश्रित होती हैं,
जिस सांस पर हमारा अंतिम प्रारब्ध खतम हो गया,
उसके बाद सांस अंदर वापस नहीं लौटती है.
यह एक बहुत बड़ा ब्रह्म रिशियों द्वारा खोजा हुआ सिध्धान्त है,
जो हमको हमारे अध्यातम के अध्यन से आता है.
अध्यातम के अध्यन से इतना शांत,
सिरब इतना ज्ञान होता है,
लेकिन कर्मों का बंधन हमारे करने से होता है.
करम बंधन वो सिरब हमारे कर्मों का पल की इच्छा के कारण होता है.
आज के लिए इतना ही इस सुविचार को अपने मन में घर कर ले और एक बहुत ही मुदद मन से अपने जीवन ग्यापन के दिनचर्या में चले.
आज की दिनचर्या अच्छे सुविचारों से प्रारंब करें.
आपका दिन मंगल मैं हो,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है.