करवाव है तेजस्विनावधीतमस्तुमावित्विशावहेई॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥ पेशान,
पेशान,
पेशान करारविंदेन पदारविंदं उकारविसे विनिवेशयन। पतस्य पत्रस्य पुटेशयानम् बालं मुक्वन्सं मनसास्मरा सूर्ष्ण गोविन्द हरे मुरारे नात नारायण पासु देव जिख्वे पिबस्वामृतमेत देव कुविन्द दामोदल मादवे कुछन राधा वर्गो कुलेश बहुत बहुत वर्दन नाथ विश्णू जिख्वे पिबस्वा मृतमेत देव विन्त दामोदर माधवेते कुविन्द दामोदर मातवे प्रिमन्द बावर एकादश सकन्द दूसरा अध्याय लोगों के देवजी ने परिक्षित राजा को कहा हे कुरु कुल नंदन भगवान कृष्ण के पुजाओ से सुरक्षित जौरकापुरी में देवर श्री नारद श्री कुष्ण उपासना की लाल सासे प्रायर सदाही रहा करते थे। किसको ऐसा पसंद नहीं होगा?
पानेजा मनुश्य इस लोग में त्रिलोक में ऐसा इंद्रियवान मनुष्या। देवताओं को भी इंद्रिया है,
मनुष्यों को भी इंद्रिया है,
सब इंद्रियवान है। तो ऐसा कौन होगा?
इंद्रियवान,
गुद्दिमान?
कि जिनको श्री कृष्ण कहते हैं। चरन कमल का आश्रे पसंद ना हो। ऐसा कौन होगा?
कोई नहीं हो सकता है,
तो बगवान के चरणों के उपासक नारत जी है.
तं एकदातु देवर्शी,
देवर्शी मसुदेवह गृहागतं अर्चित्तं सुकमासीनं अभिवाध्या इधं अब्रवीत। तो शुकदेव जी परिक्षित राजा को कह रहे है की एक एक दिन ये देवर श्री वसुदेव जी के घर पदारे उनका आगमन हुआ वसुदेव जी के घर में तो घर में पदारे हुए महरशी के साथ उचित व्यवार करके उनका स्वागता दे करके उनकी पूजा आर्चना और उनके अभिवादन करके जब वो प्रसन होए तब इवर्शी को प्रणाम करें। करके कहने लगे पासो देवजी तो वसुदेव वाच्च वहाँ से इस उमर्छ चुरूप है। भगवान हवतो यात्रा सस्ताये सर्वधेहेना हे बगवान हे महरश्री हे नारजी मैंने ऐसा सुना है कि भवत अह यात्रा आपका प्रवास आपकी यात्रा हमेशा इस जगत में सबी जीवों के कल्याण के लिए है। तस्ते सर्वधे हिना सर्वते ही जिवात्मा जूंग कितने भी है उनके कल्यान के लिए आपकी आत्रा हमेशा हुआ करती हैं। लैसे कि कृपनानाम् यता पित्रो हो। उत्तमशलोक वर्तमना पुत्रों के लिए पिता माता के और दिन दुख्यों के लिए भगवत पराण महात्माओं का आगमन जैसे सुकदाई होता है। इस प्रकार एन आर्थनारत जी आपकी यात्रा भी सभी सर्वत दुख्यों के लिए। देखवान लोगों को,
सर्वा देखवान लोगों को प्रदार करने वाली सर्वदेहिना बृतानां देवचरितं फिर वसिष्ट जनय विशिष्ट जनय महात्मों का सागवों का महतमिल हमें समझाया कि देवी देवताओ देवतारोग भी महान है। साधु भी महान है सजजन भी महान है लेकिन साधु और तो आगुमाने सकंत पुरुष उठ चाहें वाले गुर्वास्ति हो पर पवित्र रदै जिनका है उनको सादु कहते हैं। पवित्र चरित्र जिनका है,
पवित्र रदै जिनका है,
शुद्ध बुद्धी है,
शुद्ध जित्वाले हैं। इनको साधो कहते हैं तो ऐसे सादू नाम चरित्र उनका क्या प्रभाव है?
ने उताव भी विशेश है देवता भी मनुष्यसे आगे बढ़कार एक पोटी है। लेकिन देवुताओं में और ऐसे सादु पुरुषों में क्या भ्येद है?
बृतानां देवचरितं लुखाया जा सुखाया जा तो देवताओं का आगमन अत देवताओं का प्रगट करना तो देवताओं की कृपा जीवों के उपर अवश्य होती है मनुष्यों के उपर लेकिन जब दुख देने का प्रसंग आता है तो भी वही माध्यम बनते हैं। तो हम कहने सकते हैं। देवता होमें हुमेशा सुक देगे कि नहीं देगे। हमारे भागे में हमारे कर्म का फल बुगतने का समय आता है। तो देवताओं के माध्यम से हमें ओ कर्मका फल प्राप्तो होता है। पून्का चरित रहाने उनका कर्म देवताओं का कर्म ऐसा ही रहता है कि जिसके जैसे जैसे कर्म है उस ही साब से उनको फल देना.
ता दुना चारी काम सादु ऐसे बंदन में नहीं है। वो किसी कानुन में फसे हुए नहीं है कानुन से बंदे हुए नहीं है तो वो तो जहां विच्रण करते हैं। उनके पास में जो भी है कोई जुजन तो है मनुश्यादिये,
कोई पी प्राणी उनके आसपास हो। तो हमेशा सादू उनके हित को ही चाहता है। उनके हित में हो ऐसा ही उनका आचरण बहता है। इसलिए सादु संत जनों से हमेशा हमें जीवन में सुख के प्राप्ति ही होती है भगवत प्रान सादु पुरुषों के आच्रण उनके सुक के ही हेतु होते हैं। या ने महरशी नारत जी सादु पुरुषे संते मुनी है,
रशी मुनी है,
देवर शी भी है। तो उनका आगमन,
वसुदेव जी कह रहे है,
आपका आगमन,
मेरे घर में आपका पदारना,
वो अवश्यही मेरा कल्यां करने वाला ही है। वसुदेव जी विस्तार से कहते हैं देवर शिनारत तो जानते ही होगे लेकिन हो हमारे लिए हमें उपदेश दे रहे हैं हमें ये समझा रहे हैं कि देखिए समसार में देवता लोग के मरियादा क्या है?
बजंती ये यता देवा दिवहाबित देवतां देवता भी अमारे व्यावार से बंद जाते उनका भी कोई मर्यादा है। वो भी हमारा इतना कल्यान कर सकता है। इतना हम उनको प्रसन न करते हैं। प्रसन्न हुवे देवता ए अर्जुन आपको तुष्ट करेंगे। परस्परंबावेंतः आप देवताओं को प्रसंदन करो और देवता लोग आपके उपर कृपा करें। आपको प्रसंदन करें। तो मर्यादा है,
शरती भी है कि हम उनको प्रसंद करें और वो हमको संतुष्ट करें। हम तो कुछ नहीं करते हैं उनको प्रसंद करने के लिए फिर भी उनकी कृपा से ही अमारा वेवार चलता है। अमारी ज्ञान इंद्रिया अच्छी तरह से अगर काम करती हैं,
तो सभी जो इंद्रियों के अवेवों के अधिष्ठाता देवता हैं,
उनकी कृपा से ही अमारा वेवार चलता रहता है। तो हमारे कर्तवे बनता है कि उन देवताओं को भी हम समतुष्ट करें। पर यहाँ कहा गया कि देवाः पी तथेवतान बजनती देवता लोग भी हमारे उपर इतनी कृपा करते हैं जितना हम उनके लिए भाव रखते हैं वजन्ति ये यता देवान देवाहापि तसेवतां। चायाइव कर्मसचिवाह जैसे हमारी चाया हम जैसे हैं इस इसाफ से हमारी चाया होगी खेड़ो तो देवतां भी हमारे जैसे कर्म हैं। उसके हिसाफ से हमें कर्मपल देगे। कर्मसच्चिवाहा। वो तो कर्म के नीयम के अंतरगत है। वो स्वतांक्र नहीं है। साधवः धीन अवच्छलाः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। दीन जन मतलब सभी प्राणी,
पशु,
पक्षी सबके परती उनके दिल में दया होती है। जिनका रदय ऐसे उदार है। उदार चरिता नाम। जिनका रदे विशाल है,
उदार है,
पवित्र है,
शुद्ध है और भगवत परार है। ऐसे जादू कोई भी मनुष्य उनके संपर्क में आता है,
कोई भी जीव जन्तों उनके संपर्क में आते हैं। तो उनका बला ही वो करते हैं। बला चाहते हैं बला करते भी हैं। सब के हीत की ही सोचते हैं। उनका ये नीम रहता है,
सादुवों का.
इसलिए वसुदर्जी कहते सादवह भीनवचसलाह पार्डू हुमेशा नरे बोकें प्रते सबी जियों के परती दया रखने वाले होते हैं। रम्मन्स्ततापिपृच्छामः धर्मान्भागवतांस्तव या जान्शुरुप्तवाशरद्धयामर्त्यः मुच्यते विश्वतो ब्रह्मयात्रिः। विश्वतो भयात तो वसिष्ट न वसुदेव जी उनको पता है कि जब रुशी मनी हमारे घर पर पदाते हैं तो हमें उनकी सिवार्चना तो करनी चाहिए,
लेकिन उनसे क्या प्राप्त करें?
उत्तम से उत्तम जो चीज हमारे जीवन में है हमारा बहला करने वाले हैं उस विशा में हम उन्हें प्राक्ना करें। इतना विवेक वसंदेव जी के अंदर है। इसे लेवा सुधेव जी नारातमुनी को कह रहे हैं ए ब्रह्मन। यद दबी ततापी मतलब आगे कह दिया वसुदेव जी ने की हे देवरशी आपका पदारना मेरे लिए कल्याणू कारी ही है मैं बोल विट्र हो गया हूँ फिर भी तन तापी ये सब अध्याहार हैं हमें प्राप्त हुए आगे जो बात हुई दोनों के बीच में तो वसलदेव जीने सपष्टे रूप से कह दिया की आपका आगन आगमन से अपके आगमन से मेरा बला ही होने वाला है मैं मैं कृतार थो होई गया हूँ। तो तत्थापी का मतलब ये हुआ भी यहाँ ये शलोक में ऐसा कहते नहीं रिपिट नहीं करते लेकिन आगे कह दिया कि मैं आपके आगमन से प्रुतात्र वाहू ततापी ततापी पुरुच्चा महा। फिर भी हम आप से पूछ रहे हैं। तवा पुरुच्चा महा आपको हम पूछ रहे हैं। किसके वारे में पूछ रहे हैं?
भागवतां धर्माँ एब्रम्मन् भागवतान् धर्मान् तवपृच्चामहा। आपको मैं भागवत के धर्म के बारे में प्रश्ण कर रहा हूँ। भागवत धर्म किसको कहते हैं?
ये मेरा प्रश्ना है। याँ चुट्वा मर्त्यह मुच्चते विश्वतह भयात। यान शर्दया शर्दवा जिन पोल भागवत धर्मको जिन भागवत धर्मको श्रद्धा से उनका श्रवन करके। विश्वतः भयात मुच्चते विश्वता हो मतलब सर्वता हो तारो और से जो बंदन है और चारों और से जिस प्रकार का बय है आध्यात्मिक बय आधी देवी का और आधी बोधी का। इस प्रकार के जितने भाय समसार में हैं। उस सर्वप्रकार के भय से जिनों ने भागवत धर्म को जान लिया,
उनका स्रवन किया। ऐसे मर्त जीव अमेशा उस बय से मुक्ति प्राप्त करते हैं,
मुक्त हो जाते हैं। उनके जीवन में फिर किसी भी प्रकार का बई नहीं रहता है। अहम् किलपुरानन्तम् प्रजार्थे बोय मुक्तिदम् आपु जयन्नन मोक्षाय मोहितो देव मायया अहम किलब पुरा अनंतं मुख ते दम आप उज़ायाँ इल्ला आपको जेन मैंने भी एक बार पूजा की थे। प्रात्रा कीति बुरा,
बुरा माने बहुत समय पहले भगवान के ओब,
भगवान को प्रार्चना करेती,
भगवान का भजन किया था,
भगवान के उपासणा कीती। अनन्तं अपुजयं अनन्त सुरु बर्मात्मा कि पूजा हमने की थी। लेकिन किस के बारे में हमारी कामणा थी?
क्या कामणा थी?
किस कामणा के वश्व?
हमने बगवाण की उपासना कीते हैं कैसे भगवाण बुक्तिदं अनन्दं जिमका स्वरुप अनन्त है और जो बुक्ति देने वाले है। विश्णो सहसर नाम के अंदर भुगवान के नाम है सब अनन्त भगवाण का नामे विश्णु भगवाण का उप्तिदः वो भी बगवान का नाम है आत्मदः वो भी बगवान का नाम है मतलब वसिष्ट जी को अभी लग रहा है मेरे जीवन में कुछ बाकी है भगवान श्मीखरिष्ण के पिता है वसीष्ट जी याद रखे वो इसमालने व्यक्ति तो है नहीं किते जन्मो जन्मो के तपशर्या के बाद भगवान के माता पिता मने उनके घर भगवान ने प्रहान किया। देवकी जी के गर्म में भगवान प्रगट हुए। स्तान लिया भगवान ने। वसुदेव जी के घर में भगवान प्रगट हुए। तो वो तो किते जन्मों की तपश्चर्या थी तबी भगवान ऐसे संतान के रुप में प्राप्त होता है। तो जो बगता के जो भी कामना है,
भगवान हमेशा पूर्ण करते हैं। वसुदेव देव की जी का होती सराजनमता तैसे वो अनाधी काल से भगवान की तपश्चर्या करते आये था। एक ही प्राक्ता थी। कि भगवान हमें संतान के रूपे प्राप्त हो। यही लाल साती होती है इन तो बखते की पराकाश्टा होगे। ऐसे है वसु देवती इनके पुत्र साक्षात परिश्न है। अनन्त सुरुप परमात्मा है मुक्ति देखना जाये तो बसुदेव जी यहाँ कबूल कर रहे हैं कि यह नारंद मनी है आप उज़ेयें मैंने बरुवान की पुजा की और ये भगवान कैसे है?
अगर मैं उनसे ये प्रार्चना करता कि भगवान मुझे मुक्ति देजिये तो वो मुझे मुक्ता कर देते। मैं अगर ऐसी प्रार्थना करता कि भगवान मुझे आपका स्वर्प के दर्शन कराईए। मतलब आत्मसाक्षात करकराएए आपका मुझे जो आपका जो स्वरूप है उसका घ्न्यां देजिये। तो भुगवान वो देते। बगवान सब कुछ देने वाल है। लेकिन मैंने इसके लिए प्रार्थना की। प्रजार थे रजा आरतें पूजेया न अपूजयन। मैंने प्रजा के लिए,
संतति के लिए भगवान की आराजना की थी। यो मोही तहा देव माया में बोही तथा ने उमा आसे मुझे और कुछ सूजता ही नहीं था। मैं मेरे मन में एक ही चाती कैसे ही हमारे गर में भगवान प्रगट हो। और संतान के रूप में मुझे परमात्मा मिले। ये सब भगवान की माया हैं हमें लगता है यही सब कुछ है कितने बागय शाली है ऐसा बागय कि जहां भगवान खुद जन्मलेते हैं लेकिन वसिष्टर जी कहते है नारग मनी को कि मैंने कुछ गलत किया मैंने कुछ गवाया I missed something.
ये भवान तो सब कुछ देने वाले है,
तो मैंने के लिए क्यों प्रार्थना नहीं के?
मतलब मोक्ष के लिए?
तो प्राक्त नानें नाकें। नामोकशाया प्रजार्ते अपुजेन न मोक्षायः। मोक्ष के लिए मैंने भगवान की भक्ती नहीं की। भगवान की उपासिना नहीं के और प्रजाकी इच्छाती और भगवान खुद मेरे यहां प्रजाक बने मेरे संतान बने ऐसे मेरी द्रण इच्छा थी और उसका कारण एक ही है माया। तुम देवो माया। अग्रियांसे अगर्यान के वाश बोगीता हाँ मैं मोहित था,
मोहित होकर.
वही था अहम्!
पुरा अनन्तम् प्रजार्थे अपुजयन् हूई मुक्ति दाहू हुवी इस प्रतिपर मनुशे का जन्मा मोक्ष की प्राप्ति के लिए ही है। लेकिन उसके लिए प्राँचना ना करके मैंने ऐसी प्राँचना की। संतां की इच्छा से उसका करने की ता मेरां बोहीतो हैं ने ओमाया ओहिता हाँ बहुत कुछ सिखना है वसिष्ट वसुदेव जी के पास अइसे वसुदेव जी अभी दुखी है जैसे नारत मुनी इतनी बड़ी सिद्धिया प्राप्त करने के बाद भी वो कहते हैं अहम् शोचामी सोहम् नारदः शोचामी ऐसा मैं नारद दुखे हूँ। वसिस्ट जी,
वसदेव जी ऐसा ही कह रहे हैं कि मैं भगवान का पीता हूं फिर भी। ऐसा मैं दुखी हूँ,
क्यों?
क्योंकि मैंने मोक्ष के लिए प्रात्ना नहीं की। इसका मतलब है वो अभी वी बंदन का अनुबव कर रहे हैं,
समसार का अनुबव कर रहे हैं। कितना मुश्किल है मुक्ष के भावना मोक्ष के इच्छा और मोक्ष के लिए प्रार्तना करना किसी के भाग्यों में,
बहुत कम लोगों के भाग्यों में हैं। वनुश्याराम सहसरेशो कश्चे द्यतति सिद्धे। इतने जन्मों के बाद अनुश्य के रदै में अद्वैत की वासना प्रघट होती है। अद्वैत को जानने के इच्छा प्रगटो। बुट्टे की प्रार्थना जीव के रदे में जब प्रगट होती है तो कई-कई जन्मों के पुन्य कर्मा के फल के रुप हैं। मैंसे मनुश्य के जीवन में ऐसी प्रातना प्रगट नहीं होती। हम बोलतो देते हैं असतो मा सत्गमय तमसो मा जोतिर गमय पृत्योर मा अमृतम गमय ऐसी प्राचना बोलते रहते लेकिन जब भगवान हमें मोक्ष देने के लिए अगर सामने आ जाते हैं। उनकी जो भी रीत है गुरु के रूप में आते हैं उपदेश्टा के रूप में आते हैं तो हम तयार नहीं है हम सचसंग के लिए हम तयार नहीं है,
हमें बहुत काम है हमारे से.
इसका मतलब है हमारी इच्छा मोक्ष की इच्छा तो नहीं है क्या करें अब कुछ का नहीं करना है इसलिए विद्धावस्ता में थोड़ा बहुत समय है,
साम बिता सके। लोग ऐसा सच्चंग करते हैं। लेकिन उनका जो प्रैम है उनका काकरशन के आसकती तो अपने परिवार में ही है। तो ये कोई मोक्षा तो नहीं होई और मनुष्य का जन्म केवल मुक्ष के लिए है। तो कोई-कोई ऐसे लोग हैं जिन करे भाग्य में मौक्ष के प्राप्ति है। तो उनके रदे में ऐसी इचा होती है। अरवो हरे वदेशे भिगवाण को ऐसे प्रातना करते हैं। उरुवारु कमयों बंधना प्रतियोर मुखशिया माम रतात,
असी प्राजना किसी किसी के रदे में होती है। ये सब हमें सीखना है कि अभी हम कितने अग्ञान के प्रभाव में हैं,
कितना मो हमारे जीवन में हैं। जब भसुदेव जी के जीवन में ऐसा मोह है तो हमारे पाती मत पूछो मत पूछो। मैंने देव माया से मोहित होकर अपने पुर्वजन्म में मुक्ति प्रदे भगवान का संतान के लिए ही पुजन किया था मोक्ष के लिए नहीं। इसका मतलब है वसुदेव जी बड़े दुखे है अंदर से ओ जंतित आसन तूष्ट है सन्तप्तर दैने उनका त्या करें कहां जाएं किसको पूछें उनारद जी पदा रहे है तो खुश हो गए स्लेनारंटिस्यो अपनी वेजना प्रकट कर रहे हैं कि मैंने ऐसा किया था। मौक्ष के लिए प्रार्थन नहीं कीते। यता विचित्र विसनाद भवत बिर विश्वतो बयाद। मुच्चे मह्यंज सेवाद्वाः तथानशाधि सूरत अत्ता हाँ?
इसु प्रता नहाशादी शादे शादे माम इश्यस्तेहं शादिमान्त्वां प्रपण्नम् कांप्रपण्नम अर्जुन बर्वान श्री कृष्णको के लिए एबगवान। अहम् स्वाम् प्रपण्नम् मैं आपकी शरण में आएओ। शादी माम् शादी माम् आप मेरी मेरा संचालन कीजिये। पहले जीवन रतको मैं आपके हाथ में सौंपता हूँ आप मेरे जीवन का संचालन कीजिए। मुझे मार्क दर्शन देजिये। मैं आपका शिष्य हो शादी माम ऐसा कहने से हम अपने आपको शिष्य प्रगट करते हैं। और जिनके समक्षम में कह रहे हैं उनको हम कह रहे हैं कि आप हमारे गुरु हैं। मैं शिष्य हूँ आपका ऐसा कहने से उसका अर्थ तो यही हुआ आप हमारे गुरु हैं। तो हे सुवरता सुवरता मतलब जिनके जीवन में हमेशा अच्छे अच्छे वरत रहा करते हैं। अच्छे अच्छे वरतों का पालन करना जिनका सुबार। तो नारद बुनी का तो एक वरत है। से कृष्णा के पास पास में ही रहना यही उनके मन में हमेशा लालसा रहती है। उनके चरणों में रहू उनको छोड़कर कहीं नहीं जाओ। उसी लाल साह में तो वो द्वार कामे रहते थे,
द्वारी कामे रहते थे। तो भगवाण का स्वाणि देवर। इसी भी रूप में हो वो चाहते थे,
ये वरत हो गया जीवन का। श्रेष्ट भरत हो गया। इसलिए वसिष्ट जी नारत मुणी को करते हैं। इस नाम से संबोधन करते हैं। आप हमारा संचालन कीजे हमें मार्ग्रशन दीजे विचेत्रा व्यसेनाट भवत बिहें विश्वतः बयार। मुझे बाद हमें मुक्ति दिजिये। संज सेवा द्वा इ.
अ.
न.
में अंजसा एवा अद्धा ऐसा उपदेश देजी विकेट रवेसना ववद बिही विश्वतः भयात्मुच्येवा। इस सर्वप्रकार से भय से हम मुक्ति प्राप्त करें,
मुक्त हो जाएं। विशो तहां बयार मुच्चेवा सर्वप्रकार की चिन्ता,
सर्वप्रकार के बय,
सर्वप्रकार के दुख से हम मुक्ति प्राप्त करें। ऐसा कुछ किजिए। विचित्र वे सनाथ पुछी त्रवेसना नाना प्रकार के दुखो से और व्यसन इचित्र व्यसनात तो अपनी जो वासनाई है उनसे हम मुक्ति प्राप्त करें। तब परकार के भय से हम मुक्ति प्राप्त करें,
बंदन से हम मुक्ति प्राप्त करें,
शोक से,
दुख से,
संताप से हम मुक्ति प्राप्त करें। तुननें तो मुक्ति प्राप्त करें। अनाया सीहं मुक्तो हो जाये अन्जसाई वादवा अयानास सरलता से हम मुक्ति प्राप्त करें ऐसा उपदेश हमें दीजिये असी वसिष्ट जीने अरे वसंदेव जीने श्री नारत मुनी से प्राज़ना की। इतने उत्तम ब्रातना है जिनके पासे जो मांगना चाहिए,
मांगना चाहिए। तब कुछ मिलेगा भगवान के पास जिसकी भी प्रातना करोगे मिलेगा वसुदर्जी यहाँ प्रिकार कर रहे हैं अपनी गलती का मुक्ति के लिए प्रात्ना करता तो मुझे मुक्ति मिल जाते लेकिन मोहवश मैंने मुक्ति के लिए प्रात्ना नहीं के। इसका मतलब है हमारे जीवन में भले इतनी बड़ी उपासना ना हो। मारे जीवन में इतने बड़े-बड़े पुण्य कर्मना हो। औरे हमने ऐसा कुछ ना किया हो। ऐसे कोई बड़ी पद्वी प्राप्त ना करी हो,
कोई ऐसे सिद्धी प्राप्त ना करी हो,
जैसे नाराज मुन्ने न कीती। या भगवान के इतने बड़े भगता भी हम ना बने न बन पाए। नाहमित्ति तपश्चर्या कर सकते हो वरत कर सकते हो ऐसे नियमों का पालन बलेयं ना कर सकते हो। लेकिन अमारी प्रासना क्या होनी चाहिए। ये सिखाते हैं। मनुष्य जीवन में क्या क्या प्राप्त कर सकता है?
कहां तक कि सिद्धी मनुष्य प्राप्त कर सकता है?
तो एक हमें एक चांस मिला है बाद में मनुष्य का जर्म मिलेगा के नहीं पता नहीं है। जैसे एक अन्दे व्यक्तिको कोई कमरे में बंद कर दिया था वो बिचारा फस गया था। पनीक या गया ताओ फसगाद बहुत कोशिश करने पर भी वो बाहर नहीं इकला रहा था। तो उसने किसी से पूछा कि मुझे यहां से बाहर निकलना है,
तो क्या हुपा है?
द्वार कहा है इस मकान का अब अन्दे को कैसे समझाया जाए?
पिर भी उनको बताया गया कि देखो तुम एक हाथ से दिवार का सहारा लेकर चलते रहो। दहां दिवार नहीं आएगी,
उसका मतलब उधर द्वार है,
उधर से निकल जाओ.
तरालूप देशते हैं बात समझ में आ गई। वो तो दिवार का सहार लेकर एक हाथ से दिवा का सहार लेकर वो चलता था। लेकिन जब द्वार आया तभी उसका हाथ इसको कुछ खुजली आ रही थी बीचारे के लिए हो,
उसका हाथ उदर चला गया और तो तो आप अपने बाद नहीं चाहते हैं। प्रमेश द्वार्ता वो निकल गया फिर से दिवार आ गए। ऐसे ये मनुष्य जन्म मोक्ष का द्वार है मनुष्यत विवन मानुशे के उपाड़ी अगर मनुष्या ये जान ले तो अपने मनुष्य जन्म का उप्योग वो अपने खुद के मुक्ति के लिए कर सकता है। प्रातिना तो करें कम से कम सईदा दैसे रण संकल्प करे,
प्रार्थना करे भगवान से। प्रातना योगिता के लिए प्रात्ना करें,
कि भगवान मेरे मन में ऐसी प्रात्ना हो,
ऐसा कीजिए। मुझे मौक्स चाहिए मोक्ष के सिवार कुछ नहीं चाहिए उसके लिए हमें मार्क दर्शन दिजिये। असतोमा सद्गमयः। तमसो मा जोतिर गमया,
मृत्योर मा अमृतं गमया ये प्रार्थना के फल के रूप में मनुष्य जीवन मिला है। वो ही जन्म में की होगी है ऐसी प्रातना मुझे मौक्ष चाहिए,
मुझे और कुछ नहीं चाहिए। तो इसलिए मनुष्य का जन्म मिला लेकिन हम बूल गये। फिर ओही अपने दंदे में लग गए। मैं इस अमसार के चक्र में फ़स गए। अर्मण शेका मनुष्य वादिका,
मनुष्य देखा कैसे लाब उठाना चाहिए वो हम नहीं कर लगा अपने मुद्धी को अपने मन कौम तयाब नहीं कर रहे हैं। अपने स्वरुप को जानने के लिए जो करना चाहिए। अगर वो कारिय नहीं किया,
तो ये मनुष्य का जीवन तो पूर्ण हो जाएगा,
फिर पता नहीं। कौन से कर्म हमें पकड़ेंगे कहां हम जन्मलेंगे हमन पता नहीं है ये सब हमें वसुदेव जी और नारद मनी के संवाध से ये सब सीख हमें प्राप्त होती है। पूरे शुको वाज़ राजन्नेवं कृतप्रश्नः वसुदेवेन धीमताः प्रीतस्तमाः प्रीतस्तमाः देवर्शिर्हरेहे तंस्मारितो गुणे प्रीति स्तमादे वर्षिर हरे हम स्मारितो गुने हैं। विराजन श्री शुकावाच शुकादेवजी कहते हैं राजन एवं पुरुतप्रश्नह देवर शिही वसो देवेन दीमता गुत प्रश्नह प्रीतः वसुदेव जी कैसे प्रश्न से?
धीमता वसुदेवेन अत्यंत मुद्दिमान वसुदेव। हम कैसे है?
वो हमारे वचन से हमारे वेवार से तब प्रगट होता है। मारे मन में क्या है,
हम किस चीज की आकांप्शा रखते हैं कैसे चाओ को हम उन्हों करते रहते हैं। इस काम में लगे हैं?
किस प्रावर्ति में लगे हैं?
उस से हमारा व्यक्ति तो प्रगट होता है। सामन्य करके सभी मनुष्य का व्यक्ति तो एक जैसा ही है। किसी का तामसीक है,
किसी का राजसीक है,
किसी का सात्रीक है पवित्रागदे कोई-कोई ही होते हैं। और दिमान पवितर रदय होई दिवान होगा जिनका भी समसार में रस नहीं है संसार के प्रति वेराज्य प्रगट हुआ है और भगवान के प्रति प्रैम प्रगट हुआ। दो चीज़ जिनके रदे में है। उसको दीमान कहते हैं तो वसलदेव जी दीमान है बग्वान इतना तो करेंगे ही न,
बग्वान ने उनके घर में जब जनम लिया हो। भगवान के पुत्र बने,
भगवान ऐसी योजना तो करेंगे,
इसलिए भगवान ने ही नार्वनमनी को बेजा यहाँ। जाओ हमारे पिताजी के पास जाकर आप कुछ उदेश उपदेश दिजिए। उनका भी मोक्ष होना चाहिए तो वसु देवजिबी पवित्र नदे वालेते भले उनोने प्रजा के लिए भगवान का पूजन घिया,
भगवान को प्राचना की,
लेकिन अभी तो समझ गया न?
इस जन्म में तो समझ गए,
कि ये मेरी गलती है। माया वश्यात मैंने ऐसे सब किया है मुझे तो मुक्ति दह फर्मात्मा से मुक्ति ही वांगने चाहिए थे। मोक्ष के लिए ही प्राँचना करने चाहिए थी। तो ऐसे धीमान धीमता तुर्त्या एकवचाने तुर्त्या विवक्तिये दी मता अविशेशाने वसुदेवजिका वसुदेवेन वो भी तृत्यायको चेन वसुदेवेन धीमता धीमता वसुदेवेन तो जो बुद्धिमान वसुदेव जी है उनके द्वारा ये गये प्रश्णसे कृत प्रश्ण हा?
कुर्तप्रश्न ओ एड्जेक्टिव है किसका?
देवरशीका,
जानतमणीका। देवरशी जीनो ने वसुदेव जीने प्रश्न करिया था ऐसे देवर्शी।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। प्रेता फिर ता प्रसन न हो गए। अभी कोई सादु है,
कोई गुरु है कोई विद्वान है अगर वो जहां जाते है जिनके पास जाते है तो उनका लाब हमें लेना चाहिए और उनके पास जाके हमें अपनी संसारिक चर्चाई नहीं करके सामसारी प्रश्नो उसके लिए पुरुच्चा नहीं करके हमें हमारी जो हमारी जो मूल इच्छा है और हमारा कल्यांजिसम है। इस प्रकार के प्रेशन सादुगों के पास,
संतों के पास,
विद्वानों के पास जाकर करना चाहिए। उनके प्रेतिया उस मैं है। वो बले कुछ बोले नहीं,
एकिन ऐसे कोई प्रश्न करवो करने वाले मिल जाते हैं,
तो उनको बड़ा आनन्द होता है। बड़े प्रसन होते हैं। ये व्यक्ति के लिए मन में ऐसी इच्छा है। ऐसे प्रश्ना करना वाले नहीं होते हैं हम कितनी बार पूछते हैं कि भी आप प्रश्ना करों हम अपने सास्थं करेंगे लेकिन कोई प्रश्ना पूछता ही नहीं किसी के मन में प्रश्ना है ही नहीं मन में प्रशन ही प्रशन है। जीवन में प्रशन ही प्रशन है। लेकिन इस वीशे में ब्रेशना नहीं आ रहे हैं। कभी चिंतन नहीं करते हैं तो प्रश्ना कैसे आएंगे?
या तो आपने नाध्यन किया है कि सभी प्रशनों के उप्तर मिल गया। ऐसा तो है नहीं कुछ। किसी किसी के पास होगा ऐसा। बाकि सब तो अपने संसार में निमगन है। ऐसा प्रश्णें नहीं उड़ते हैं। अश्चरी। अध्यात्मी कुन्नती में तो प्रशन ही प्रशन होने चाहिए। और प्रशन देने वाले भी उत्तर देने वाले लोग भी हैं। मैंके नहीं वार अन्धा प्रश्ना उड़ता है इन लिए सादु लोगों के पास कोई जाता है तो सादु को इतनी प्रसनता नहीं होती होगी। जब ऐसे सादक आते हैं,
मुक्ष आते हैं। या तो सेवा भावी कोई लोग आते हैं,
सेवा करने वाले कोई आते हैं,
तब उनका चित्त प्रसन होता है। पहुत मुश्किल से ऐसे लोग दिखते हैं,
सिवा करने वारे लोग। विवा करने का मोका मिलता है तो भाग जाते हैं। मुझे परकता है कि हमें कुछ करना पड़ेगा जहां से बागो इसे के लिए मसना देवजीत हो आन व्यक्ति है और देवरशी नारद मुने को इतना बड़िया प्रश्ना उन्होंने पुछा तो वो प्रशन सुनकर देवरशे जी अध्यांता संतूष्ट हो गया,
प्रसन हो गया। प्रितः देवरशिही तो आहाँ। एक और विशेशन है वंस्मारितः हरेहे गुणईही संस्मारितह देवर्शीही। प्रीता हाँ यो प्रसन नोगे देवरशी इसके बारे में प्रश्नत आये। मुक्ति के बारे में,
मोक्ष के बारे में तो प्रश्नता बराबर है,
लेकिन मोक्ष अस्वरुप क्या है?
वोक्ष कैसे मिलता है?
ये तो भागवत है न,
भागवत धर्म तो धर्म जो है भागवत धर्म मतलब भगवान का धर्म आगो बज़ता है भगवत गीता भगवता गीता मगवान ने गाईवी गिता ऐसे भागवत धर्म,
भगवान का धर्म इस विशे में प्रश्न हुआ प्रमाज्मा के विशे में प्रश्न हुआ। और देवरशी को तो सबसे प्रिया परमात्मा ही है,
भगवान शी कृष्न ही है। और भगवान के गुण उनको पता ही है। हमेशा उनके गुलगान करते रहते हैं। संस्मारितः वसिष्ट वसुदेव जी के प्रश्ना ने नारत जी को भगवान के सब गुणों की याद दिलाई। वस्मारी तहां सारत जी के रदै में सब गुल प्रगट हो गए। श्रीकर श्मके,
बगवानके,
परमातमाके। कैसे कैसे गरले तो जब हम भगवान की बात करते हैं,
ये भागवत कथाय,
राम चरित माना से,
उसमें ये कथाय कही जाती है,
शिवपुराण हो.
उनका चारित्रियों,
उनका थाओ इस सब का सच्चन करने का यही एक प्रयोजन है। कि हमारे जितमें एसे भी बरलांके गुलोग का सब्बाराण हो। हमारी वानी फिट भगवान के गुणों बगवान के गुणों का कथन हो,
सुत्य हो। ये सब जब हम करते हैं तो हमारी वानी पवित्र होती है। मन पवित्र होता है बुद्धी पवित्र होती है। घर मैं क्या करना चलू?
काम करते समय,
सोते समय,
उठते समय तो करूँछा आना निले नि जेपी नामानि विश्णो प्रवधंति मर्त्याः बेलिश्चितं प्रजन्ती अल्मायतां प्रजनते होई बुर्वान को ही प्राप्त करते हैं। उखम शेया ना आराम से सोते सोते लेटे लेटे उड़ते हैं,
बैठते हैं,
चोटे-मोटे करम करते हुए इनके रदे में भगवान के प्रते ही ऐसा बाल हो। ऐसे लोग दीरे दीरे मुक्त हो जाते हैं तो ये तो कथा है। और नारत जी को तो यही कारिया पसंद है। अपने प्रियहरी का गुणगार करना बहुत प्रसंद नहों गयो। संस्मारिता गुणे ही अरेहे गुणे ही संस्मारिता। उनके मन में भगवान के सब गुण आजा हो गए। तम आहाँ ऐसे प्रसन होकर नारत जी ने उनको कहा वसिष्ट वसंदेव जी को कहा दिमान वसुदेव जी के इस प्रकार प्रश्न करने पर भगवान के गुणों से उनका स्मरण कराये। वे देवर शिनारत जी प्रसन न होकर उनसे बोले। अभी नारंजी का सवाद है। नारद वाट तम्यगे तद्व्यवसितम् भवतासात्वतर्शब यत्वच्छसे भगवतान्धरमान् तम् विश्वभावनान् सम्यग एतत् व्यवसितं भवता। साथ वर्षब ताक तो तरशबा यत्पुरुच्चसे भागवतां धर्मान्तुम् विश्वभावनां। हमेशा जो वदेश्टा है गुरुजिये। उनका कारिय यही बनता है। इमो मुखशो ता तो अपने पास अपनी शरर में आए हुए। भक्त,
सादक जप वैसी उनकी प्रुच्चा,
उनकी प्रश्ना ऐसे होते हैं उनकी जिगन्यासा होती है अध्यात्मा के बारे में,
परमात्मा के बारे में उनके प्रशंसा की जायते हैं। वो भक्तक ही प्रसंसा करनी चाहिए। जैसे विवेख चुडा मनी हैं। शंकराचारे जी हम जाते हैं कि जब दुखी मनुष्य गुरू के पास जाता है और समसार से मुक्ति के लिए जब प्रार्थना करता है। तो शंकराचारे जी ऐसे शब्दो का प्रयोग करते हैं। गुरुजी उनको कहते हैं माबेश्य तुम बैबीत ना हो। तमारे दुख का उपाईल है। उम्हारा दुक का नाश होगा मुक्ति का उपाई है तुम समसार को तर जाओगे दन्योंसे,
कृतकृत्योंसे ऐसे शब्दाई शंक्राचारे जी तुम दन्या हो गए। कृत्य कृत्य हो गए। तुमने तुमारे कुल को ही तार दिया जब ऐसा प्रशन किया तो तुम्हारे कल्मकुल में ऐसा कही कोई नहीं रहेंगा जो मोक्ष प्राप्तना करें। मतलब तुम इतने उच्छ गुण वाले हो तो नाराग मुनी भी ऐसा कह रहे है। सम्यग एतत व्यवसितं भवता ताक तर शबा कात्रशब मतलब यदु श्रेष्ट यादव श्रेष्ट वसुत देव जी वसुत यदु कुलमे जन्मे हुएन साथ वर्षब यदु कुलमे श्रेष्ट यादव श्रेष्ट नारंजी केते हे यादो श्रिष्ट भवता सम्यत इतत विवसितम विवसितम अंतात निष्चे आपने जो निष्चे किया सम्मेग अर्टेल दे योगे आपके बुद्धी में ये जो निष्चे हुआ पंसा निष्टे मसुदेव जीने कहा की मैंने भवान की आरादना तो की। लेकिन कामनावश प्रजा की प्राप्ती के लिए संतान प्राप्ती के लिए मैंने भगवान की काम लगे। मोक्ष के लिए भगवान के आरादना नहीं करें। बगवाण से कभी मोक्ष के प्रात्रणा नहीं के,
अभी मैं आपको प्रार्थना करता हूं। ये जो निष्चे है वसुदेव जी का उनकी प्रसंसा कर रहे हैं कि आपकी बुद्धी में इस जनों में तो ऐसा निष्चे हुआ। मुझे मुख्ति चाहिए तरोपरकार से बाई से मैं कैसे मुखता हूँ ऐसा पुदेश दिजे ये जो प्राष्ट नहें नारत जी कहते हैं कि अच्छी तरह से सोचा गया प्रशन है। सम्मेख व्यावसिता यहाँ सिक्टम निष्चे किया गया। अवतावेवसितम आपने ये सही निष्चे किया। क्या यत्रुच्च से या पूछ रहे हैं क्या पूछ रहे हैं?
भागवतां धर्मान् विश्वभावनान भागवतान धर्मान। तो हमें यत्वुच्च से आप संसार को पवित्र करने वाले भावत धर्मों को पूछ रहे हैं। क्योंकि आपके माध्यम से बाकी मनुष्यों को यही उपदेश प्राप्त होगा। और मोक्ष का उपाई यही है भागवत धर्मा भागवत धर्म क्या करता है?
मनुष्य को पवित्र बनाते हैं। समसार को पवित्र करने वाले विश्व भावनान। सारे विश्व के लिए तो कल्यां कारिये। देखिये ये अकराण्जी महाराज एसे महान विद्वान संत जो भी है वो सब समझाते हैं कि हमारी संस्कृति में हमारे पास जो ग्रंत है ये मात्र है ये जो लिलाये प्रगट करते रहते हैं,
सिरियल बनाते हैं या कथा के रूप हैं वो तो अच्छी बात है उनके मर्यादा इतनी ही नहीं है। भागवत का उपदेश हो राम चरित का उदेश हो,
राम जी के कता हो,
कृष्ण बगवान के कता हो,
महा बारत में जो भी विश्ट गिया गया है ये सब मनुश्या के कल्यान के लिए हैं। और ये वैश्विक स्तार की जितने में समस्या है। उनका उत्तर यहां मिलता है। सभी समस्याओं का उखेल इसी ग्रंथ में है। वो हमारे पास है मारा देश में है विश्व का तो जब होगा होगा लेकिन हम अपना तो जीवन सफल करें,
हमारी समस्याओं को तो दूर करें। किसी के प्रकार,
किसी भी प्रकार की समस्या क्यों ना हो?
अपने शारीक स्तरपे,
मानसीक स्तरपे,
पारिवारीक स्तरपे कौटुम्बिक,
इसको कहते है वैश्विक सतर के,
सामाजिक सतर के जितने भी समस्या हो आर्थीको समाजीको प्रास्ट्रियो हो सभी प्रकार की समस्याओं का उत्तर हमारे ग्रंथ के अंदर है। वो मनुष्य का चरित्र बनाता है। चरित्र का घड़तर होता है। हमारे सॉंसकार बदलते हैं। क्योंकि हमारे अंदर जो पवित्रता है अमारा जो सत्य है वो तोड़ केंटे परंपवित्र है बुल्ले वाद दिप्य है अद्भूत है वो इसमैंसे उससं सकार का स्थानु नहीं है मिठ तमस राजस् ये सब तो अग्ञान के परिड़ाम से हैं। अगर नाम के पारी है हमने उसको प्रेम किया है अग्न्यान को इसलिए ऐसे हमारे संसकार है लेकिन हमारा सत्य तो नाओट गृष्चे वुर्दमूल दश्चाकं सारे विश्व का मोल तो वही है। उर्दुआ परमार्थ माई है। परमात्मा के जो गुण हैं वही हमारे गुण हैं। वो हमारा सत्य है। ये मात्र कृष्ण भगवान के गुण है,
ऐसा नहीं है। वो कृष्णे मगवान का सत्या भार हमारा दो सत्या वैंकि ये जानने के लिए कथा है,
हम कौन है?
अमरुतसे पुत्रहा रुष्यों मुरीयो के संतामयो यहां तक हम आगीरे हुए हैं,
इस स्थिति में हम हैं,
तो उसका कारण एक ही है.
गलत संस्कारों का अभ्यास और कभी भी अँने अपने जीवन में इस दिशा में कुछ काम नहीं किया। कस्तम् पोहं गुदायातः काते जननी को में ताता हैं कभी ऐसा सोचा नहीं है इस विशय में कर्म करते आरे,
करते आरे,
करते मैं और मेरा,
मैं और मेरा इस्त्रस्या प्राप्ति अनि इस्त्रस्या निवरुत्ति ये की हमारा प्रयोजने इसे हुमारी चाय पुरीगो अनुकुलता की प्राप्ति हो और प्रतिकलता को हम विदाय करें। दूर करें। इसके पीछे हमारा जीवन पूर्ण हो जाता है। ब्याती तो हो जाता है पूरा जुवन इस गहन बासतविक्ता में कभी हम आगे नहीं आते,
जानने के लिए बज़ गोविंदम बज़ गोविंदम गोविंदम बज़ मूडम नहीं नहीं रक्षदी लुक्रूम करने मेरा ये करतव है,
मेरे बच्चे को संवसकार देना है,
मेरे उसको ये करना है ये कुछ रक्षा नहीं करेगा इस तुम्हारा कलतव्य नहीं है। Ticket मिल जाएगी अब उपर पहुंच जाओगे गेमराजा को नहीं बोल सकते कि मेरा ये कर्तवे बाकी है। बगवान को समझो अपने आप को समझो कुछ उसके लिए समय निकालो अब बहुत हो गया कहां तक ये तमारा सुमसार चलेगा?
ओट गुसे उससे मैं आजाते शंकराचारी थी। बूडमती,
नहीं समझ रहा हूं,
इसलिए भी चारे संक्राचारे जीविन मोडमती शब्दः प्रयोग करते हैं और क्या करते हैं?
तो विश्वभावनान सबी जीवों का कल्यान हो। ऐसा वाई भगवान के जर्म तान,
भागोय तान,
गर्मान,
तों,
पुरुच्यसे तो हें वसुदेव जी आप तो ऐसे अपरिशन कर रहे हैं कि आपका तो कल्यान होगा ही लेकिन सारे विश्व का भी कल्यानों का। यो गेट समसार से मुक्ति प्राप्त करने के लिए भावत धर्म को जानना चाहिए। भागोत दर्म सत्य है सबका सत्य है उसको जानने के लिए ही मनुष्या का जीवन है। तो इसके वारे में आपने प्रश्टा पुछा,
मैं अधिन्द तक पुछा। प्रसन्न कल हम आगए देखेंगे ओम् पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्छते पूर्णस्यपूर्णमादायः पूर्णमेवावशिष्यते।।।।।।।।।।।।।।। अरिही ओम् चिरी गुरुफ्यो नमः अरिही ओम्