नमः पंक जनाभाय नमस्ते जलशाईने नमस्ते केशवानन्त वासुदेव नमोस्तते वासनात्वासुदेवर्ज्यवातितं भूनक्रहं सर्वभूत निवार्थो सिवार्थो देवनमोस्तुते मूकं करो तिवाचालं पंगं लंगयते किरिम्ण यत्रुपातमहं बन्दे परमानन्दमाजवा विद्वागवर एकादश सकंद विपियर द्याई पंद्रवाशलोग जव दावाण शलू अत्राद्विदाहरंतेमं इतिहासं पुरातनं आर्शपाणां चसौदं विदेहस्यमहात्मनः अत्रा इस विशे में विदेह राजा महात्मा राजा विदेह और रुशबु पुत्रो आर्शबानाम। आर्शबाना मतलब रुष्य पुत्र के समवाद में जौ उपदेश दिया गया ओज़ो सवार्थे राजा विदेह को नोवयों केश्वर ने जो पुतेश दिया था उसका तो संवाध था दोनों के बीच में नारात मुणी कह रहे हैं उदाहरंते इवं इत्यासं। क्रंत में कहा गया उदाहरंते इमं इतिहासं तो इतिहास का उदाहरण देते हैं। इस विशे में महात्मा राजा,
विदेव और रिशुपत्रों के समवाद रूप इस प्राचिन इतियास का उदारन देते हैं। नाराद मुनिको भागवत धर्मों के वारे में प्रश्न पुचा पुरा इत्यास में पुरातन इत्यास में जो एक गटना परीत एक प्रसंग हुआ था। लोगी राजा विदेः और नौ रुष्यबदेव के बीच के बीच मेझे सो वाक्ते वो उदर इसका उदाहरन देते हैं। उसके माध्यम से हमें वो पदिश दिया जा रहा है। प्रियव्रतो नामसूतः मनोस्वामभूअम्भूअस्ययः सस्यागनी प्रस्ततो नाविर्ण रुषबस्तत् सुतस्वृतह प्रस्त्यार अस्यागनिक्रस्ततोनाभिरशबस्तत्तत्वतहस्पृतः। आयम भू वनोड प्रियवरतो नामः सुतः वनोः सुआयं भुवस्या यहाँ यहां उत्तह प्रियब्रतो नामह यह सुतह कस्य सुतह स्वायं भुवस्त्य मनो हो बायों बू मनो जीको प्रीवत नामक पुत्र थे। स्वायं भुवस्त्यमनोहो प्रियवरतो नामसुतः यहा मनकाजो पुद्धरता जिनका नामता प्रियवरत प्रस्त्य आगने क्रस्ततः उनका वे पुट्रा उनसे आगनी आगनिक ग्रता जन्म हुआ प्रियवरत के वहां आगनीग्र का जन्म हुआ। तता आगनीग्र के नाभी और नाभी के प्रिशब्जी हुए। यह पुरी परंपरा,
वावश परंपरा का बढ़न है यहाँ कि मनू राजा के फुत्र मनु स्वायां भूक्य पुत्रते प्रियवरता उसका पुत्र आगनिकर,
उसका पुत्र नाभी नाभी का पुत्र था नुशब रुशब्दी के विज्वे आर रुषिव जी कौन है,
उसका परीचे हमें दिया गया है। मनु राजा की ही संतान है,
उनके कुल में ही उत्पन हुए। मनु राजा का पुत्र प्रियवरत उसका पुत्र अगनिक्र अगनिक्र का पुत्र नाभी और नाभी का पुत्र प्रशबत तमाहुर्वासु देवांशं मोक्षदर्म विवक्षया अवतीरणं सुतशतं तस्यासी द्वेदं पारमं। समाहुः वासुदेव अवशं मोक्ष धर्म विवक्षया अवतेरणं तुत्तशतं तस्यासिबेदपारगम् ऐसा कहा जाता है भगवान वासुदेव के अउशने ही मोक्ष धर्मका उपदेश किया मौक्ष धर्मा विवक्षया मोक्षि धर्म का उपदेश करने के लिए रुष्यब जी के रूप में अवतार लिया था। तम आहूँ,
तम आहूँ,
तम सर्वनामे। उसके बारे में कहा जाता है तो जहां अगे के शलोक में,
अगले शलोक में अगले मतलब पिछले बोलते हैं पहले वाले,
पहले वाले स्लोक में यो लास्ट नामता उनके बारे में तो लास्त नाम किसका था?
मनो जी के वाँश मैं जो आखिरी नाम ता हो किसका ता रुशिब्दी का तो रुशब जी को तम आहुभू मतलब रुशब जी के बारे में ऐसा कहा जाता है। क्या कहा जाता है वासुदेवामशम् वाफ़ु देव। का ही आउश जो है। वो रुशब जी है,
रुशब जी को वासुदेव जी का अंश कहते हैं। मोक्ष धर्म विवक्षया विवक्षया क्या थी?
उनको क्यों भगवान काउंश कहा जाता है?
मौक्ष दर्म विवक शैया मोक्षदर्म का उपदेश करने के इच्छा मौक्षि धर्म करने के लिए अवा तेरणम वासु देवांशं अवतेरणं तो भगवान ने वो रुष्यब के रूप में अवतार लिया था। मोक्षि धर्म का उप्टेश करने के लिए उनके तो पुत्र थे और वे सबी वेद के पारगामी तो ही जुश्याब के साप उत्राते है अवतरिन सुतशतं सौपुत्र उनको सौ पुत्र दे रुशब्जी के सौ पुत्रत हैं और सौ के सौ कैसे ते?
अश्या तुतशतं आसिद्वेद पारगं। वेदमे पारंगत तस्य सुतषटं उनके सौपुत्र सबीके सबी वेदमे पारंगत तो ये कथा शुरू हो गई विवक्षा क्या है उपदेश इसके बारे में किया जाएगा वसुदेव जी क्या जनना चाते थे?
वसु देवजिका और क्या प्रश्न था?
नाराज जी के प्रति वसुदेव जी मोक्ष का उपाय जनना चाते थे। भागवतां धर्मान जिन से विश्व का कल्यान हो। विश्व भावनान भागवतान धर्मान वसुदेव जी जानना चातेते। यो की मोक्ष का उपाय है। वो तुलाने के लिए,
उत्तर देने के लिए वसुदेव जी के प्रश्न का उत्तर देने के लिए नाराजी ने ये सब पहले तो अपने प्रसंदता दिखाई कि ए वसुदेव जी तुमने मेरे पर बड़ा उपकार किया। क्योंकि ये भागवत धर्मान आग्वात दर्मा भागवत धर्म इतना कल्यानकारी है,
इतना उत्कृष्ट है। परम आननद देने वाला है और ये मेरे ब्रिया परमात्मा भगवान श्री कृष्ण का ही ये तो धर्म है। भगवान्श्री कृष्ण काही सुबा इसलिए उतो प्राफुली तोगे आनन्दी तोगे उनके मन में ये कथा कस्वरागौ तब ये कता शुरू हो गई। प्रियव्रतो नाम स्वायं बुवस्यतुत स्वायं भुवनों के पुत्र प्रियवर्त उनका पुत्रा आग्रिकरा उनका पुत्र नाभी और उनका पुत्र रुशपर। रुष्यब जी के वहां साव पुत्रते रुषब जी को वासुदेव का अउश माना जाता था। और वो भगवान ने उस सरूप में अवतार लिया था मोक्षदर्मा का उपदेश करने के लिए। वो रुष्यव जी के जो सो पुत्र थे,
वो सभी पुत्र वेद में पारंगत थे। अभी आगे चल रही है कता ते शाम्वई भरतो जेष्ट हा,
नारायन परायन हा। विख्यातं वर्षमेतत्यन्नाम्नाभारतमद्धुतं। देशाम भई भरतो नाम जेश्ट पुत्र हा। सबके सब वेद्वे पारंगत थे लेकिन फिर भी सबके अंदर कुछ ने कुछ विशिष्टत आय थी। बरतो नाम,
इनका नाम बरतता और जेष्टा वो सबसे बड़े थे। देशाम वो सौ पुत्र में जो सबसे बड़े राजा थे,
जो बड़े पुत्र थे। इश्ट बुत्र दे ओ उनका नाम बरता और नारायन परायन हाँ। वो हमेशा नारायण के परार रहते थे। विक्यातं वर्षं एहता दियत नामना। भारतं अद्बुतं उन्हींके نام سے یہاں हमारा देश भारत वर्ष कहलाता है। यह अत्बुत देश भारतवर्ष नाम से विक्यात हुआ है। शब्जी का जो जेष्ट पुत्रता उनका नाम परत्ता वो भगवत परायन हुमेशा रहता था नारायन परायन ही वो था। उसके नाम से यह देश का नाम भी भारत वर्ष पढ़ा है। कैसे बोल सकते हम अपने अपने रुशी मुनियों को जब देश का नाम,
देश का गोत्र ही वही हो गए,
तो हमारा गोत्र तो वही रुशिमनी होंगे। वह है सहबुक्तबोगान्त्यत्वेमानिर्गतस्तपसाहरिम् उपासीनस्तत्पदविम् लेमे लेवे वई जन्म भीते स्रिभे सहा मुक्त भोगा यः प्रेमां निर्गतस्तपसाहरिम् कुपासीनस्तदपददिम्लेबे वै जन्म बेस्त्रि बिहे बुक्तबोगान चक्ता इमाम् निर्गतह तपसा भरिम् वासिनहा तद्बदविम् ले बे वै जन्म बिस्त्रि बिही वरत्राज़क राजाका उसके बारे में कहा जा रहा है उन्होंने तह भुक्तभोगान चेकता तो जहाँ जिस पुर्ति पर भोग के विशे उपलब्द होते रहते हैं,
ऐसी पुरुत्वि का त्याग कर दिया। भुक्तबोगा बुक्तबोगाम इमाम यक जा तो ये पूर्ट्विक है उपर जितने बी ओगते उनका त्याग कर। मिर्कतः सपसाहरिम तो निकल गए,
वन वे चले गए। सपसाहरिमवासिनह पर वाँगी वासन की कठिन तपश्चरिया माध्यम से श्रीहरे के उपासना की जन्मभिस्त्रिभिही लेवे तत्पदवें। पदवें मौक्ष तद पदवीम मने हरिकापद प्राप्त किया। हरिकापद मने मोक्ष प्राप्त किया। तीन जन्मों में उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। जो हम जड़ बरत का कथा सुनते हैं वो बरत जी की बात है इनको मोक्ष लेने में तीन जन्म लेने पड़ा मोक्ष के लिए सब यात था उनको हर एक जन्म में,
अपनी स्थिति यात थी,
पुर्वा जन्म यात था। तो जहां जहां गलती ही थी। उसको सुधार कर उनोंने अपनी तपश्चर्या लोलीन रहे। और उनका जो ये था मोक्षिकी प्राप्ति ओहनोंने पाया देशा नवानवद्वीपपतयोस्यसमन्ततः कर्मतं द्रप्रने दार एकाशी तेर भिजधातयः तो एक जेश्ट बुद्रतिक की तो बात हो गई तो पुत्रते उनमेसे एक जो बड़ा पुत्र था,
जिनका नाम भरत था,
उन्होंने तो त्याग ले लिया,
त्याग पुर्थी को त्याग कर,
मतलब संसार को त्याग कर,
वो तो वन में चले गए और भगवान श्रीहरी की उपासणा में मग्ण हो गए और तीन जन्म के बाद उन्होंने मोक्ष प्राप् अब ये 100 पुत्रों का हमें गिंती करना है तो पुत्र मेंसे एक पुत्रा भरक्ती की बात आगे नवाद वी पो पताया हाँ अस्यासमन्ततः कर्मतंत्रप्रनेतारः एशाम नवा अभी शेश निन्यान वेट 99 एक राजा की बात हो गई,
बाकी के जो 99 थे। निन्यान वे उन मेसे नो इस भूमंडल के तब आर दीपो क्या दीपती हुए?
नो दीप है हमारे देश में सबी जीपो के अधिपती हुए। नौ पुत्र थे वो विपो के अधिपती हुए। क्या सी?
कर्मतंत्र प्रनेतारः कर्मतंत्रो के रचईता तो जिनको अच्छी तरह से ये सब वेद काम्यां था। पुरा कर्मतंत्र जीवि जीवन जीने के लिए भोतिक उन्नती ब्राप्त करने के लिए और अपने इच्छाय पूर्ण करने के लिए परमात्मा के आरादना उस रुप में मनुश्य करें और अपना कल्यां करें और धर्म की रक्षा हो सकें जिन से अपने इच्छाय पूर्ण करें। ऐसे जो उपाय थे कर्मतंत्र का ग्ञान जिनकी पास था तो वो नौ दिप के अंदर च्छा गए और वो कर्मतंत्र के लचैता ब्राम्मन हो गए। दीपो के अधिपती हो गए और कर्मचंत्रों के रचईता ब्रामन हो गए। सौमे से एक भरत राजा,
पाकी नौव नौधिप के अधिपती हो गए और बाकी इक्यासी जो थे वो सब धर्मचंद्रों के रचेयिता प्रामन हो गए। कभी कितने बज़े?
इतने जए कुछ नहीं नवा भवन महा बागाः मुनयोयर्त सुम्षिनः। श्रमना वातरशना आत्मविध्या विशारदा नवा भवन महा भागा मुनयोयर्तसंसिनः श्रमणावातरशनाः आत्मविध्याविशारदाः यह अभी जो आखेरी नौ पुत्र थे उनकी बात कर रहे है। नवा नवा अबवन महा बागा हा नौ परमार्थ का निरुपन करने वाले अर्तः शांसेन हाथ। मुना यहाँ नौ जो मुनी नौ बचे जो। रुशा मुपुत्र मुनी परमात्मा का निरुपन करने वाले महाभाग मुनिवर हुए। महा भागाः अबवन महा भागा हा अबवन। महा भागा बने,
महा पुरुष बने। अर्तशाउसीनहा मुनयहा मुनी कहलायो क्योंकि परम अर्थका अर्था शौंसिनः अर्तशंसिना परमार्तशंसिना परंत तो है उनका अर्थ करने वाले,
निरुपण करने वाले ओ महाभाग मुनिवर कहलाये आत्मविध्या में श्रम करने वाले श्रमना वातरशना आत्मविध्या विशारदाः आत्मविद्यामेविशारत आत्मा मिज्या में शिरमणा वातरशना आत्मविध्याविशारदाहा विशारत हो गयो आत्मवित्या में और हमेशा उसके लिए ही श्रम उठाते थे। आत्मविद्या में शरम करने वाले थे। दिगंबरते वातरशना वात जिकंबर और अध्यात्मविद्या में कुशलते आत्मविध्या विशारदाः वातरशना मन दिगंबर उस आधूते मुनीते दिगं बरते देगे ही जिन के अंबर थे। वातर शिनाउस का नाम है वस्तरा के रूप में विशाय थी मतलबो मैं जादे गंबर रहते थे और अध्यात्मविद्या में हमेशा पारंगत थे। इसमें एक फुटनॉट दी गईए कि इससे पहले भारत वशको अजिनाब कहते हैं उसकंद पुराणमे के अंदर ये कहा गया होंगा भारत वर्षको अजनाब खंड़ अभी ये नौ कौन थे उसका वर्णन कर रहे हैं। कवीर हरी रंतरक्ष प्रभुद्ध पिप्पलादयः पिप्पलायनः आर आवीर होत्रोत द्रुमीलः चमसकरभाजनः कवी ही अरेही अंतरिक्षहा प्रबुद्धः पिप्पलायन आविर्भूत्रः अतः दुरुमिलः चमसः और करबाजन कवी अरी अन्धनिक्ष रबुत दाप इपलायन आवेर होत्र रुमिला जमस और करबादर कुछ होगी विशिस्ता अपने अपने विशिस्ता के रोप उनके नाम भी होंगे। एतैवै भगवत्रूपं विश्वं सदसदात्मकं। आत्मनों वयतिरेकेन पश्यन्तो वयचरन्महिम्। क्या करते थे वो?
विजो दिगंबर है आत्मविद्या में पारंगत हैं उनका काम क्या होगा?
कुछ काम नहीं है कुछ करना ना कुछ करना ना कुछ दरना बस दिये वो गुमते रहते हैं। एते वई भवद्रूपं विश्वं सदस्रात्मकं आत्मनः अव्यतिरेकेन पशंतः ये चरन महीम। वो तो बस ये पुर्थी पर विचरन करते थे। कैसे द्रश्टे थी उनके?
क्या ग्न्यान था उसके?
विश्वो को वो कैसे देखते थे?
भगवधरूपम। एविश्योखो बगवात सरुपीवो देखरेट सद्य सदात्मकम् विश्व का सुभाव तो कैसा है सद्ध और असद्ध जिनका स्वरूप है। कभी कुछ चीज है,
कभी नहीं है। हम उसको परम सत्य मान लेते हैं,
ये अग्ञानियों का दर्शन हैं,
ग्ञानियों की द्रश्टी हैं.
जो है तो है,
नहीं है तो नहीं है,
कभी ऐसा है,
कभी ऐसा है तो हमको उसका स्वरुप ही जो दिखता है उसको ही हम सच मान लेते हैं। यह ब्रियानी के द्रिश्ट है लेकिन सत् असत आत्मकम् सट असत सत् जिसको कहते हैं गटहा सत् सन गटहा जो गट है पट है अभी गट नहीं है असन गट हा यहां गट नहीं है अभी गट नहीं है पहले गट था उसको कहते हैं सत और असत तो सभी चीज़ों का,
सभी व्यक्तिओं का,
सभी नामरोग का,
सभी विशिष्टाओं का कभी प्राणिक पदार्थ का सुरुब यही है,
कभी सत है तो कभी असत है। ये विश्व का सरूप है,
लेकिन वो तो भगवत सरूप देखते हैं। मतलब सत्वी भगवान के अभीवक्ती और असत्वी भगवान की अभीवक्ती। उनका ही भगवान की ही अभीवक्ती। परमादमा की ही अभीवक्ती है जगत। इसलिए जगत में जो भी कुछ है,
जैसा भी है,
जहां भी है,
उनकी दरिष्टी में वो ठीक है। सब ठीक है हमें द्यानन्जी महराज के गुरुजी ते तारानन्जी महराज के बहुत बुड़े हो गया था जब उनके पास हम जाते थे एक ही वाक्यों बोलते थे तब ठीक है कुछ भी आप कैसी भी बातें लाओ उनके पास किसी की भी चर्चा करो देश के बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में करो उसके बारे में क सब ठीक है सब ठीक है तो आश्यर लगता था इसा कैसे हो सकता है सब ठीक है ऐसा कैसे समझ सकते हैं या तो कुछ अच्छा है या तो कुछ बुरा है एकिन उनकी दर्श्ते में सब ठीक है। आत्माव की द्रिश्टी में सब ठीक हैं। तो भी ठीक है,
नहीं है,
तो भी ठीक है,
ऐसा है,
तो भी ठीक है,
वैसा है,
तो भी ठीक है। उनको कुछ लेना देना ही नहीं है। आत्मनः अव्यतिरेकेना पश्यन्तः जगत को भगवद रुपम जानना मतलब अपनी आत्मा काई प्रतिविम समझना आत्मनः अव्यतिरेकेना हमारे अधर्शन कैसा है हम अलग है और जगत हमसे अलग है जज्मैन भी हुआ करता है कोई कैसा है उसके बारे में हमारे मुद्धी में हमेशा एक अभीपराय रहता है। क्योंकि हम उसको अपने से अलग समझते हैं। हम जीवे और जगतं से बिन न हैं। हम द्रश्टा है और जगत रश्या रश्य है अंसे बिन ले तो ये अग्ञानी के द्रिष्टी हैं। और ये क्योंकि आत्मविद्या में पारंग गत थे तो उनको पता था ये तो जगत आत्मा का ही अभिव्यक्ति है आत्मा की ही अभिव्यक्ति है आत्मनाहा आवेति देखेना पश्यनताहा। इसलिए उनको तो जगर अपने से बिनना नहीं दिखता था। जिले आराउंसे विच्रण कर रहे हैं। करना क्या है?
कुछ करना नहीं है तो वो सब बुमि गोपाल के आराम से विचरण कर सकते महात्मालों کہیں بھی جا سکتے यहीं भी ठैर सकते हैं। इसी भी रूप में वेवार कर सकते हैं। उनका काम तो एक ही है आत्मविद्या का उपदेश करना अगर कोई जिग्ञास आ जाये,
तो उनको उपदेश करना,
नहीं तो वो भगवान का दर्शन करते रहे थे,
क्योंकि अनुभव तो भगवान का ही हो रहा है सबको.
ज्ञानी और अग्ञानी दोनों को भगवान का एनुबु हो रहा है। तो जो बगवान का नबव उनको समझ सकते हैं। भगवान को जाँते हो भगवान के अनुभोगो अच्छी तरह से समझ सकते हैं। अग्नानी भगवान का अनुबव होने पर भी उसको समझ नहीं सकते हैं। और वो सामसारिक बुद्धी के वाज़ा से अपनी द्रिश्टी से,
अपनी व्यक्तिक द्रिश्टी कारण उसको भर्वाण का अनुबो होने पर भी नहीं होता है। जबकि ग्र्यानी को सदार सर्वदा भगवान का ही अनुभव होता है। सर्वारूप में सर्वत्रा भगवान का उनको दर्शन होता ही है। तो जो देखते हैं,
वो भी भगवान को देखते हैं। सुनते हैं,
वो भी भगवान के बारे में सुनते हैं। तो शब्द,
सपर्ष,
रूप,
रस,
गन्द,
जो भी स्वाब जो जो अनुबोः होता है वो परमात्मा का आई अनुबोः है वो स्पश्ट है उनकी बुत्ति में इसलिए उनको कोई कभी कोई पर याद नहीं होती किसी के बारे में सब समझ सकते हैं और भगवान के परती प्रैम भी रहता है। जब भगवान का कुछ करना नहीं है तो भगवान का अनुभू तो होई रहा है तो उसका अननलो अनन्मै माताजी अमेशा इधर उधर बात थी थी। जहां उनका मन हो जाये बस अच्छानक संकल्प करेगी चलो आज इदर जाना है तो उनकी टीम उदर दोड़ेगी। पुरे देश में उधर उधर भागा करते हैं। मैंने सुना एक बार गांदी जी ने उनको डाटा दोनों के बीच में ऐसा था प्रेम का मतलब एक दूसरे के परती वो अदर रखते हैं तो मजाक में गान्दी जी ने किया कहा कि आप क्यों इदर इदर भागा भाग करते हैं जो गपे रुक्के थैर ये वो अपने पास उठना चाहते थे कि आनदमे माता जी उधर रखे क्यों जाना है आपको?
दादगो वर तो कोतो एक जगा ठैर कर उपासा करनी चाहिए बगवान के लिए दिखता होनी चाहिए क्यों आप बागा दोरी करते हैं तो अनने माता जीने एपर जस जवाब दिया कहती है कि मैं तो जाती हूँ तो मेरे बापो के बगवाडे में जाती हूँ। मेरी इच्चा है,
तब पूरा देश,
पूरा विश्व,
मेरे बापू का बगवाण है,
बगीचा है। हम तो बच्चे हैं हमारी जहाँ मरजी हैं हम जाएंगे मुझे कोई नहीं रोख सकता तो बात तो सही है। उनकी द्रिश्ति में सब परमात्मा ही है,
जहां जब पीर जाना चाहते हैं,
वो जाते हैं। चाहुई काम आ गया तो तुरंत दोर के जाते हैं। अव्याहोतेष्टगतयः सुरसिद्ध साध्य संदर्वयक्षनरकिनर नागलोकान। मुक्तास्चरंदी मुणिचारणभूतनाथ विद्यादरद्यकवाम् भूवनानिकामं। अव्याहत इश्टगत यहाँ। तुरसिद्ध साध्य,
तुरसिद्ध साध्य,
गंदर्व,
यक्ष,
नर,
किनर,
नागलोका मुक्ताहा चरंति मुनी चारण भूतनात विध्यादर विजगवां वुवनानिकामं अव्या होता इश्ट गतया उनको एक आशिरवाद मिला था। जैसे नारत मुणी के पास प्री और ड्रीप विजाग एहें भी जा सकते हैं उनको कोई नहीं रोख सकता है। एसी सिद्धी उनके पास थी तो ये नौ यूगिश्वरों के पास भी इसे सिद्धियाति अव्गाहता इश्टगतयहा इश्टे करते हैं जहां उनकी इच्छा हो वहां हो जा सकते हैं। अब मैं आहाता है किसी के द्वाना लोका नहीं जा सकता था। कोई उनको रोक नहीं सकते पेट चासे बिना रोख टोक से वो कहीं भी जाने वाले थी। गतयः अव्याहत इश्ट गतयः स्विच्चाग दिको सेच्चा कती की वो ही रोग-डोग नहीं थी। ऐसे एक जिवन मुक्त महात्मा देवता उनको जीवन मुक्ते ही कहा जाता है ऐसे जीवन मुक्त महात्मा,
जिनके गति में कभी कोई रोक टोक नहीं थी,
और सब क्या गती सिद गया हा,
अपने मर्जी से हो,
सही भी जा सकते हैं। कहां जा सकते थे?
देवता सुरमान देवता देवलोक में सिद्ध सिद्ध लोक वैं साध्य पिंदर्व ये सब योनी हैं,
साध्यगण हैं,
उनक्या भी कही कोई लोक होता है। जंदर वयोनी है,
उनका भी कोई स्थान होता है। यक्ष,
मनुष्य इन्नारा और नाग लोक,
नागों के लोकों में। ये सब लोग है अपने विश्यों में,
ये सब सुरिष्टी है,
सब के स्थान है। देवताओ का लोक है,
सिद्ध का लोक है,
साधेघण का लोक है,
विंदर्व का लोक है। यत्यका लोक है,
मनुष्यका लोक है। और इन्नर वगेरे का नाग का सब काल ओके उसके अलवा मुनी,
चारण,
भूतनात,
विध्यादर,
प्राम्मण और गौवों के स्थानों में यतेश्ट विचरने लगे। तो ये सब लोक में तो जाते ही थे कभी इच्छा हुई देवता लोक में चले गए कोई देवता उनको रोक नहीं सकते तो यहां क्यों आये। ऐसे कोई सोसाइटी में कोई अगर सादु गुश जाए,
तो सब लोग उनको,
वो चौकिदार जाने नहीं देगा। पुछेगा कि क्या काम है। बिना पैचान के आपको अंदर नहीं जाना जाने देंगे तो ये सब रोक डोग होती हैं कोई रोक डोग नहीं देवता भी नहीं रोग सकते थे सभी लोग में वो जाते थे हम जिनको नहीं जाते हैं,
मुनी,
चारण,
ऐसा हम नहीं जानते हैं ये कौन हैं.
और उनके भी कोई जगह होगी,
उनका भी कोई स्थान होगा.
तो उनको मिलने के लिए,
तो उनके बीच में भी वो जा सकते हैं.
मुनी,
चारण,
भूतनाच,
विद्यादर,
ब्रामना और गवव के स्थान में। तो गोशाला में भी वो आराम से पहुँँ जाते हैं। यते चवीजन विच्चरन करते हैं। पूरे विशो में गुंबते रहते हैं। करना क्या है खरतु रुतो तो है नहीं,
बोगतु रुतो तो है नहीं,
जीवन मुक्ता है। आप विध्या प्राप्त कर लिए तो अबी जीवन का उपलोग क्या करना है?
आओ प्रियो मज़ाको और उनके पास सिद्धी भी है,
लोगों कहीं भी जा सकते थे कदानिमेहे सत्रं उपजग्मूर्यदुच्छया वितायमानं रुशिबिरजनामे नाभे महात्मनः। तै कदा तै कदा उसद्धी है उदर एक की विजय से तव के ऊपर एक मातरती उसका लोप हो गया। उरिजिनल पहाँ शब्द क्या है ते ते सहा तो ते और नव योगियों के बारे में ते एक अदा निमेह सत्रम् उपड़ जग महू जग रुच्चा तो परमात्मा के इच्छा से प्रारदवश वो कहां पहुँच गए?
उपजगमहों पहुँच गए?
कहां पहुँच गए?
विथाया माना मानं रुशिभी रजे नाबे उके निमेहे सत्रम उपजग्मुहु। तो राजा निमिका एक यगने चल रहा था,
वहाँ वो लोग पहुँच गए। ते एकदा निमेहे सत्रम उपजग्मुहु यदुचया। जनाबखंड मतलब भारत वर्ष में महात्मा राजा नेमिके यहाँ वितायमानं रुशिबिही अजनाबे अजनाबे बारत वर्ष में जो बारत का नाम अभी बारत का नाम है भरत राजा के नाम के उपर से भरत वर्ष नाम हुआ और उसके पहले बारत वर्ष का नाम था अजनाब अजनाब अजनाबे सप्तों विवक्ते कचन अजनाबे भारत वर्ष में वितायमानं रुशी भिही वुश्यो के द्वारा एक सत्र मतलब यगन्या या जा राता तो आयोजन किया गया था वहाँ वो पहुँच गए जगा कही थे?
नेमी राजा की जगा थे?
नेवी राजा के राज्य में जहां यगने चल रहा था रुशी मुन्यो द्वारा वहां ये नौ योगेश्वर पहुंच गए। तान्द्रिष्ट्वा सूर्यसंकाशान् महाभागवतान्रुपह यजमानो ग्नयो विप्रा सर्वहेवो पतस्तिरे पांद्रिष्ट्वा,
सुर्य संकाशान महा भागवतान रुपह रुपह राजनेवि तान् द्रिष्ट्वा तान् त्यान् मतलब हे युगिन् द्रिष्ट्वा महाभागान् द्रिष्ट्वा महाभाग सिव नो योगेश्वर्ते उनको देख तुकार उनको देखा उनका क्या तेज था। सूर्य संकाशान। सूर्य के समान तेजस्य। महा भागवतान महा भागवतान मतलब भगवान के जो है उसको भागवत बोलते हैं ऐसे परमतेजस्वी महात्माओं को महाभागवतों को देखकर सुर्य के समान तेजस्वी महा बागवतोड को देख कर यह जुमान मानने राजा ने में यह जमान है अगनयह विप्राह राजनेमी फिर यजमान राजनेमी यजमान अगनयः विप्राहा प्राम्मणगन और सर्वाइव उपास्तेस्तस्तिरे सर्वै वो उपतस्ती रहे हैं। सब खड़े हो गए। ऐसे तेजस्वी रूप वाले तेजशी सरूप महा भागवतों को देखकर राजा नेमी यजबान। तो भी ब्राम्मण,
तब उधर जो भी लोग थे,
तब लोग कड़े हो गए। इसा एक प्रणानी भी है हमारे संस्कृति में हमारी संस्कृति में कि जब ही ऐसे योगी आते हैं मुणी आते हैं सादु संद आते हैं तो उनको खड़ा होकर हमें स्वागत करना चाहिए उनका आदर करना चाहते हैं तो ये तो राजा अगर वो तेजस्वे नहीं होते तो भी कोई सादु को देखकर हमेशा आदर देने वाले ही थे। राजा का तो धर्म ही है लेकिन इन महा बागों का इन और योगेश्वर का तो तेज ही अद्बुत था। सुर्य के समान तेजसी थे। ना तेज होता है। तो तुर्य के समानते जस्वी ऐसे महापुरुष्यों देखकर सब के सब उदर जो लोगते सब कड़े हो गए। विदेहस्तान विप्रेत्य नारायण परायणान प्रीतसं भुजयान जक्रे आसनस्तान्य थारथः। एक ग्रंत की महिमा इसमें ही है कि वो हमें सब सिखाते हैं कि क्या-क्या आचरन हमें करना चाहिए। जब हमारे सामने कोई सादु आते हैं,
कोई ऐसे महात्मा आ जाते हैं पदारते हैं,
तो हमें क्या करना चाहते हैं?
ये सब सीखने का है वसुदेव जी ने भी कैसे नारद मनी का सत्कार किया हमें सिखाने के लिए। यहां भी रेमी राजा कैसे योगेश्वरों के साथ विवाद करते हैं हमें सीखना है विदेहः तान अभिप्रेत्य विदेहा मतलब राजा नेवी माराजा विदे तान अभिप्रेक्तिय नारायण परायणा उनको पता चल गया देखते ही पता चल गया कि ये तो भगवत भकत है नारायन परायनान नारायन ही उनका परमाश्रे है ऐसे भगवत महा भगवतों को देखकर उनने जान कर। उनके उनको आसन दिया आसन दिया और जब उन्होंना संग्रहन किया प्रीत संपुजयान चक्रे आसनस्तान आसनस्तानेर यतारभतव आसनस्तां यतार हता है। तो नौ जो मुनी थे,
मुनी गण थे,
उन मुनी गण को आसनस्त हुए मुनिगल को आसन में अपने अपने आस्तर में प्रतिष्टित हुए मुनी गडो का उन्हेंने प्रेम पुर्वक स्वागत किया पुजन किया। भुजियान चक्रे ऐसा नहीं किया हम तो यगने में बैठे हैं तो ठीक हैं मुनी आये तो आये देखेंगे किसे को बोल देंगे अपने नौकर को जाओ उनको आसन देदो और अपने मैं तो यगन्या करागा हूँ। ऐसे वो अपने काम में व्यवस्त रहे और उनका स्वागत ना करें। ऐसा ये विद्वान लोग नहीं करेंगे। तो ये राजा ने अपना यगन रुकवा कर पहले उनको आसन दिये उनकी पुजा की तान्प्रोचमानान्रचरचा तान्रोचमानां सरुचा ब्रह्मबुत्रोपमान्नय नव पप्रच्च परमप्रीतः प्रश्रयावनतो रुपः ब्रमादिके पुत्रोके समान शुशो बित पुन नो योगे श्वरो के साथ क्या वेवहार किया राजा नेमी ने आ विदेह की बात है यह तो विदेह राजा की राजा जनक की बात सौरी राजा जनक रम्मपुत्रोपमान बर्माजी के पुत्रों के समान जैसे सनकादी अत्यांत तेजस्री थे तो उनके उपमां दे गई। प्रम्म पुत्रो पो मान नवा यो नव योगेश्वर्ते गरुजान दान रोज़ मानां परामप्रीतः पप्रच्च प्रश्या प्रश्या प्रश्रयावनतह रुपह प्रश्रयावनतः अत्यंद विवेक्स प्रसन चित से अध्यन्त विवेकसे नमरता पूरुवक राजा जनक ने विदेहने प्रश्न पुचे। नो योगेश्वर को इस प्रकार प्रश्न पुचे। पप रच्च उनको पुचा। वीडियो वाज़ मन्ने भगवतस्ताक्षात् पार्षदान्नवमदुत्विशः विश्णोर्भोतानिलोकानां पावनाय जरंते हे अब ये सववाद शुरू हो रहा है। विदेही राजा और नो योगेशवर के बीच विदेह वाज़ मन्ने भगवतह साक्षात पार्शदान नवा मदुद्धेशः भगवाण मनने अहम मनने मैं मानता हूँ भगवतः साक्षात पार्सदान। नवमदुद्धिशः। मदु सुधन के पार्श्वद,
मदु दिशह वगातः मदुद्विशः ताक्षाद बगवान मदु सुदन,
मदु दिशाह,
बगवान श्री कृष्ण का नाम है। और शाष्टे वीवग देखवा जाने बगवतः बगवान मदू सुधन उनके भगवान मदू सुदन के पार्षद ही समझता हूं। पार्शदान टाक्षाट पार्छदान तो हे भगवन मैं ये मुनी गण हैं उनको साक्षा श्री कृष्ण के मैं उनके पार्षद ही सवत्ता हूं। यापी भगवान विश्णुके पार्शद संसार के प्राणियों को पवित्र करने के लिए गुमा करते हैं। तर अलबात इधिवाते एकी सिद्धान्त,
एकी नियम होने लोगों का एक ही समझ हैं इन लोगों जैसे वसु देव जीने भी नारत जी के परती है कहा?
कि जो भी बगवान के बक्त हैं उनका कहीं भी जाने का प्रयोजन एक ही होता है। राजन हो के नहीं हो उनके वहाँ जाने मात्र से जहां जाते हैं वहां पवित्रता चाही आती है। उस थल भी पवित्र हो जाते हैं,
वहां के लोग भी पवित्र हो जाते हैं,
यहां का वातावरण भी पवित्र हो जाते हैं। इसलिए हिवीदे राज आप कह रहे हैं मैं ऐसा मानता हूँ कि आपके आगमन से यहां की भूमी पवित्र हो गई। और क्योंकि आप साक्षाक भगवान मदु सुदन के पास्चत हैं। पावनाय चरंते ही भगवान के जो बक्त है वो तो हमेशा सब जग़ा पवित्र करने के लिए ही विचरण करते रहते हैं। तो मुख्यों बात क्या है?
इनके आगता स्वागता करना लेकिन अपना भाग्ये खुल गया ऐसे समझ रहा है। जब महात्मां हमारे प्रांगन में आते हैं,
हमारे घर में आते हैं,
तो हमें समझना चाहिए कि ये भगवान की विशेश कृपा है। भगवान की योजना है और उनके आग्बन से हमारा कुछ कल्यानी होने वाल है। तो हमें उनका पूझन करना चाहिए,
आधर करना चाहिए,
सद्कार करना चाहिए। और मुख्य बात क्या है उनसे कुछ लाब करते हैं। प्राप्त करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तो सच्चन करना चाहिए। राजा को ये सब बात पता है। दुर्लबो मानुशो देहो देहिनाम् ख्षणपंगुरः सत्रापि दुर्लबं मन्ने वैकुंट प्रियधर्शनम्। और कितने सुन्दर तरीके से वो उनकी प्रिशंस आ करते हैं। अपने शब्दों में भी कितनी मदूरता है और कितना आदर है। दूर्ला बहा मानुशः देहः देहिनाम् ख्षणबंगुरः तत्रपि तत्रापि दुर्लबं मन्ये वैकुंटप्रियधर्शनम् ये उनका घ्न्यान है राजा का विजेह राजा का ये ग्ञान है वो कह रहे है जिवको जो यह मनुष्य सरीद जो किक्षण बंगुर है। पर फिर भी मनुष्य शरीर मिलना ही दुर्लाब है। दुर्लबं त्रैंब ए तता मानुशम् महापुरुष मनुष्यत्वं उमुक्षुत्वं महापुरुष सम्श विवेक्चुडामनिमे शंक्राचारी जिकेत सुल्लबं त्रैंब एक तता इतें जो तीज हैं अध्यालता दुर्लाब हैं जीव को मनुष्यतम् मुक्षुत्तं और महापुरुष्य सहुश्रया। इतना बड़ा उप्देश है। आप बड़ी समझ हैं अगर ये मनुष्या थोड़ा भी इसको समझे दुर्लबं कि मुझे क्या प्राप्तवा बले मैं जीव हूँ बले अग्ञानी हूँ। पर मुझे क्या मिला है?
मनुष्य जन्म मिला है तो हमें उसके कोई उसका कोई महत तो हम नहीं जानते मनुष्य जन्म का। अगर जानते तो हमारा जीवन बहुत पवितर होता। दिव्योता हम अपने जीवन को इतना सुन्दर बनाते हैं। और उसका पुर्णलाब उठाते हैं। लेकिन किसी को सुनते सावे बोलते भी है लेकिन उसको ये वास्तद में कहा जाएँ की मनुश्य जन्म का कुछ महता नहीं है। गवरोशाली नहीं समझते। परख्वान की कृपा नहीं जानते। मनुशे का जीवन ऐसे ही विमारी विमार हो जाए शरीर तो भी कोई बात नहीं। खाते रथे,
पीते रथे,
भोगते रथे और अपना संसार में ही वो पूर्ण कर देते हैं। मनुष्य जीवन का जो लाब लेना चाहिए। क्या प्रयोज है ना मनुष्य शरीर का उसको पता नहीं है। पुछने तो कर्मयो कानुष्ठाम रिष्काम कर्म कानुष्ठाम भकतिवो कभी तो जीवन में ये सब शुरू होना चाहिए,
लेकिन मनुष्य नहीं करता है। प्रस अपना जो मैं और मेरा और अपनी जो बहुत भोतीक आवश्यक्ता है इसे के पीछे ही अपना जीवन हुण कर लेता है,
सहाब्त करता है। बहुत दरिद्रा अनुशय है। भले वो दन्वान हो लेकिन अंदर से वो बीचारा दरिद रहे हैं,
पामर हैं। उसको पता ही नहीं है कि मुझे कितनी जीज़ मिले है उसके जीवन में जो हुआ उससे भी संतुष्ट नहीं है अगर कुछ अच्छा हुआ तो तब भी मनुष्य के शरीर का क्या उप्योग करना चाहिए वो पता नहीं है। अगर कुछ नहीं अच्छा हुआ तो तो बस उसके पीछे रोता ही रहते हैं। और जीवन समाप्त करते हैं। इसलिए याद दिराते हमको दुर्लबहः मानुशः देहः देही नाम शणबंगुरः देही नाम,
देही जो देह प्राप्त करने वाले हैं,
ऐसे जीवों के लिए शन बंगुरा देहा हा।।।।।।।।।।।।।।।।। जो सालों तक रहते हैं। इसे भी दे होंगे लेकिन मनुष्य का देव चन बंगुरे मानुशा देहा दुललबहा पर वो किमती है,
दुरलब है,
सबको नहीं मिलता मनुष्य का जन्म। तत्रापि दुर्लबं मन्ये।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। विल्लना और उसमें भी भगवद भुक्तो का धर्शन एकुन्त प्रियधर्शनम् पैकुंट प्रीय धर्षणम जिनको वैकुंट प्रीय है उनका दर्शन तो किसको वैकौंट प्रीय होगा?
जिनको बगवान श्रीक प्रिय है। परमात्मा प्रिय है। ऐसे लोगो कादर्शन मतलब भगवत बोकतो कादर्शन मिल्ना इतो और भी दुरलब है। मनुष्य जन्म क्यों दूर्ला बे?
क्योंकि वो मोक्ष का साधन है। एक मातरा साधन मनुष्य का है। शरीर है मोक्ष के लिए इसलिए दुर्लब है। और जब मनुष्य नहां मनुष्य का जन्म मिल जाए,
मनुष्य तो अनेक है सुरुष्टी पर पार वगता है। अनंत वनुश के शरीरे अगर नो स्मर्वी मनुश्य के विवन में भी अगर सतन या संतो का दर्शन संतो का रशने सब जंगे अगर वो मिल जा उनके दर्शन तो और दुरलक समझता हूं। इतने नमरा ये राजा अपने ही भावना वेक्त कर रहे हैं,
नो यूगिशोर के सामने.
अतात्यंतिकं ख्षेमं रुच्चामी भगवतो नगाः संसारे स्मिन्चनार्दोपी सत्संगशेवधिन्रणाम् अतः आत्यंतिकं क्षेमं पुरुच्चामे भवतो अनगाह समसारे अस्मिन शिरार्दहापि सच्संगः शेवधिर नुराम। आता है ऐसा होने से वियाज रखना पड़ेगा ऐसा होने से मतलब क्या हमारे जीवन में अगर कोई ऐसे वैकुंट प्रिया दर्शन हो जाए,
कोई महात्मा का दर्शन हो जाए,
तो वो हमारे लिए दुर्लव है। इसलिए आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्चामी। अनगाहा निश्पात महानुबावो हे निश्पाप महानु बाओ अतहा इसा होड़े के कारण। अहम् पुरुच्चा मेही मैं आपको यह पुछता हूँ,
आपसे यह पुछता हूँ,
की?
आर्थ्यन्तिकं क्षेमं प्रचाली इसके बारे में समसार में अर्थिन्टिक कल्यां किस में हैं?
आत्यन्दिकं ख्षेमं निश्रेयस कल्यान इस मेहने। इस से ओता है उमसार में अत्यन्तिक कल्यान इसमें है लोगी अस्मिन समसारे शनार्दहापि सत्संगः नुरामशेवधी ही। शेवदिहिं शेवदिहि मन्लब खजान और मैं आप जब बदा रही हैं तो आपके द्वारा सच्चंग के माध्यम से मैं कुछ समझ प्राफ़त करने लगना चाहता हूँ और ऐसा जो सच्चंग है जो ग्ञान है सच्चंग के द्वारा जो हमें ग्ञान मिलता है वो शेवधी खजाने के बराबर है पनुष्य के लिए इससे ही हम नवका,
यह नवका है,
इससे ही हम भवसमंद्रा पार कर देंगे.
इसलिए उसको बड़ा रस है सच्चंग में। इसलिए पूछ रहे हैं कि हे महानुबाओ मैं आपसे पूछता हूँ। प्रचामी ये अनगाहा भवतः आत्यन्तिकं ख्षेमं पृच्चामी। मैं आपको आत्यन्तिक ख्षेम के बारे में कुछ ताओ कि संसार में अत्यन्तिक कल्याण इसमें है। महात्माओं का अधेक्षन का सस्थन भी में चम सारे शनार्दः अपि सत्संगः आदे खशन के लिए भी जो सत्तन होता है वहाँ मनुष्य के लिए खजाना समान है। दर्मान् भागवतान् भूत यदीन शुरूत एच्छमं एप्रसन्न प्रपन्नाय तास्यत्यात्मानमप्यजः दर्मान बागवतान बुरूता यदि नहाशुरतेक्षमं। यैही प्रसन्नः प्रपन्नाय दासेत दास्यत्यात्मानं अपे अजह नमरता से वो बिनती कर रहे हैं नव युगेश्वरोसे यदी नहां शुरृते क्षमान। हम अगर इसके अधिकारी हैं किसके अधिकारी?
चुतये श्रवन के अधिकारी है सच्चंके अधिकारी हैं। अगर हम अधिकारी होग,
यदी नहां शुतये क्षमं। दर्मान बागवतान यहीं प्रसन्ना प्रपन्नाय दास्यत्यात्मनप्यजह दास्यते आत्मानं अपि अजह इनको पता है विदेराजा को ये धर्मा तो उपदेश हम प्राप्त कर ले भागवत धर्म बागवत करन धर्म के बारे में ही प्रश्ना हुआ। निश्चित कल्याण आत्यन्तिक ख्षेमा आत्यन्तिक कल्याण किस से होता है भागवत धर्म को जानकर उनका आचरन करके ही हम मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए या तो भवान के सुरुफ को जानकर। तो हमें उपदेश दिजिये यदि हमारे सुनने के योग्य हो। तो हमें उन भावत धर्मों का उपदेश केजिये.
नहाँ बुरुता हमें सुनाई ब्रुही तन्मे निष्चितम् यट्छे स्यार निश्चितां तन्मे ब्रुहे अर्जून का प्रश्ना इसा इताने?
बुरुही भक। भगवान आप मुझे कहिये यच्रय स्यात निष्चितं जिससे मेरा निष्चित कल्यान हो। ऐसा बगवान मुझे उपदेश करिये। तो वही भागवत धर्म,
वही भगवान का स्वरुद आत्माका गन्या जिनके लिए यहाँ धर्मान भागवतान शब्द है। भागवतान धर्मान यह शब्द का प्रयोग हुआ है। तो राजा कह रहे है यदि हमारे सुनने के योग्य हो तो हमें उन भागवत धर्म सुनाईए। कर्मको सुनाये मतलब ब्रूता यदि नहां शमं अगर हम उसके लाइक हैं तो हमें उनके बारे में कहिए। जेन से यही,
यही मतलब जिन से,
जिस उपनेश से जिन धर्मों के ज्ञान से प्रसन नहां। प्रपनाय वसं नहूं कर इस उपदेश से प्रसन्न होकर अजन्मा प्रसन्न अज़ह दास्यते आत्मानम् अजहा प्रसननः अजन्मा भगवान। शुरृ कृष्ण बर्मात्मा जनमा गुळ्बा प्रसंद हुखार अपने प्रपन नाय मतलब अपने शरम में आय हुए प्रसन होकर भक्त को अपना सुरुपतक देश डालते हैं। तो राजा को पताया कि भगवान कैसे है अगर वो प्रसंद हो गए। प्रसन कब होंगे जब जीव भगवान की शरमें जाता है। प्रेम से अगर हम भगवान की शर में जाये और प्रार्थना करें। भावत धर्म के विशे में हम संसार छोड़ने के लिए तयार हो। और भगवान को प्राप्त करने के लिए जब तयार होते हैं उनके प्रात्मा करते हैं तो भगवान तो कैसे है?
वो कैड़े अजह परमात्मा दास्यते आत्मानमपे तो बुर्वान क्या बाकी रहते हैं देने के लिए अपना स्वरुप भी दे डालते हैं जो भी संसार में चाहिए है,
सौप देते हैं,
लेकिन अपना सौरूप तक दे रेते हैं। ऐसे गुरू भी नहीं देते आत्मकन्या इतने सरलता से जब नजीक के ताने प्राजना के यम्राजा से गुरुते हैं अम्राजयान चिकेता सर्जी किताने प्रात्ता की मुझे ब्रह्मविद्या चाहिए। पे किन यमराज आने कहा कि तुम कुछ और मांग लो। प्रमाविट जाकेट शिवा कुछ और मांग लो लेकिन ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के जिद चुड़ा है। इसा दुसरे अपने शद में भी आश्वलायन रमाजी के पास गए और देब नोने प्रासना की ब्रह्माविर्द्या के लिए तो पहले उनको भी ऐसे कहा गया त्रद्धा बत्ति ज्ञान योगात वेही ये उपदेश तो तबी मिलेगा जब आपके रदे में श्रद्धा हो,
बक्ति हो। द्यान की उपासना की हो तो आपका अध्यानता नुष्ठान किया हो अन्तर मुक बने हो तभी आपको ये उपदेश हम करेंगे। सीधे सीधे नहीं करते हैं। प्रश्ना उप्रिशद में भी हमने देखा वो रुषी गए थे भगवान के पास देश के लिए पिपलाद मने के पास तब उन्होंने भी बोल दिया था कि आप एक साल यहां रहिए,
बाद में देखा जाएगा,
मिले भी नहीं थे। तो इतनी सरलता से उपदेश प्राप्त नहीं होता है। लेकिन बगवान परमार्तमा वो तो ऐसे है। भगवान श्रीकृष्ण तो ऐसे है। आगो ते ने इसलिए मगलान शीकर इसना की बात है तो भगवान तो ऐसे है भगवान नारायन शुरुपुष्णम मतलब वही साक्षात नारायन परमात्मा उनका सुबाव तो ऐसा है। कि अगर कोई जीव अपने शरण में आता है,
प्राजना करता है मोक्ष के लिए तो भगवान तो उनको जो चाहिए वो सब देते हैं। अगर वो मोक्ष चाहता है तो मोक्ष भी देने वालें। अपनी आत्मा तक दे देते हैं। इसलिए भगवान विश्णो का नाम भी आत्मदह है। तास्यति आत्मारं अपी। तो अपनी आत्मा को भी वो भुर्वान दे देते हैं। इतने परम दयालू है। परम कृपालू भवान है। इसलिए हम भागवत धर्म को सुनना चाहते हैं आप से 😍😍😍😍😍 एवं ते निमिनापुरुष्टा वसुदेव महत्तमाः प्रति पुज्या ब्रुवन्प्रित्या सदस्स सदस्स स्क्यत्रि जंडपम् सदस्स स्क्यत्रि जंडपम् इवं ते निमिना प्रुष्टा वसुदेव महत्तमाहा। प्रति पुज्जान प्रति पुज्या ब्रुवन् प्रित्या ला सदस्यत्तु जम रुपं प्रसादा सी अर्तु जं रुपाम। चूनार अधवाज़े अब ये नाराज जी कहते हैं वो नौ योगेश्वर और विदेह राजा के बीच में होता है। यो सुम्बात थे वो इतना तक सोमवार हमें पताया अभी वापस आ गए। कहां वसुदेव जी के महल में जहां वसुदेव जी बिराजमान है और नारत जी उनके वहाँ पदारे हुए तो अभी ये दोनों के मीच में जो सोमात चल रहे थे वो वापस वही सोमात चुरू हुए शिर नारत हुआ च नारत जी उनको कह रहे एवं ते निमिना प्रुष्टा वसुदेवा महत्तमाहा। एवसुदेव। महत्तमाहा निमिना पुरुष्टा तो राजा निमिने जैसे उनको प्रशन किया तो वो सब योगी इस प्रकार प्रशन बुचने पर उन महात्माओं ने प्रति पुज्य अबरुवन प्रित्या रसन ता पुर्वक प्रसनता पूरवाक मतलब सादो सादो इसे कहे कर। जैसे नारद मुन ने कैसे प्रसनाता परुक उत्तर दिया वसुदेव जी को?
ए नारद मैं तो धन्य हो गया। इवान सम्मेग विलासिता तो यहाँ यह आपका प्रशन तो बहुत ही सुन्दर है। सम्बियक विवासिता,
जीवन में निष्चे जो होना चाहिए,
वो निष्चे आपकी बुद्धी में हो गया,
तभी आपने ये प्रशन किया,
तो मैं अत्यंत प्रसन हूँ। इस प्रकार नौ योगेश्वर भी अत्यंद प्रसंद हुए और उन्होंने सादु सादु कहते हुए बहुत अच्छा बहुत अच्छा हम आपको सुनाएंगे ये भावत धर्म के बारे में अवश्या आपको हुँ بنائیں گے اس کا بریش کریں گے उन महात्माओंने ब्रसनता पुर्वा का सादु सादु कहते हुए सबासद और रुत्वि जो सहीत सदस्यर्त जंग तास आजा स्टार्ट जाम,
रुट जाम और सदसी सदस्य सबा में जो भी आते हैं तो सबा सदो के मिच में सबा सदो के साथ और रुत्मि जो के सही तर सबासद और जो भी ब्रामन्त यगन में आये हुए सब रुत्वी जो के सहीत हैं। राजा निमी से इस प्रकार कहा,
तो नौ योगेश्वरों ने मात्र राजा निमी को ही उपदेश किया इसा नहीं है। उत्तर दिया ऐसा नहीं है। उन्होंने सभी को घ्ण्यान प्राप्तु करें। वहाँ जो भी उपस्तित थे,
ब्रामन भी थे,
रुस्वित थे,
सपासत थे,
तो उन सब को ध्यान में रखते हुए उपस्तित थे। अब योगेशोरों ने ऐसे उत्तर दिया कि अच्छा,
बहुत अच्छा,
मैं आपको आग्वत धर्म बनाओंगा। अभी जो पहले योगी थे कवी नाम के उन से वो सुमवाच चुरूबोगा हम कल देखेंगे ओम् पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमदच्चते पूर्णस्यपूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ओम शानते शानते शानते अरिही ओं श्री गुरुब्यो नमः अरिही ओं