ओम शान्ति अपने चारू ओर दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है,
जिने हम इन आखों से देख रहे हैं,
इन कानों से सुन रहे हैं,
उसे देखते हुए,
सुनते हुए,
थोड़े समय के लिए अपने आपको इस शरीर से अलग,
शरीर का मालिक,
मन,
बुद्धी,
आखों का,
कानों का मालिक,
एक चैतन ने चमक्ता हुआ सितारा,
आत्मा मैसूस करें,
जो सदा थी और सदा रहेगी,
मुझ आत्मा की यात्र अनाधी है,
अनंत है,
और अपनी इस लंभी यात्रा में,
बहुत सारे जनम,
बहुत सारे शरीर,
बहुत सारे संवंद,
अनेक उतार चरहाब,
मुझ आत्मा ने अनुभव किये है,
कहीं सुख आया,
उसे भी इंजोय किया,
कहीं शिक्षा मिली,
उसे भी धारन किया,
तो कहीं कहीं,
कुछ गल्तियों के कारण,
अन्चाहा दुख भी आया,
लेकिन उसने भी मुझे मस्बूत बनाया,
आत्मा निरिख्षन का मौका दिया,
पर्मात्मा की मदद का अनुभव कराया,
सच्चे रिष्टों की पहचान कराई,
सत्यता और मियाय पर मेरा निश्चे मस्बूत हुआ,
इतने सारे इस बेहत के ड्रामा के सीन मैंने देखे,
और आज उन सभी उतार चराफ के कारण से मैं ऐसा हूँ या ऐसी हूँ,
मिरे जीवन का कोई भी पल वेस्ट नहीं था,
चाहे अच्छा था चाहे पुरा,
लेकिन मीनिंगफुल था,
ऐसे ही आज इन आखों द्वारा,
इन कानों द्वारा,
मैं संसार में दूसरी आत्माओं के जीवन में चल रहे सीन भी देख रही हूँ,
हरेत के जीवन का ढ्रामा अपना अपना है,
कहीं किसी के जीवन में सुख का सीन चल रहा है,
उसे भी मैं शानते से देख रही हूँ,
कहीं किसी के जीवन में परिक्षा का शिक्षा का सीन चल रहा है,
उसे भी मैं धीरत से देख रही हूँ,
मैंने भी ऐसे बहुत सारे पल जीए हैं,
कुछ शायब मुझे याद है,
और कुछ पूर्व चन्मों के याद भी नहीं,
जैसे मेरा वो वक्त बीट गया,
ऐसे ही इनका भी बीटेगा,
मैं जहां भी हूँ उन आत्माओं को शक्ति दे रही हूँ,
शुब भावना दे रही हूँ,
ताकि वो भी धीरत से अपने ड्रामा की उस सीन से शिक्षा लेते हुए आगे बढ़ते रहें,
ये आखें और ये कान भले ही वो सुख और दुख के सीन देख रही है,
लेकिन मन की आख उस आत्मा की बेहद की यात्रा देख रही है,
जिसमें एक कार्मिक अकाउंट सेटल हो रहा है,
और उसके आगे शांती और सुख आने वाला है,
मैं इश्वर की वो आवाज सुन पा रही हूं,
कि कर्म के अनुसार सुख और दुख जेवन में आता है और जाता है,
इन दुख के पलों में उदासी नहीं,
प्रश्ण नहीं,
कम्प्लेंज नहीं,
परमातम शक्तियों की जरूरत है,
मुझे भी और उन्हें भी अनुभव करें,
कि निराकार परमातमा,
जो लाइट स्वरूप है,
उनकी प्रकाश की तिर्ने सारे संसार पर पढ़ रही है,
जो अच्छे है,
लेकिन फिर भी उनके जीवन में परिक्षा चल रही है,
परमातमा उनकी अच्छायियों को और भी निकार रहा है,
सोने को ही तपना होता है सच्छा बनने के लिए,
जिससे उसकी डाल्यू बढ़ती है,
ऐसे ही इस संसार में अच्छाई भी,
सोने की तरह तप तप कर निकर रही है,
सच्छाई के साथ परमातमा है,
एक दिन वो सच्छाई चमकेगी,
मैं भी अपने जीवन में अपने अंदर की सच्छाई और परमातमा को साथ रखूं,
तो मेरे जीवन में भी परिक्षा के पल जल्दी बीटेंगे,
और परिक्षा में पास होकर,
मैं आगे बढ़ भी रहूंगे,
ओम शंति