प्रणाम साधक मुदद मन अमारी इस लंभी यात्रा में हमने ओम के उच्छारण को बहुत महत्तु दिया है आज हम इस ओम से जुड़ी हुई कुछ और बातों को मैं आपके साथ शेर करता हूँ ओम को प्रणव भी कहा गया है प्रणव प्र नव कुछ भी नवीन और नूतन होने से पहले जिस चीज का उच्छारण होता है उसे प्रणव कहते है हम कोई भी मंत्र बोलते हैं ओम नमों भगवते वासुदेवाय नमा हम कोई भी मंत्र बोलते हैं उस मंत्र को बोलने से पहले ओम का उच्छारण अवश्य करते हैं इसका कारण है कि ओम के उच्छारण से हमारे मंत्र के बोलने में जो भी तुरुटी आये जो भी दोश आये वो इस ओम के उच्छारण से साफ हो जाये वो तुरुटी दूर हो जाये वो दोश का निवारण हो जाये तो हमकों कैसे पता चलता है कि हमारे मंत्र में दोश आएंगे इसके लिए हम एक और एक और कंसप्ट को ध्यान में लाते हैं कि हम जो भी बोलते हैं उसके बोलने से पहले उसकी तीन स्थितियां और होती हैं परा पश्यन्ती मध्यमा वैकरी परा वो शक्ती है जो बोलने की शक्ती के अंदर आती है परा पश्यन्ती जब हम कुछ बोलना चाहते हैं हमारी इच्छा होती है बोलने की तो उसकी एक एक चवीस ही हमारे मन में बन जाती है वो पश्यन्ती होती है फिर वो पश्यन्ती अ� कुछ चाया होती है कुछ शब्द बन जाते हैं हमारे मन में वो होती है मध्यमा और फिर हमारे कंठ से जो निकलती है वो होती है वैकरी तो वैकरी तक पहुँचने के बाद हमें उससे पहले तीन पढ़ाव में पता चल जाता है हम क्या बोलने वाले हैं इसलिए मंतर के बोल से पहले हमको पता चल जाता है हम क्या बोलने वाले है और उस मंतर में जो तुर्टिया आ गई है उसको उसका निवारन करने के लिए हम ओम का उचारने के लिए ओम को प्रणव इसलिए कहा गया है ओम ओम हर मंतर के उचारन से पहले इसलिए बोला जाता है योगधर्शन में ओम को ये भी बोला गया है तस्से वाचक प्रणव आपको बोलने का तरीका प्रणव है और ये आप कौन है तस्से कौन है ये परब्रमपर शक्ती है परब्रम शक्ती है आदी शक्ती है जो भगवान की शक्ती है उस शक्ती का अगर हमको मौखिक वैक्खरी में बोलना है त व्यक्त में आने के लिए जिस चीज की जिस अनहद नाद का प्रारंब हुआ था उसे प्रणव कहते हैं अव्यक्त से व्यक्त ये पूरा ब्रह्मान जो है हमारा ये पूरा ब्रह्मान एक बिग बैंक से शुरू नहीं हुआ या एक बिग बैंक से शुरू हुआ तो कुछ अंश में एक जगा पे शुरू हुआ आप ऐसे कलपना कर लीजिए ये एक सीमा है हमारे ब्रह्मान की वैसे तो सीमा कोई नहीं है लेकिन कलपना कर ले कि ये एक ब्रह्मान की सीमा है इसलिए पूरा ब्रह्मान जो है वो अव्यक्त स्टेट में है ये पूरा ब्रह्मान जो है वो अव्यक्त स्टेट में है ये पूरा ब्रह्मान जो है वो अव्यक्त स्टेट में है ये पूरा ब ओम का अनहतनाद हुआ इस पूरे ब्रह्मान में यहाँ पे एक चोटा सा अनहतनाद हुआ उस ओम के उचारण के स्पंधन से अव्यक्त में उर्जा आई और वो उर्जा जो है वो व्यक्त होती होती एक ब्रह्मान में बन गई एक ब्रह्मान जब यहां बन रहा है तो यहां पे एक ब्रह्मान लुप्थ हो रहा है यहां पे एक ब्रह्मान विक्सित हो रहा है अनन्त ब्रह्मान अनन्त अनन्त जगा पे पूरे ब्रह्मान में जो है अनन्त फैले हुए है और कहीं पे कोई ब्रह्मान उत्पती हो रही है कहीं पे उसकी लुप्थ हो रहा है ब्रह्मान उत्पन हो रहा है लुप्थ हो रहा है अलग अलग जगा पे अलग अलग हो रहा है जैसे एक बीज में पूरा का पूरा पेड़ अव्यक्त अवस्था में होता है और जब उसकी काल समय की स्थितिया अनुकूल हो जाती है तो वो सोटेथ होकर एक पेड़ बन जाता है उसी तरह ब्रह्मान्ड में भी जब काल और समय की स्थितिया अनुकूल होती है और ओम का अनहदनाद होता है तो वहाँ पे एक ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति हो जाती है जब वो उत्पत्ति हो जाती है तो उसमें उर्जा आती है उर्जा आकर उसमें और सुरिश्टी और सुरिजन हो जाता है उसकी लय बन जाती है और वो लय धीरे धीरे धीरे करके वो लय उसके लुप्त करने की तरह प्रलय में चली जाती है इसलिए प्रलय कहते है कि लय के � वो प्रलय में चली जाती है और प्रलय हो जाता है और वो पूरा ब्रह्मान्द फिर से अव्यक्त अवस्था में आ जाता है व्यक्त से अव्यक्त,
व्यक्त से अव्यक्त,
कहीं पे व्यक्त हो रहे,
कहीं पे अव्यक्त हो रहे,
कहीं व्यक्त,
कहीं अव्यक्त,
ऐसे करके पूरे ब्रह्मान्द में ओम का उचारन जो है यही हर नवीनता का उद्गोशक है,
प्रणव का उद्गोशक है,
प्रणव ही न� इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि ओम के तीन मुख्य आकार है,
आ,
उ,
और म,
आ को हम कहते हैं अपनी नवी पे रखें,
उ को हम कहते हैं अपने हिदे पे रखें,
और म को हम कहते हैं अपने अग्याचक्र पे रखें.
तो यहां पे जब हम अवेरनस ले के आते हैं और उसके साथ ओम का उचारन करते हैं,
तो अंदर से हमारी जितनी भी सूक्षन सत्ताएं हैं वो एक दूसरे के साथ लैबध हो जाती हैं और ये लैबधता ब्रह्मान्ड की सूक्षन सत्ताओं के साथ मिल जाती हैं और हमारे अ एक प्रैक्टिकल तरीके से साइंटिफिक तरीके से समझाया है उन्होंने कहा है पांडु की उपनिशद में रिशी उन्हें को बोला है के हमारे जीवन की चार स्थितियां होती हैं पहली जागरित जो हम ये जागे होईं दूसरी सुप्त जिसमें हम सोहे होते हैं तीसरी स� सुप्त में होती है उसमें हमको सोपन आते हैं we dream in that state and then there is a state which is dreamless state और एक ऐसी स्थिति आती है हमारी नीन में जिसकों को हम बिल्कुल सोपन रहत होती है सुषुपती उसका नाम उन्होंने सुषुपती दिया और ये जो dreamless state है इसको अगर हम साइंटिफिक चीज में देखें तो हमारे अगर हम heart beat को देखें और eye movement को देखें तो r.
E.
M करके एक concept है साइंटिफिक world का वो बोलते हैं कि जब r.
E.
M शुरू हो जाती है तो हमारा mind बहुत ही शांत हो जाता है और एक अलग तरह की अलफा,
ब्राव,
चार्ली,
डेल्टा करके डेल्टा वेव्ज निकलनी शुरू हो जाती है ठीक है तो ये जो ये जो चार स्थितियां है जागरित,
स्वपन,
सुशुपति इसमें जागरित को कहा गया है ये अ,
स्वपन को कहा गया है ये ओ है और सुशुपति को कहा गया है ये म,
जागरित,
स्वपन,
सुशुपति कहा में हम इन तीनो स्थितियों को पकड़ लेते हैं ये तीनो स्थितियां हमारे अंदर घटित हो जाती है जब हम ओम का उच्छारन करते हैं आ बोलते हैं तो हमारी जागरित अवस्था बिल्कुल एकडम सजग हो जाती है उ बोलते हैं तो स्वपन की एक चोटी सी चोटा सा आ के उप्रिशद में एक चोथी स्थिति का वरनन है जिसको कहते हैं तुर्या समाधी जिसको कहते हैं तुर्या ये आ उ और म में तुर्या गहां पे आती है तुर्या इन सब के नीचे बेज पे है अगर तुर्या की स्थिति नहीं है तो इन सब का हम वर्गी करन नहीं कर सकते और दो ओम के उच्छारण के बीच की जो स्थिति है जहां पे कोई भी विचार नहीं निकलता और हमारा मन अपने वैकरी और अपने हमारा मन अपने परापशंती मध्मा से दुबारा ओम को निकालने की कोशिश करता है वो जो ओम यह जो बीच का है अंतराल यहां तुर्या की स्थिति जागरत हो जाते हैं बहुत छोटे अंशों में नेनो सेकेंड्स में बहुत ही चोटे चोटे उसमें इसलिए ओम के उचारन से अभी तक हमने जितनी भी अपनी यात्रा करी उससे शुरु में मैंने ये बात आपसे इसलिए सांजा नहीं करी के पहले हम अनुभव करके देखें के अलग अलग विचार हमारी शरीर में उपर नीचे जाके हम कैसे अलग अलग विचारों को अपनी पूरी ओम के विचारन के साथ समरिशित करते हैं और हम कैसे देख पाते हैं हम खुद अनुभव करते हैं कि ये चीज़े हो रही हैं उर्जा आ रही हैं और अब जब उर्जा आ रही हैं तो अब हम इसका इस जो हमने अभी तक उबसर्वेशन्स करी हैं उसकी एक थियोरी बनाते हैं उब जब हम उम का उचारण करते हैं तो ये चारों स्थितियां हमारे अंदर बहुत चोटे अंशों में घटित होती हैं और जब ये घटित होती हैं तो हमारे अंशों में खुद अनुभव करते हैं तो ये चीज़े हो रही है और अब जब उर्जा आ रही हैं तो ये चीज़े ह अंदर की जो सुप्त ख्यम्ताएं हैं वो जागरत होती हैं हमको वो वो सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं जिसका हमको कोई भी ज्यान नहीं होता है और वो सिद्धियां हमारे अंदर होती हैं और इस चीज़ का अनुभव हम अपनी जीवन में करना शुरू कर देते हैं तो आज फिर शदा पूर्वक एक बार ओम का उचारण करते हैं अपने शरीर को बिलकोल स्थिर करके श्वासों को नियंतरित करके और ओम के उचारण पे चलते हैं आखें धीरे धीरे बंद करें आखें धीरे धीरे बंद करें दोनों कुहले धीले धीले जंगाएं धीली धीली गुटनों के जोड धीले धीले इडियों के जोड धीले धीले दोनों पैरों के सभी जोड धीले धीले पूरा शरीर शांत पूरा शरीर स्थेव स्थेव स्थेव अंदर साधक सजग अंदर साधक उपस्थेत अंदर साधक साधाय सारा ध्यान बटोर ले और अपने श्वासों पे ले आए श्वास बहुत धीमा बाई नासिका से अंदर जाता श्वास मुडता हुआ श्वास गले में पहुँचता श्वास दोनों फेफ़डों को भरता श्वास और नीचे हमारी नाभी को उसका उर्जा पूंच चूता ह अलका श्वास पूरा ध्यान अपनी नाभी पे केंद्रित कर ले और केवल नाभी के अंदर आने से श्वास को बाहर जाने की उर्जा प्रदान करें नाभी को अंदर को खीचें ताकि वो रीड की हड़ी को चूने का प्रयास करें बहुत हलका सा खीचें और छोड़ दें जब हम नाभी को छोड़ेंगे श्वास अपने आप अंदर आ जाएगा हलका सा श्वास जब हम नाभी को थोड़ा सा अंदर को करेंगे तो श्वास थोड़ा सा बाहर जाएगा इतना कि हमारी नासिका से एक या दो उंगली तक ही उसका वेग रहे और उसके बाद वो मुड़के पूरे वातावरण में विलीन हो जाये अलका श्वास धीमा श्वास नाभी को धीरे से अंदर को खीचते हुए श्वास को बाहर निकाले और नाभी को छोड़ दे जैसे नाभी को छोड़ेंगे श्वास अपने आप हमा जितनी मात्रा में चाहिए हमारे फेफ़डों में आ जाएगा धीमा श्वास धीमा श्वास सभी विचार शान्त शान्त शान्त सभी कल्पनाएं शान्त शान्त शान्त सभी स्मृतियां शान्त शान्त शान्त अब कोई भी स्मृति ऐसी नहीं बची जिसमें कालिक लगी हो हमारी सभी स्मृतियां धुल के साप हो गई हैं पवित्र हो गई हैं हमारी कोई भी स्मृति ऐसी नहीं है जो हमको विचलित कर सकती है सभी स्मृतियां शान्त सभी स्मृतियां शान्त सभी विचार शान्त आईये ओम का उचारण शुरू करते हैं आँ सादक धीरे धीरे शरीर बोध प्राप्त करें पेरों की उंग्लियां हिलाएं आतों की उंग्लियां हिलाएं और आँखे को सादक हमारे तीन और सत्र बचे हैं और इन में हम जो हमारी पदती इस पूरे सुत्र दिन के प्रवास में विक्सित हुई है उसकी हम थोड़ी सी कल मैं चुप रहूंगा और मैं आपको थोड़ी थोड़ी गाइडन्स करूँगा बहुत थोड़ा थोड़ा साइता करूँगा और कल हम आप अपने आप शुरू करें ताकि इस पदती को आप आगे भी लेके जाएं जब आपकी इच्छा हो तो आप दुबारा इस तरह ध्यान लगा सकें कल का सत्र हमारा एक अभ्यास का सत्र है जिसमें मैं बाग डोर आपके हाथ में पकड़ा हूँगा और अपने अपनी गाइडिड मेडिटेशन में अपने को थोड़ा पीछे खीच रूँगा ताकि तीन दिन के बाद आप इसको और आगे भी कंटिन्यू कर सकें सादक बहुत धन्यवाद कल सुबह फिर मिलते हैं साथ तब तक के लिए ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है ओम ही सत्य है धन्यवाद साथ