प्रणाम साधक मदद मन साधक हम अपनी इस यात्रा में आखरी पढ़ाव पे पहुँच गए हैं कल हमारा इस यात्रा का अधन्तिन सेशन होगा आज के सेशन में हम जो हमने कल एक प्रयास किया था के आपको सेल्फ सफिशन्ट बना दिया जाए आप खुद इस पढ़ती को अपने आप अपने अंदर ढाले आज उस प्रयास के अन्तिम चरण जो ध्यान का पार्थ है उसके उपर थोड़ा हम मैं अपने विचार आपके साथ साज़ा करूगा आज भी हम कल वाली पढ़ती को फिर द्रिध भूमी करने का प्रयास करेंगे और मैं guided meditation की तरह इसको नहीं करूगा मैं बहुत थोड़ा थोड़ा बीच में guidance दूँगा आप अपने आप अपने मन में इसको करने का प्रयास करें जिससे ये पढ़ती आपके द्रिध भूमी हो जाए और उसके बाद फिर अनन्त गहराईयों में आप पहुंच के अपनी साधना को और भी ज़्यादा प्रगाण कर सके ये मेरी शुब एच्छा है तो आईए शुरू करते हैं बाया हाथ,
दाईना हाथ,
उंगुटे और इसको अराम दे पुजिशन में मिठा ले सबसे पहले तीन लंबे लंबे सांस ले आँखे धीरे धीरे बंद कर ले और अपने शरीर को स्थिर करने के प्रथम चरण का शुब आरंब करे अपना शरीर स्थिर कर ले शरीर स्थिर करने के लिए कंधों से शुरू करे पूरा शरीर स्थिर अंदर साथक सजग अंदर साथक सावधान अंदर साथक उपस्थिर पूरा शरीर स्थिर अब दूसरा चरण करें जिसमें हमने श्वासों को नियंत्रन में लेके आना है खलकी श्वास,
धीमी श्वास,
छोटी श्वास पूरा ध्यान नाभी पे,
नाभी को हलका सा अंदर करना है तो श्वास बाहर निकल जाएगी और इसको छोड़ देना है तो श्वास चितनी मातरा में चाहिए सहजता से उतनी मातरा में अंदर आ जाएगी खलकी श्वास,
धीमी श्वास,
नासिका से केवल दो उंगली दूर तक जाती श्वास बाहर नासिका से अंदर आती श्वास,
बहुत धीमी और नियंत्रित श्वास,
शरीर स्थिर श्वास नियंत्रित अब तीसरा चरण सभी विचार शान,
शान,
शान,
शानती ही,
शानती ही,
शानती ही सभी कल्पनाएं शान,
सभी स्मृतियां शान,
स्मृतियों का विष्ण धो लें,
ओम का उचारण शुरू करेंगे,
ओम के उचारण में केवल दो धोनियां होगी,
मेरी धोनी नहीं होगी,
आपकी अपनी धोनी और उस धोनी के अंदर अनहद नाद,
आप अपने आप उस अनहद नाद को खोजने की कोशिश करें,
ओम का उचारण शुरू करेंगे,
पहली बार मैं आपके साथ होंगा,
उसके बाद फिर मैं चुप हो जाओंगा,
आप अपने ओम का उचारण continue करते रहें,
साधक परम शान्ती का अनुभव करें,
शान्ती और आनंद का अनुभव करें,
और अब हम अपने पांच्वे चरण में आते हैं,
जिसमें ध्यान लगाना है,
और ध्यान लगाने में ध्यान किसी वस्तु या किसी विचार पे लगाया जाता है,
हमने पिछले दो महीने से जादा के अपने प्रियास में अनेकों विचारों को द्रिणभूमी किया है,
हम शुरू से पूरी शरंखला को शुरू कर सकते हैं,
या बीच में से किसी भी वीडियो को उठाके उससे ध्यान,
उसका जो मर्म है,
उसको अपना ध्यान में ला सकते हैं,
नहीं तो आज मैं आपके साथ एक और अन्य ध्यान को साज़ा कर रहा हूं,
सादक ध्यान दें,
ये सबसे आसान है और इसी से बाकी सारी ध्यान जो हैं,
सारे विचार जो हैं वो उत्पन होते हैं,
तो सादक आँखे बंद करके,
बेलकुल दृड़ भूमी होके,
पूरी श्रद्धा और तपस्या से मेरे आगे के बचन हैं उनको आप सुनें,
बहुत श्रद्धा से सभी विचारों को,
सभी संचेओं को,
सभी शक्कों,
सभी कुतर्कों को आप थोड़ी दिर के लिए अपने दिमाग से निकाल ले.
सादक सबसे पहले विचार करे,
मैं कौन हूँ?
मैं कौन हूँ?
मैं कौन हूँ?
इस पे बार बार विचार करे,
मैं कौन हूँ?
मैं पैर हूँ?
नहीं,
पैर मेरे हैं.
मैं लाते हूँ?
नहीं,
लाते मेरी हैं.
मैं हात हूँ?
नहीं,
हात मेरे हैं.
मैं भुजाए हूँ?
नहीं,
भुजाए मेरी हैं.
मैं पेट हूँ?
नहीं,
पेट मेरा है.
मैं गर्दन हूँ?
नहीं,
गर्दन मेरी है.
मैं आँखे हूँ?
नहीं,
आँखें भी मेरी हैं.
मैं कान हूँ?
नहीं,
ये कान भी मेरे हैं.
मैं नासिका हूँ?
नहीं,
नासिका मेरी है.
मैं मुख हूँ?
मैं जिहवा हूँ?
नहीं,
मुख और जिहवा मेरी है.
मैं कान हूँ?
मैं मन हूँ?
नहीं,
मन नहीं हूँ.
मन मेरा है,
मेरा मन है.
मैं बुद्धी हूँ?
नहीं,
बुद्धी मेरी है.
मैं मन हूँ?
नहीं,
मैं बुद्धी हूँ?
नहीं,
मैं विवेक हूँ?
नहीं,
विवेक भी मेरा ही है.
ये सब जो मेरे है,
ये मैं कान हूँ?
साधक इस विचार को और भी दृड़भुमी करें,
और भी सगंता से सोचने की कोशिश करें.
मैं कान हूँ?
मैं कान हूँ?
मैं कान हूँ?
मैं ओम हूँ,
प्रणव हूँ,
नवनूतन से पहले हूँ,
हर खण नया बनता हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ.
इस विचार को अपने मन में दृड़भुमी कर लें,
जब मैं अपने आप को ओम बोलता हूँ,
तो सभी कुछ मेरा,
मेरे से अलग हो जाता है.
इस शरीर में बैठा हुआ मैं ओम का उच्छारन हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं आत्मा हूँ,
मैं आत्मा हूँ,
सभी कुछ अनात्मा हो जाता है,
जो आत्मा नहीं है,
वो अनात्मा हो जाता है,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ.
इस विचार को और भी दृड़गूमी करें,
इस विचार को जितने भी तर्क कु तर्क देने हैं,
अपने मस्तिश्क में वो तर्क कु तर्क देखके,
इस विचार पे क्या आगहात होता है,
उसको अपनी संग्यानता में लेके आए,
क्या मैं पहर हूँ,
नहीं,
मैं तो ओम हूँ,
क्या मैं मस्तिश्क हूँ,
नहीं,
मैं तो ओम हूँ,
क्या मैं बुद्धी हूँ,
नहीं,
मैं तो ओम हूँ,
क्या मैं मन हूँ,
नहीं,
मैं तो ओम हूँ,
मैं ओम हूँ.
मेरा ओम है,
ऐसा विचार कभी नहीं आता,
बाकि सब के लिए ये विचार आ जाता है,
मेरी बुद्धी है,
मेरा विवहेक है,
मेरा मन है,
मेरा अंतकरण है,
मेरी आत्मा है,
लेकिन मेरा ओम है,
ये विचार कभी नहीं आता,
ये तरक संगत ही नहीं लगता,
मेरा ओम है,
ये तर तरक में लगता है,
ये एक अजीव सा भाव उठता है,
जब मैं बोलता हूँ,
मेरा ओम है,
नहीं,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ साधक,
इस दृड़ विचार को बार बार अपने मन में और दृड़ भूमी करें,
और अनात्मा को नेती नेती करके अटाते रहें,
हमारी साधना और सगन हो जाएगी,
हमारी साधना और सगन हो जाएगी,
मैं ओम हूँ,
लेकिन वहां तक पहुँचने के लिए,
मैं क्या नहीं हूँ,
उसको आप काटते रहें,
काटते रहें,
काटते रहें,
जिस पे मैं पैर हूँ,
मैं हाथ हूँ,
इस तरह का भाव तरक संगत नहीं लगे,
उसको काट दें,
क्यूंकि मेरे पैर हैं,
मेरा हाथ है,
जहां मेरा के आगे जिस वस्तु का लगना एक तरक संगत लगता है,
वो मैं नहीं हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ,
मैं ओम हूँ.
सादक अपने शरीर बोध प्राप्त करें,
पैरों की उंग्लियां हिलाएं,
हाथों की उंग्लियां हिलाएं और आँखें दीरे दीरे खोलें.
सादक सबसे पहले शरीर को स्थिर करना है,
फिर अपनी श्वासों को नियंत्रदन में करना है,
फिर अपने विचारों को शांत करना है,
फिर ओम का उचारण करना है और उसके बाद ध्यान करना है.
ध्यान में सभी चीज़ों को नेटी,
नेटी,
नेटी करके नहीं,
This is not,
This is not,
I am not my feet because my feet are mine,
So I am not,
I am not my feet.
ना,
ना,
ना,
ना करके अंत में एक बहुत ही प्रगाड़ विचार बैठ जाएगा,
मैं उम उम.
और इसमें जितनी देर तक आप विचार करते रहें,
बाकि जितने भी हमने पिछले दो महिने में विचार करें हैं,
वो सब इस विचार के उपर आरोपित होते जाएगा.
और उन सब विचारों में एक अलग तरह की तरंग आजाएगी,
एक बहुत ही अच्छी मीठा सा अनु अंतिम सेशन है,
उसमें और जितना भी मेरे से बन पड़ा,
जो कुछ भी मैंने सीखा हुआ है,
मैं आपके साथ सब साजा करते हूँ.
कल के अंतिम सेशन में,
कल सुबह साथ बजे फिर मिलते हैं.
और तब तक के लिए ओम ही सत्य है,
ओम ही सत्य है,
केवल ओम ही सत्य है.
कल सुबह मिलते हैं.