प्रणाम साधक,
मुदेत मन साधक,
आज अपनी इस यात्रा में हम एक और बहुत ही सूख्षन सत्ता से अपना साक्षात कार कर रहे हैं और वो सूख्षन सत्ता है आनन्द की उर्जा हमारी अंदर की आंतरिक उर्जा का एक बहुत बड़ा भाग हम राग और द्वेश में वियय कर देते हैं राग क्या है,
राग है कि हमने जैसे हम कहीं गए बहाँ पे एक पुस्तक पढ़ी हुई है हमने उसको देखा और हमारा मन कर गया कि ये पुस्तक मेरी हो जाए मैं इस पुस्तक को खरीद लूँ या इसको उठा लूँ या किसी तरह इसको लेके अपनी उस परिधी में ले आओं जहां मेरी सत्ता सरवच्चम है,
सरवच्च है,
मेरी सरवच्च सत्ता कहाँ पे है,
वो मेरे घर में है तो मैं किसी तरह इस पुस्तक को उठा के घर में ले आओं,
अगर उसके लिए मुझे कुछ धन का वे करना पड़े मैं वो भी कर लूँ,
अगर नहीं करना पड़े तो ना करूं इसको राग कहते हैं और जब मैं उस पुस्तक को लेके अपने घर में आ जाता हूं,
उसके बाद ये राग समाप्त हो जाता है,
फिर जिंग्यासा शुरू हो जाती है कि उस पुस्तक में क्या लिखा है,
लेकिन हर एक चीज को संग्रह करके अपनी उस परिधी में लेके आना जहां के मेरी सत्ता सरवुच्च है,
उसको राग कहते हैं और किसी चीज को उस परिधी से बाहर फैकने की उर्जा को हम द्वेश कहते हैं,
तो हम अगर ये राग और द्वेश की उर्जा को उनके विश्यों से अलग करके,
अंदर करके,
अंतरमकी कर लें,
तो हमारे आनन्द की उर्जा बढ़ती जाती है,
या ऐसे कह सकते हैं कि आनन्द की उर्जा अपने पूर्ण स्वरूप में आ जाती है,
जिसका कुछ,
शह है थोड़ा सा राग और द्वेश कर लेते हैं,
अगर आनन्द की उर्जा सौ है,
और राग और द्वेश,
दोनों में हम दस दस वियए करके अस्सी पे चल रहे होते हैं,
तो जब हम राग और द्वेश को खतम कर देंगे,
तो हम दुबारा से सौ के अंख पर पहुंच हैंगे,
ये एक उदारण है,
तो आईए,
आज की यात्रा शुरू करते हैं,
और इस यात्रा में हम अपने आनन्द की उर्जा से अपने पूरे मस्तिष्ख को भर लेते हैं,
और ये अपना साक्षातकार करते हैं,
कि आनन्द की उर्जा ही हमारी असली उर्जा है,
हमारी सत्ता हमारे आनन्द की उर्जा में है,
हम जो भी काम करते हैं,
वो अपने आनन्द की उर्जा से करते हैं,
आईए साधर,
अपना आज की यात्रा शुरू करते हैं,
बाया हाथ,
दाईना हाथ,
अराम दे,
पुजिशन में,
अपनी गोद में रख ले,
और अराम से बैठ जाए,
लंबा सा सास चोड़े,
लंबा सा सास ले,
चोड़े और चोड़ते हुए धीरे धीरे आखें बंद कर ले,
धीरे धीरे आखें बंद कर ले,
बंद आखों से,
धीरे धीरे श्वास को चोड़े,
कंदे की नसे धीली,
धीली,
धीली,
गर्दन की नसे धीली,
धीली,
धीली,
धीली,
धीली कनपटियों की नसे धीली,
धीली,
धीली,
मस्तक की नसे धीली,
धीली,
धीली,
पूरा मस्तक शांत,
पूरा मस्तिष्क शांत,
सिर का सारा बोजा समाद,
एक शानती का अनुभव,
दोनों बजाएं,
दोनों बजाएं,
दोनों बजाएं,
दोनों बजाएं,
दोनों बजाएं,
दो जंगाएं धीली,
धीली,
धीली,
कोहनियों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
कलाईयों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
पूरी पीट शांत,
शांत,
शांत,
दोनों कुले धीले,
धीले,
धीले,
दोनों जंगाएं धीली,
धीली,
धीली,
कुटनों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
एडियों के जोड धीले,
धीले,
धीले,
दोनों पैर धीले,
धीले,
धीले,
पूरा शरीर स्थिर,
स्थिर,
स्थिर,
पूरा शरीर स्थिर,
स्थिर,
स्थिर,
अंदर साधक सजग,
अंदर साधक उपस्तेत,
अंदर साधक सावधान,
पूरा ध्यान सब जगा से बटोर ले और उसको अपनी श्वासों पे ले आए,
श्वास बाई नासिका से अंदर होती हुई,
हमारे गले से फेप्डों को भरती हुई,
श्वास हमारी नावी को छूती हुई,
हलकी श्वास,
धीमी श्वास,
छोटी श्वास,
बिनाही किसी प्रयास के अपनी ही ले में निकलती और अंदर आती श्वास,
जब बहार निकलती श्वास,
तो नासिका से एक या दो उंगली तक ही जाती,
उसके बाद अपने आप मुढ के पूरे वातावरण में विलीन हो जाती है,
हमारा कोई भी अपनी शरीर का जोर उस पर नहीं लगता है,
बहुत धीमी श्वास,
अलकी श्वास,
प्यार भरी श्वास,
आनंदित श्वास,
श्वास जब अंदर आए,
तो उसको खीज के नीचे अपनी नाभी से चूदे,
नाभी में उसकी उर्जा चूदे ही,
पूरा शरीर पुलके,
नहमारी नाभी से पूरे शरीर में नसें फैली हुई है,
वो पूरा नसों का तंत्र में एक विद्यत्सी फैल जाती है,
पूरा शरीर पुलके,
पूरा शरीर शांत,
पूरा शरीर शांत,
पूरा शरीर शांत,
शरीर स्थेर,
श्वास नियंत्र,
थलकी श्वास,
धीमी श्वास,
सारा ध्यान सब जगा से बटोर के हमारे मन में आया,
पूरा ध्यान हमारी श्वास पे,
सारा ध्यान हमारी श्वासों पे,
हमारी श्वासों पे सारा ध्यान,
भलकी श्वास,
धीमी श्वास,
मधुर श्वास,
मीठी श्वास,
प्यारी श्वास,
अच्छी श्वास,
पूरा मस्तक शांत,
सभी विचार शांत,
सभी कल्पनाएं शांत,
कल्पनाओं में समस्या का समधान ढूंढता हुआ साधक शांत,
समस्यां अपनी,
देश की,
विदेश की,
हर तरह की,
मानव जाती की,
हर तरह की समस्या को अपने ही तरह से सुझलता हुआ साधक शांत,
समस्यां को रास्ते में ही चोड़ता हुआ साधक शांत,
सभी काल्पनिक समस्या समधान शांत,
सभी स्मृतिया शांत,
जो भी स्मृति उठ रही है,
उसको हम अपने मस्तिष्क के मध्य भाग में ले आते हैं,
वहाँ अनन्द का जर्णा भैरा है,
उस अनन्द के जर्णे में वो स्मृति,
कीमकालिक्ता,
मलिंता,
विश्च सब धुल जाती हैं,
सब धुल जाती हैं,
हमारी स्मृति केवल एक उर्जा का पुझ बन जाती है,
उसको हम कीच के अपने मस्तिष्क के पीछे के भंडार में ले जाते हैं,
वहाँ एक अपार सैयम का भंडार है,
उस भंडार में ये उर्जा मिश्रित हो जाती है,
और हमारे रक्त में घुल जाती है,
घुल जाती है,
घुल जाती है,
और ये उर्जा से पुरिपूर्ण रक्त हमारे पूरे शरीर को पोषित करता है,
पूरे शरीर को सिंचि करता है,
जो उर्जा हमारी स्मृतियों से एक बहार को प्रसारित होनी थी,
वो उर्जा हमारे ही अंतरमुखी होके,
हमारे सैयम में मिलके,
हमारे शरीर को पोषित कर रही है,
हमारी ही उर्जा अंतरमुखी होके,
उसका क्षे कुछ हंशों में कम हो रहा है,
हमारी उर्जा अंदर की बढ़ रही है,
और यही उर्जा बढ़ते बढ़ते,
हमारे जब सभी राग,
द्वेश खतम हो जाते हैं,
तो यह उर्जा अनन्द की उर्जा बन जाती है,
हमारा मस्तिश का अनन्द से भर जाता है,
इतना भर जाता है कि अनन्द बाहर चलकता है,
हमारे शरीर पे गिरता है,
यह अनन्द का ज़र्णा सिर्फ के बाहर,
ब्रवरंद्र से फूट के बाहर को निकलता है,
और सभी प्राणियों को,
सभी जीवों को,
सभी मानव को,
सभी मनुश्यों को,
सभी स्थिरियों को,
सभी को जो हमारे आसपास हैं,
उनको भिगो देता है,
हमारा अनन्द एक तरह से प्रसारत हो रहा है हमारे ब्रवरंद्र से,
और ये प्रसारत इतना प्रसारन,
इतना प्रगाड हो जाता है,
कि पूरी मानव जाती को छू देता है,
प्रतेक प्राणी को हमारा आनन्द छू देता है,
और उनका आनन्द मुझको छूता है,
तो जितना आनन्द मैं बाहर को फैक रहा हूं,
उतना ही आनन्द मेरे अंदर भ बढ़ता जा रहा है,
इस बढ़ती हुई आनन्द की स्थिती और मन स्थिती को द्रिण भूमी करने के लिए,
आईये इस पे ओम का उचारन का को अरूड कर लेते हैं,
अपने मन को एकदम आनन्द में इस्थिती में रखें,
और ओम का उचारन शुरू करें,
ओम के उचारन में एक मेरी आवाज होगी,
एक आपकी धनी होगी,
हम दोनों की धनीयों के बीच में एक आनन्द का प्रसारण होगा,
ये हम उस आनन्द की सूक्ष्ण सत्ता से अपने को अनिभिग करते हैं,
उस आनन्द की सूक्ष्ण सत्ता से उसका अवलोकन करते हैं,
उससे एक साक्षातकार करते हैं,
उससे हाथ मिलाते हैं,
वो आनन्द ही हम हैं,
हम ही वो आनन्द हैं,
और वो ही उस आनन्द की उर्जा है,
आईये ओम का उचारन चुरू करते हैं। ओम आनन्द ही आनन्द ओम साधक परमशान्ति का अनुभव करें और आनन्द का अनुभव करें,
जब हम अपने आनन्द को अनुभव करते हैं,
तो आनन्द के पीछे एक उपरूत पूर उर्जा हमारे अंदर सिंचित हो जाती है,
वो अपने असली प्रारूप में हो जाती है,
और एक आनन्द मयी मनस्थिती से जब हम कोई भी कारे करते हैं,
तो हमारी अबूत पूर उर्जा उस कारे में लग जाती है,
हम अपनी सुद्धुत खो देते हैं। सादक अनुभव करें कि हमारा पूरा मस्तिश्क आनन्द से भरा हुआ है,
आनन्द ही उर्जा है,
आनन्द ही अनन्त है,
आनन्द ही शिव है,
आनन्द ही शक्ती है,
हमारी उर्जा ही आनन्द है,
और आनन्द ही उर्जा है। मस्तिश्क के कोने कोने पे एक कलपना करें कि मस्तिश्क के अंदर ब्रह्मरंद्र से,
ब्रह्मरिश्यों के तेज से ओतप्रोत एक जोती पुञ्ज हमारे मस्तिश्क में अंदर जल गया है,
मस्तिश्क के मद्ध में एक दिये की लोग की तरह टिम्टिमाता हुआ जोती पुञ्ज जल गया है,
और इसके टिम्टिमाने की शक्ती बढ़ती जा रही है,
बढ़ती जा रही है,
बढ़ती जा रही है,
यह आकार में भी बढ़ता जा रहा है,
बढ़ता जा रहा है,
बढ़त हमारी आग के आगे,
कानों के आगे,
नाग के आगे,
मुख के आगे,
सिर के पीछे आगे,
बालों से परे,
वहां तक यह जलती हुई आग जो है,
उसको महसूस करें,
उस जलती हुई आग की उश्मा,
अपने चेहरे पे बाहर से महसूस करें,
इतनी अनर्जी,
इतनी आर,
इतना उर्जा पुझ,
इतनी शक्ती से भर गया है हमारा मस्तिश्क,
कि अब कोई भी विकार नहीं आ सकता,
अगर हम इसी कल्पना को और प्रगाड करते हैं,
तो यह जो आग जल रही है,
जो हमारे पूरे मुख को से,
गर्दन से उपर के पूरे सिर को जला रही है,
गर्दन से उपर प्रगाड कर लें,
कि जो जोती है,
वो पहले पीले रंकी थी,
वो अब जल जल के एकडम और इंटेंस होके सफेद रंकी हो गयी है,
एक सफेद रंकी उर्जा हमारे पूरे मस्तिश को गर्दन से उपर भरे हुए है,
एक सूर्य है यहाँ पे,
हमारा मुख नहीं है,
एक सूर्य है,
हमारा पूरा धड नहीं है,
हमारी,
हमारा शरीर नहीं है,
केवल एक उर्जा का पुझ है और यह उर्जा का पुझ प्रकाशेत इतने संख करोडो सूर्यों के भाती चमक रहा है,
बहुत ही,
बहुत ही तेज और � केवल चमक है इसकी,
उतनी ही उश्मा है,
उतनी ही उर्जा है,
इस,
इस मनस्तित,
उस्तिती से,
जब हम कोई भी कारे करने जाएंगे,
तो हमारे मन में ना तो कोई विकार आएगा,
ना हमारी इंद्रियां दाएं,
बाएं भागेंगी,
ना हमें कोई विशे अपनी तरफ आसक् हम एक मत से,
एक single pointed mind से हम एक अपने कारे को पकड़ लेंगे,
हम बहुत ही,
अपनी सारी उर्जा जो है,
उस काम में लगा लेंगे,
हमारी गुणवक्ता बढ़ जाएगी,
हमारी उप्योगिता बढ़ जाएगी,
हम बड़े-बड़े काम करने में सक्षम है,
जो काम हमारी कल्पना में होते हैं,
उन काम को हम बिल्कुल दृड़ भूमी करके,
अपने समक्ष होते हुए देख सकते हैं,
और उसकी सारी उर्जा जो है,
हमारे मस्तिश्क में ही बनती है,
हर काम की उर्जा हमारे मस्तिश्क में ही बनती है,
और उर्जा की जो भूमी है,
वो आनन्द में होती है,
आनन्द ही उर्जा है,
उर्जा ही आनन्द है,
आनन्द का ख्षे,
उर्जा का ख्षे है,
राग द्वेश का श्वेख्षे,
आनन्द की उत्पत्ती है,
राग द्वेश का ख्षे,
आनन्द की उत्पत्ती है,
हमारा आनन्द असीम है,
अनन्त है,
बहुत,
बहुत बड़ी मात्रा में है,
इसका कोई भी एंश कालिका से नहीं लगा हुआ,
असीम,
असीम आनन्द और एक उर्जा का पुझ हमारे पूरी गर्दन से उपर के मुख को जला रहा है,
और उस जलती हुई आग में सब कुछ जो नकाराक्तमक्ता थी,
सब जल गई है हम एकड़म अनर्जी और उर्जा से भर गए हैं,
आनन्द की उर्जा,
उर्जा का आनन्द,
आनन्द की उर्जा,
उर्जा का आनन्द,
आनन्द की उर्जा,
उर्जा का आनन्द साधक,
हमारे मन में अब क्या उर्जा है और कितना आनन्द है,
इसमें कोई भी हम भेद नहीं कर सकते हम उर्जा से परिपूर्ण हैं,
हम आनन्द से परिपूर्ण हैं साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और � दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
स विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ भूमे कर ले,
साधक इस विचार को और दृड़ � उठो पार्थ,
गाडी संभालो,
वीर भोग्यो वसंद्रा,
आनन्द ही ऊर्जा है,
ऊर्जा ही आनन्द ही आनन्द ही ऊर्जा है,
ऊर्जा ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द ही ऊर्जा है,
ऊर्जा ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द ही आनन्द