करभी आपने सोचा है कि जैन कौन होता है?
क्या मैं जैनकुल में पैदा हुआ हूँ तो मैं जैन हूँ। नहीं जब भगवान महावी ने समास की वियवस्था की थी। तो उन्होंने वाण व्यावस्ता नहीं की थी بھائی برث نہیں کیتی उन्होंने कहत श्रम जो जितनी मेहनत करे,
कैसी मेहनत करे?
जो जितनी अपनी आत्मा की शुद्धी की मेहनत करे,
उसके हिसाबसे उनने प्रतिमाओं गुणस्थान की विवस्था की थी.
तो ये जैनो की पैचान है हमारी अपने को जो करते हैं सिरफ कुल के पैदा होगा है उससे नहीं लेकिन जो जैन धर्म है जो जैन आदर्श है उनका जो पालन करते हैं वो जैन है मैं आपको एक छोटी सी बात बताता हूँ आप अपने जैन इतिहास्त में जोकें हमारे जितने प्रमुख अचारियें हैं सारे नॉन जैन्स थे जितने भी चाहे हरी बद्र हों चाहे हेम चंद्र जी हों सारे नौन जैन्स थे। लेकिन उन्होंने जैन शास्त पढ़े उनका चिंतन किया,
मनन किया और वो हमारे सबसोपरी जैन अचारिया वन गए। तो ये हमारी पैचान क्या है कुल की पचान नहीं है,
कुल की पचान है,
कुल से हम बन गए,
लेकिन कुछ और बात है.
इक्या बात है?
देखिये वाशिंग्टन डीसी में एक बहुत बड़ा रिचाच सेंटर है जिसे कहते हैं PEW Research Center तो वो सारे वर्ड में माइनॉरिटी डिलीजन्स और उनके आद्मियों की डिसर्च कर रहे हैं। ये माइनॉरिटी रिडिजिन ये क्या है और इसके आदमी कैसे रहते हैं?
वो हमसे भी contact किया। क्योंकि हम भी जैन कम्यूटि की स्टवी कर रहे हैं इंडिया के अंदर तो उन्होंने हमसे दो प्रश्नी पूछे। جب ہم اپنا سرویے کرتے ہیں تو ہمیں کیسے پتہ لے گئے کہ یہ جین ہے؟ हम तो एक दादा की तो नहीं पूछ सकते है आपने रस्पॉन्डेंट से कि आप जैन हो क्या नहीं हो। तो उन्होंने कहा क्या बात है जिससे पता लगे कि वो जैन है। तो हमने उनको दोड़ उनको question बताए मैंने कहا पहले उनसे यह पूछे के आपकी कोई भी धरम हो के आप जब दूसरे से मिलते हो,
अपने साधर्मी भाई से मिलते हो,
तो कैसे ग्रीट करते हो?
ग्रीटिंग कैसे करतो,
गुड़ मॉर्डिंग,
हैलो,
हाई करतो,
कैसे करतो दूसरा मैंने कहा उनसे आप पूछे के आपका सरवोच मंत्र क्या है?
आपके धरम में सरोच मंत्र क्या है?
کیوں کہ یہ تو بہت آسان ہے तो जैनी क्या करते हैं?
हर धर्म का अपना ग्रीटिंग का अलग तरीका होता है। हिंदु जम मिलेगा तो क्या कहेगा?
जाय श्रीराम या जैशिवशंकर इसी तरही दू बाते करें आगे चलें तो रादे रादे वगेरा वगेरा जैसे जिसको सूट करता है वो अपने धरम के इसाफसे करता है सर्दाल जब मिलते हैं तो वो सत्स्रियकाल बोलते हैं। बोलते हैं नहीं,
बोलते हैं। मुसल्मान सलाम वालेकुम,
वालेकुम सलाम। जब हम जैने एक दूसर से मिलते हैं तो क्या कहते हैं?
क्या करते हैं बताएए जैजिनेंद्र आगे चलते हैं कभी आपने सोचा ज्याजिनेंट का मतलब क्या है यहां हम तोते की तरह से जाज़रियन बोलके छुट्टी मारी। वह अच्छा है और यह जैन और जैन अधिकति करता है । जै जिनेंद्र जिनेंज कौन है भाईये हम जिनेंज किसको कहते हैं हम जै महवीर को नहीं कह देते हैं या जैनेमिनाथ या जैजपारश्रिकोनी बोल देते हम जिनेंज क्यों बोलते हैं क्योंकि हम जैन भाव प्रधान धर्म है और हम गुणों की पूजा करते हैं। गुणी की पूजा करते हैं लेकिन गुणी से जादा गुणों की पूजा करते हैं। ठीक है नहीं?
तो वहीं ये जिन कौन होए?
जिन पलस इंद्र। जिन इंद्र होते हैं न?
तो जिन कौन है?
जिनोने जीता विजेता को कहते हैं जिन क्या जीता उन्होंने राग रूपी शत्रु को जीता। कशाय रूपी जो हैं क्रोध,
मान,
माया,
लोग उनको जीता उनकी बात बात में करेंगे उन्होंने राक को जीता और राक्के जीत के क्या बन गए?
वीत राजी बन गये नहीं वीत राजी तो जो वीत राजी हैं और उन में जो सबसे अग्र हैं इंद्र हैं मतलब सबसे बड़े हैं उनको जिनेंद् कहते हैं تو یہ ہے ہماری پچان के जिसने हम यहाँ धन दौलत क्यों करते हैं के यह मुकेशम्बानी है रिचेस्ट मैनेजस की पूजा करें यहाँ उसकी करें नहीं जिसने रागों को जीत लिया जो उसने धर्म बताया कैसे वो जिन बना उस पे हम आच्रण करते हैं वो हमारा जैन धरम है जो उस धर्म पे चलते हैं वो जैन हैं। तो हम जैन हैं और हम जिन के धरम पे चलते हैं। अब प्रशनी उता है کہ جین اور جن میں فرق کیا ہے؟ हम जैन हैं ना हम मार्क पर चलते हैं तो मेरे में जिन में क्या फ़रक है?
छोटा था फ़रक है वो वीट्रा गिन है,
अमेरा गिन। मेरे में राग भरा पड़ा है मैं रागी हूँ और वो वीत रागी है इतना सा फरा क्या है सिरफ आप राक को जीत लो तो आप वीत्राजी बन गए और जिन बन गए कितना साधारन है जैन की पचान जो नहीं है हम जैन हैं ये हमारा है कि हम राक से वीत राजी बनना चलते हैं और उस मार्क पे चलना चाते हैं कि जो उन्होंने हमें दिखाया वो हमें वीत्राजी बनाईंगे नहीं ये तो हमें खुद बनना पड़ेगा,
अपने ही परिश्रम से बनना पड़ेगा। اس لئے ہماری سب سے بڑی پہچان ہے कि हम श्रमन हैं। हम अपनी पुरुशात हम अपनी साधना के उपासक हैं हम ये कभी नहीं कहेंगे कि भगवान माविर मुझे भी अपना जैसा बना दो। नहीं। मग्वान मावी या गुरु देव ये हमेर लाइट दिखाते हैं कि देखो भाई इस मार्क पर चलो गए तुमारा कल्याण होगा चलना तो आपको खुद ही पड़ेगा तो ये है कि हमें इस मार्क पे चलना है जिन क्या है?
उत्ता भारत में सारे जैन,
चाय स्वतांबर हों,
मूर्टी पुज़प हों,
स्थानकवासी हों,
या दिगंबर हों,
मेरी भावना का पाठ करते हैं। आपने कभी पढ़िये मेरी भावना?
اس کا پہلا شلوک کیا ہے؟ जिसने राग,
द्वेश,
काम अधिक जीते सब जग जान लिया। सब जीवों को मोक्ष मार्क का निस्प्रैहो उदेश दिया। जिसने जाग अब जब राग होगा तो द्वेश भी होगा तो जिसने राग,
द्वेश और काम काम मतलब इच्छा expectation इनको जीत लिया और सब जीवों को मोक्ष का अभ्देश दिया। है ना ये हमारे उपासक हैं हम इनके उपासक हैं आगर कहते हैं भाईया उसके नाम कुछ भी दे लो तो कहते हैं बुद्ध कहलो,
वीर कहलो,
हरी कहलो,
हर कहलो,
ब्रह्मा कहलो और जो अन्ती में है वो सबसे इंपॉर्टंट है या उसको स्वाधहीन कहो ये है हमारी पैचान कि मेरे अंदर जो आत्मा है वो भी जिन है उसमें भी capability है और राजी से वीतराजी बनने के लिए क्या है?
भकती भाव से प्रेरित होकर चित उसी में लीन रहे के उनके परती आदर भाव करते वे मैं तो हमेशा ये सिर्फ हूँ,
के मैं भी वीत्रागी हूँ,
मेरी शुद्ध आत्मा है,
ये मेरे कर्मों का फल है,
जो मुझे भुगतना पड़ता हैगा,
बट आई ऐम्ड लाइक टिस,
मैं रियाल असंस है लाइक टिस। मैं आपको दाता हूँ जब मैं रोज समायिक करता हूँ अब मैं अपने निजी जीवन के बारे में बात करता हूँ तो मैं जब पनी समायिक पूरी करता हूँ तो एक छोटा सा शलोग जरू पढ़ता हूँ वो इस प्रकार है हूं स्वतंत्र निष्चल निष्काम जाता दरष्टा आतम्राम् जो तू है वो मैं हूं भगवान अंतर यही है इतना उपरी इतना जान तू विराग मैं रागवितान तो ये मेरी प्रेड़िणा का सोत्र बनता है राजी से विराजी कैसे बने देखिए ये राग की बड़ी महिमा मैं आपको बताता हूँ के भगवान महावीर के प्रथम गंधर पौन थे। वह तंछा मी थे। तो जब भगवान का समो सरण लगता है तो गौतम स्वामी व्यावस्था करते हैं समो सरण की तो सादुनों के लिए अलग जंगा होती है जो जिन होते हैं उनके लिए अलग होती है तो बहुत सारे छोटे-छोटे साधु जिन के लिए स्थान होता है वहाँ पर जाने लगे तो गौतम स्वामी उनको रोखते हैं। के वही तुम यहाँ पर हाँ नहीं जा सकते तुम इधर ही बैठो तो उन्होंने भगवान के तरह विशारा किया तो भगवान कहते हैं जाने दू उनको ये मतलब ये जिन हो गये हैं तो जब बात हो जाती है तो गौतम स्वामी भगवान से पूछते हैं। कि मैं आपका प्रमुक्षिष्य हूँ। ये छोटे छोटे कल के सादु वीतराजी बन गए। मैं चो नहीं बन रहा। तो वो कहते हैं गौतम तू भी बनेगा लेकिन तेरे में मेरे प्रती राग भरा पड़ा है। जिस दिन तेरे में मेरे पती राग कम होगा खतम हो जाएगा तू भी मेरे जासा इनकी तरह जिन बन जाएगा। अब वो ही हुआ जिस दिन भगवान महवीर को निर्वान हुआ उसी दिन उनको केवल ही अनकी प्राप्ती हो गई। तो ये राग बड़ा गातक शब्द है और इसकी तरह हमें विशेज ध्याना रखना चाहिए। अब ये राग-राग करतो लिया,
राग-राग राब तो लिया हम तो संसारी जीव हैं,
समाध में रहते हैं,
परिवार में रहते हैं,
रोज कभी किसी से मिलना,
कभी किसी से मिलना,
तो हम इसको कैसे कम करें?
तो देखिये आपने समायिक पाथ पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त पढ़त प्रेम भाव हो सब जीवों से गुणी जनों में हर्ष प्रभो कर्णा सोत्र बहे दुख्यों पर दुरुजन में मध्यस्त विभो। अगर मैं कहूँ कि मैं राक नहीं करूँगा किसी से भी तो मैं देही नहीं सकता जब मैं घर जाता हूँ,
तो पत्नी के परती मेरे कुछ और भाव होते हैं,
जोकि साधारान इस्ती के परती नहीं होते हैं। अपने बच्चों के लिए अलग होते हैं तो कहते हैं भाईया सद के प्रती प्रेम भाव रखो। کسی سے بیہر کے بھاو مت رکھو जो अच्छे गुनी लोग हैं,
जैसे गुरुदेव हैं,
इनके साथ जब हो,
इनकी संगति में हो,
सचसंग में हो,
तो आपको आननद की अनुभूति होनी चाहिए.
क्यूंकि आप उनसे कुछ ग्रहन करके अपने आनन्त को बढ़ा रहे हो। जब आप किसी दुखी को देखते हो तो आपका हिदया करुना से भरना चाहिए कैसے दूर करूँ जब आप बद्माश लोगों के साथ बैठते हो। तो कहो,
जैसे जुविश लोग कहते थे,
के में गौड कीप दें अवेफरॉम अस,
के भईया हम इनसे बचके ही चले जाते हैं,
हमारे को इनसे कोई लेना देना नहीं है,
हम इनको ठीक नहीं करने वाले,
ना ये करने वाले.
तो ये है प्राक्टिस् प्राजा करने के लिए मिनिमाज करने के लिए प्राजा करने के लिए प्राजा करने के लिए प्राजा करने के लिए प्राजा करने के लिए और भी ये धर्म जाता है। अब ये तो होगे राक्की बात है जान लिया हमारा दुश्मन है इसको हमें जीतना है तो फिर दिनेने भगवान ने हमें क्या बताया?
उसको हम धर्म कहते हैं जैन धर्म है तो ये धर्म क्या है?
देखिये धर्म के दो रूप हम लेते हैं एक तो यह है रिच्वल्स कि हम मंदि जाते हैं,
पूजा करते हैं,
समायिक करते हैं,
आरती करते हैं,
वन्दना करते हैं,
साधों को आहार देते हैं,
दान देते हैं,
ये रिच्वल्स हैं,
जो हमारे को बताये गए हैं,
ताकि हम बुराई से भलाई की तरफ चलें.
लेकिन असली धर्म क्या है?
तो यह है क्योंकि हम भाव प्रधान धर्म हैं,
तो यह भाव की महिमा बताते हैं। तो एक बहुत बड़े अचारियों में है कुमार स्वामी,
उन्होंने काल्तिक अनूप्रेक्षर नाम का ग्रंत लिखा है। तो उसमें उन्होंने चार परिभाय शांतिन धर्म की। सबसे पहले उन्होंने कहा वत्तू सहाओ धम्मू वत्तू सहावो धम्मो फिर कहा कमा दी दस वियो धम्मू फिर कहा रतनत्र जयदमू और अन्त में कह दिया जीव रखा नाम धम्मू। चार भाशों में हमें भिलकुल धर्म की बात बता दी के धर्म क्या है वही है। तो देखें वत्थू सहाओ धमो। जो वस्तू का सुभाव है वो धर्म है। जल का सुभाव क्या है?
शीतनता है अगनी का सुभाव क्या है?
उशनता है गर्मी देने का है हमारी आत्मा का क्या सुभाव है?
बहुत सारे हैं,
बेसिकली ज्यान आनन्द,
ज्यान आनन्द हैगा.
क्योंकि अगर मेरा ये सुभाव है तो इन भेन का भी ये सुभाव है इनका भी ये सुभाव है उनका भी ये सुभाव है तो सबका सुभाव एक ही है इसे हमारे देखने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करने के लिए करन फिर हम कहते हैं ये के खम्मादी दस्वियो धम्मो कमादे मिं चमा आपने दस लक्षन सुनने होंगे उत्तम,
शमा,
मार्दव,
आजव,
शौन,
सत्त,
तप,
त्याक। तो ने कहा ये भी दस धर्म हैं। ये आत्मा के सुभाव हैं। ये कोई उपर की बात नहीं है कि चमा कर दो,
ये कर दो। आत्मा में हैं। असमें उत्तम का शब्द लगा दिया ये भी बहुत important हैं सारे के सारे क्योंकि जो पहले चार हैं उत्तम चमा,
माल्दव,
आर्जव और शौंच ये जो कशाय हैं हमारे क्रोत,
मान,
माया,
लोब इनके विपरीत आर्थक हैं। मतलब चमा मारदव मतलब आरजव और शौच ये रोत का भप्रीत क्या है चमा और जो दूसरा होता है न,
क्या कहते हैं,
अरोगेंस हम इंग्रिश में कहता है मान मान का क्या उल्टा है?
विनै,
Humility ठीक है नहीं?
और कपट का क्या उल्टा है?
सिम्प्लिसिटी,
आजो और जो चौत्ता लोब है उसका क्या है संतोष लोब का संतोषित है कि वे अपनी इच्छायां को सीमा करो चिड़ो कुलसो मत किसी को देखके और ज़्यादा You know,
Desire को मतरखो,
सन्तोष रहो। तो ये हमारे अनोने सबसे पहले चार कहे हैं अब बाद में इनको कैसे पाया जाये?
सत्य,
तित्तप,
त्याग,
आकिंचन और भ्रंचले के लिए तो ये नोने धर्म करें। रतनत्रैचैधमु हमारे को यह बताये जाता है कि सम्मेक,
दर्शन,
ज्ञान,
चारित्राणी,
मोक्ष मारगा तो भाईया तुम्हें अगर चलना है तो ये भी आत्मा का स्वभाव है। इसलिए अन्हें को रत्नत्र थ्री जुएल्स खठे कहा जाते हैं। और छोथा प्रक्टिस के लिए है जीवों की रक्षा करना भी धर्म है। क्यांकि तुम आनन्ख से हैना चाहते हो तो और जीव भी आनन्ख से हैना चाहते हैं। तो उनकी रक्षा करोगे तो आपके उपर रियक्शन नहीं होगा। कार्मिक बॉंटेज नहीं होगी और आप जोया अराम की जिन्दी विता सकते होगी तो ये है,
देखे,
वैल्यूज,
बेसिक वैल्यूज जो है न,
हमारी आत्मा की,
हम आत्मा की बात कर रहे हैं,
इनसे हम डिराइव करेंगे,
के जो हमें गाइड करती हैं ये.
इसमें मैं आपको डश्वा काली सूत्र के ओर लेके चलता हूँ फ्यों लेके चलता हूँ देखिये आजकल हम फास्ट फूड की लाइश में रहते हैं जीवन भी अतीत करते हैं हमें चट चाहिए मेरी मा थी जब खाना बनाती थी,
पहले बिचारी अंगिष्टी जलवाती थी,
फिर आटा गूती थी,
मतल छीलती थी,
दो घंटे,
ढही घंटे के बाद वो खाना बनाती थी,
और फिर हम खाते थे.
आज मेरे बच्चे,
पोते,
पोती क्या कहते हैं?
चलो अभी दो मिनेट में खाना खाक आएंगे। वहाँ चलो क्या नाम है सागर रतना में चलो या और किसी रेस्ट्रेंट में चलो। वहाँ पे जाके फटा फट खाक आएंगे। So,
We don't have time.
तो इसलिए मेरे को दर्सल भैकाली घरण बहुत अच्छा लगता है। अब मैं आपको कहूँगा कि आप भी पढ़िये। क्यों कहता हूँ?
क्योंकि ये अचारिय सहमभवस्वामी,
जो की शुद्केवली थे,
उन्होंने अपने बेटे को जल्दी जल्दी जैनधरम का आचा सिखाके उससे प्रैक्टिस कराई थी ताके उसकी गती आगे बढ़ सके,
मतलब अच्छी गती को पात कर सके। तो इसमें इन्होंने क्या सबसे पहले क्या करते हैं धम्मो मंगल मुक्कित्तम् अहिंसा संजमो तवू देवावितं नमस्संति जस्थम्मो सयो मना क्योंते हैं विचीज़ सुप्रीम लिजियन And now I will not use the word religion.
I will say supreme spiritual value.
यहाँ सप्रिश्वान वालियों हैं और यहाँ हिंसा,
सन्यम और तप हैं। یہ ہیں अहिंसा हमारे सब्प्त जो भी हम काम करें उसमें अहिंसा का ख्याल धक्ये जब प्राक्टिस करो तो संयम जब काम करो तो मेहनत तपस्या करो जिसमें के हिंसा जले कर्म जले हैं हमारे तो यह है हमारे आचार के लिए नोने बताया इसको हम आगे चल के देखते हैं महराज टाइम है अब हमने ये तो आ गया हम पहले तो राक की बात करते थे अब हमारे इंसे पे उतरा तो इन दोनों का समभंद क्या है?
राकार हिंचाका मैं आपको बताता हूँ मैंने कहाता ना आत्मा का स्वभाव ज्यानानन्द सबात मामकपा सबहावा जानेंदे अगर मैं किसी के सभाव में बाधा डालता हूं तो क्या है ये?
ये अब मेरे कर्मों का बन कोई होना हिंसा है। तो अगर मैं दूसरे के परती कुछ करता हूँ,
जो इसके सुभाव के उपरीत है,
तो हिंसा है। और अगर मैं अपने सुभाव के विरुद कुछ करता हूँ,
विभावों में लाता हूँ,
तो भी वो हिंसा है। तो ये है हिंसा,
हिंसा का ये क्या इसने ताली में है?
दूसरा देखें क्या है जब हम हिंसा करते क्यों हैं?
हिंसा का उद्भाव ओरिजन क्या है?
पुरुशात सिद्धी उपाय जो की महात्मा गांधी और श्रीमत राच्चन जी को बेहद प्रिय था। मैंने महत्मा गन्दी कुपर किताब लिखी है ये ग्रंत अरे ज्याना ग्रंत है ये गांधी जी की टेबल पे हमेशा रखे रहते थे। क्यों रखे रहते थे?
क्योंकि पुर्शात सिद्धी उपाय एक ऐसा गरंत लिखा है अचारी अमरचन ने के हमारी जितनी भी अचार पद्धतिये जैनियों की सब अहिंसा में समाहित हो जाती हैं। सब चाहे सत्य बोल लीजे,
चाहे अचार ये बोल लीजे,
चाहे ब्रह्मचर ये बोल लीजे,
चाहे परिगरह बोल लीजे सब बोल लीजे कि जब आप जूद बोलते हो तो क्या होता है?
दूसरों को दुख होता है,
आपको भी दुख होता है.
तो हिंसा हो गई.
चोरी करते हो,
जिसका माल चुरा है,
उसको दुख होता है,
आपको भी डड लगा रहता है.
तो वहनें सबको आहिंसा में समा दिया.
आइंसा होती कैसे है?
तो होने 42 गाता में लिखा के जब हमारी आत्मा कशायों से रंजित होती है मतलब करोध,
मान,
माया,
लोब से रंजित होती है तो हम जोबी काम करेंगे न वो हिंसा होगी। आगले राग के ऊपर राग रहींचा कसंबन है नहीं। उन्होंने कहा तुम कुछ भी कर लो। अगर तुम क्रोध में हो या मायाचारी में हो या मान में हो या लोब में हो तो तुम वो वालियन्स करेंगे। और तुम अगर इनको कम करोगे तो कमहिंसा होगी और तुम विल्कुल नहीं करोगे तो पूर्णहिंसा होगी। तो ये है अहिन्सा और राग का तालमेर। और इसलिए जैन धर्म को में कहा जाता है अहिन्सा परमोध धर्म। This is the supreme spiritual value for Jains.
इसके अंदर देखिये इसको हम आगे चलते हैं कि आहिंसा का पालन कैसे करें तो अहिन्सा का जो बेसिज है वो है एक्वानिमेटी समता जो मैंने आप से पहले कहा था आप संभाव में रहिए। ज्याता द्रिष्टा बनिये,
करता हता मत बनिये,
ज्याता द्रिष्टा बनिये,
समभाव रहिए,
सबके परती एक सभाव रखो,
आप अहिंसा में प्रभत होती रहोगा अयस्ता अयस्ता.
टीगर इसको हम प्रैक्टिस कैसे करें आहिंसा को सोशल लाइफ में तो भगवान महवील ने प्रश्निव्याकरण सूत्र में बहुत अच्छे नाम दिये ऐनसा के साथ नाम दी है सिक्स्टी सिनानीमिज वा फैंसा सबसे पहले तो लोगने कहा आइंसा भगवई के आहिंसा भगवान है इतनी महीमा उन्होंने देदी और ये वाक्य में सच भी है। के पूर्ण ऐन्सक कौन हो सकता है?
पून अहिन्सत सिरफ सिद्ध आत्मा हो सकती है क्योंकि उसका किसी के साथ सम्मन्द नहीं है,
कुछ नहीं है,
किसी से लेना देना नहीं है,
तो इंसा की बात नहीं हो सकती। जब तक हमारा attachment होगा,
राग होगा,
तो इंसा तो होगी ही होगी। तो भगवान महवीर ने कहा भाईया तुम क्या करोगे तो उन्होंने 60 नाम बता हैं अनो कंपा आप समझते हैं नुकम्पर्त कि सबको अपना समान समझो और फिर कुछ करियें दया ठीक है नहीं चमा हम चमा चमा की बात करते हैं चमा को भी आइनसं में कर लिया। आयाचे टॉलरेंच सही शुता क्या आप ये सीखे इस तरह उन्होंने साथ नाम दिये कि ये करो तो आप अहिंसा को इपद्धति में होगे और जब ये सम मिल जेंगे वन प्लस टू,
प्लस त्री,
प्लस फोर्ट,
सिक्ति तक हो जोगे तो आप पुनाहिंसा को जाओगे थ्यूरी हमें पता है,
अब ये प्राक्टिस की बात हो गए। तो ये हैं जैनधरम में आहिंसा के पालन की पढ़ति.
एक शमाब अपना ये,
अनुकम्पा लाई ये,
सम्ता लाई ये,
टॉलरेंश लाई ये,
ये है अहिंसा का स्वरूप। सारी जड़ा मेरे को थोड़ा साथ इसके जड़ा प्रती है इसप्राकार हम देखते हैं,
अहिंसा की बात हमारे सांज में आती हैं जी.
अब हम आगे चलते हैं,
दश्वकालिक सूत्र में कहा संयम। तो इसे एम क्या होता है। अच्छा ये संभवने है भगवान माधि मिलें सईयम क्यों कहा आहिंसा के साथ?
तो देखिए सय्यम के बिना आहिंसा होगी ही नहीं सकता। ये सिन्यम् चाहे क्या इंद्रियों को कंटोल में रखो भूक लगे तो मत खाओ अच्छी चीज़ दिखे तो आँख बंद कर लो मतलब ये नहीं है,
ये हैं,
लेकिन असली संयम क्या है?
आचारंग में बड़ा अच्छा कहा है جو جاگتا ہے जो जागता है वो सम्दर्श्टी,
सम्यक्दर्श्टी है। जागते रो। गुरुदेव ने भी कहा था जागो। हिंदि में कहते हैं जो जागत है तो पावत है। जो सोवत है,
सो खोवत है। तो हमें अवेर्ट स्प्रीच्वल्ली अवेक होना चाहिए,
सम्दर्ष्टी रहना चाहिए। तो ये सइयम क्या है?
तो धस्वेकालिक सूत में ही सईयंब स्वामी ने आगे की दो काथाओं में बड़े अच्छे उधारण से अहिंसा और सईयंब की तालिए दिये हैं। उन्होंने उधारन दिया है भवरे का भवरा होता है जो बाग में घुमता है गार उसका उधारन देते हैं कहते हैं देखो भाईया ये भव्रा है बाग में जाता है वहाँ पे गुलाब चमेली और एको प्रकार के फूल खिले विए हैं तो वो एक फूल पर बैठता है। एक फूल पे बैठके थोड़ा सर रस लेता है,
फिर उड़के दूसरे फूल पे चला जाता है,
तीसरे पे चला जाता है,
चौत्रे पे चला जाता है,
और अपनी भूँक को पून कर लेता है। और जो फूल हैं,
वो भी खुश रहते हैं,
जीवित रहते हैं,
पॉलिनेशन होती है,
बढ़ते हैं,
आई परंपरा चलती रहती है.
लेकिन मानो एक भौरा गुलाग के फूल पे बैठा। जब उसने पहली घूट ली तो उसको बड़ा आनन्द आया। तो इसने का मैं आल लेता हूँ थोड़ी सी तो इसने थोड़ी और ली بید گیا ہے تو اسکو اور بھی اچھی لی तो वो पीता ही रहा,
पीता ही रहा उसके सारे फूल को तो जब वो फूल के रसको पी रहा है,
तो क्या होता है?
फूल ऐसे था,
वो ऐसे होने लगता है.
भौरा अंदर तक जाते रहता है फूल बंद हो जाता है भौरा मर जाता है फूल भी मरा,
बहुरा भी मरा یہ ہے سنیا ये है सन्यम के आप इतना ग्रहन करिये के जिस से ना आपको ना जिसका भोग कर रहे हो उसको दुखो संयम जो हमारी इंद्रियों की व्रत्ती हैं,
इनको संकुचित करो,
अपने कंट्रोल में रखो। जैसे महाबालत में घोड़े दिखाते हैं न,
पास घोड़े हैं,
भगवान क्रिशन की लगाम लेके अपने आहतमें खड़ेवे हैं,
तो हमें अपनी इंद्रियों को अपने हमेशल इनके गुड़े हमारे कंटोल में कहम इदह से चल तूदः चल नहीं हमें आहिंसा को ध्यान में रखे अपनी इंद्रियों का कंटोल यह है संयम सैयम को जियनधरम में कैसे कहा गया है इसके लिए दो शब्द उप्योब के गए। भाव की बात करता हूं मैं। वो है समीती और गुपती मतलब we have to develop attitude of carefulness and restraint.
गुप्ती क्या है?
गुप्ती क्या है?
इनको हमें करना एक गुप्ति समीती है इनके लिए क्या कहा गया है हमारे लिए वृतों का जो हम साधारनों के लिए अनुवृत हैं साद्धों के लिए महावृत का कहा गया है तो वृत बताये गहें वही है इनका पालन करो तो आप सईयम का पालन करें और अगर आप करने के लिए करने के लिए क्या सन्यम है?
सन्यम समवर के लिए समवर के वही बुरे कर्मों का आना रुके और जो कर्म आए तो वो शुब कर्म आए। क्योंकि कर्म तो आएंगे,
रुख रहे ना,
आज आते हैं तो रुखें,
नहीं रुखें तो जो आएंगे तो अच्छे कर्म है,
शुब कर्म है। तो ये है सम्वर् इसका मैं आपको दो example देता हूँ क्योंकि हम श्रीमत राचन आश्यम में बैठे हैं,
तो मैं श्रीमत राचन जी का ही जीवन से एक उधारण देता हूँ। देखे वो जोहरी थे,
हीरों का व्यापार करते थे। तो एक अरब ट्रेडर उनके पास आया। आपने पढ़ा होगा। मैं दुबार से रेपीट करता हूँ। तो उनके पास एक अरब ट्रेडर आया। उसने उनसे हीरे खरीदे। अब बेचे थे तो उसके पार हीरे थे या नहीं थे लाने थे तो उन्होंने verbal agreement कर लिया आज कि इतने हीरे इतने रुपे के वो कल यहाँ पर्छों लाके देगा तो वो गए,
तो उसके भाईने उसको बहुत डांटा। ये तुने क्या कर दिया?
तुने हजार रुपे के लिए भीज दिया,
आज तो भाव डेल हजार रुपे का?
तो वो बिचारा रोता पीटता स्री मदराच्छन के पार आते हैं। तो जैसे ही राजचन जी के पार आते हैं,
कहते हैं भाईया दुखी मत हो। कल तुने हीरे कम दामों में बेचने का कहता आज दाम बढ़ गया कोई agreement नहीं है मैं तेरे को दुखी नहीं होने लेता हूँ ये है सम्यम आज का वैपारी क्या है आगे चले पंजा सो रुपे निकाल पाले ते ये प्रामिज हैगा,
नी तो मैं नी बात करता था। तो ये है श्रीमद अच्छन अच्छन से इकते हैं। आहिंसा ओस्से इम् इन दोनों में गांधी की तरफ चलते हैं। गांधी में पता आपको श्रम थे हमेशा चर्खा कात्ते रहते थे और चर्खा कात्ते कात्ते वो 10-12 उनका मिलने का समय भी होता था तो नेटा और जो भी लोग था उनसे मिलने के लिए आते थे तो उन्हांने नियम बनाया था हरेक को 2 मिनट मिलेंगे। अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ अपनी समस्या बताओ तो एक दिन इंग्लेंड का एक रिपोर्टर आता उनके पास। कहता है बापू मैंने सुनना है आप दो घंटे में सौस सौ आद्मियों को खुश करके भेज देते हो। आज मैं आपके पास बैठना चाहता हूँ,
देखना चाहता हूँ कि बईज आप कैसे करते हो। तो बाफ़ने कहा बैच जाये वेलिए तो तो वो बैट गया देखा कि आएं जाएं और सब खुश होके जाएं। तो जब बारा बजे तो बापूने कहते हैं अच्छा चलो भोजन का समया हो गया। वोजन करेंगे तो वो कहता है Please 8 Minutes वो कहता है कि आपकी मेथेलोजी क्या है प्राब्लम सॉल्विंग की कोई political solution के लिए आता है,
कोई personal solution के लिए आता है,
कोई business solution के लिए आता है,
कोई family solution के लिए आता है,
आपकी policy क्या है?
तो बापो ने कहा देखो भाईया,
बिल्कुल सीधा प्रिंसिपल है। मैं कहता हूँ एक पिनट में समस्या बता। तुम्हारी समुस्याका है आदे मिनट में दो solution बताओ जो तुम्हारे साथ से दो बेस्ट तुम ही बताओ ये दो solution बता दो best और फिर आदे मिर्ट में कहता हूँ इसमें हिंसा कम है कोई एक कहता,
कोई दो कहता तो कहता भाईया जिसमें हिंसा कम है तो वो काम कर लेता बेल्कुल सिंपल फार्म है। इसे हमारे ज़्याने के लिए है,
हमारे ज़्याने के लिए है। हम अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अपर अब आएए देखिये इसको आगे हम चलते हैं अच्छा इसमें आप देखिये एक और मैं आपको बताता हूँ आइडेंट्री की बात करते हैं हमारे प्रतीक्या है ज्यानियों का हम अपने धरमत के अगर हम बात करते हैं तो क्या प्रतीक है?
लोक नहीं,
लोक के अंदर ये जो है हाथ है ये है जन्यों का प्रतीक और इसमें बीच में क्या लिखा हुआ है?
चक्र है और आहिंसा लिखा हुआ है इसका मतलब क्या है?
कभी आपने सोचो जब आप सड़क पे चड़ाय पे जाती हो,
तो जब पुलिस वाला ये करता है,
तो क्या मतलब है?
टैरो गती को स्टॉप विराम दो ठैरू एक साकें के लिए ठैरों जब तक ग्रीन लाइट न हो जाए तो जैनी भी कहते हैं कि आप कोई भी काम करो तो एक मिनट के लिए ठैरिये आश्चोजी क्या सोचिए आहिंसा के बारे में सोचिए कि मैं इसमें कितनी हिंसा करता हूं इसमें हिंसा कम हो सकती है नहीं हो सकती है और फिर जो लीश्ट आहिंसा होती है वो करिए नहीं करोगे तो भाईया 84 लाग योने का चक्कर है न इसमें आप भूमते रहोगे तो ये हमारा जो प्रतीख है,
ये अहिंसा और सैंयम दोनों का ही प्रतीख है। तो ये आहिंसा सैयम मोस्ट इंपोर्टंट हमारे लिए है तीसरा था तप मेरा इस्टिमेट गलत हो सकता है क्योंकि मैं ऐसी जङ्गां बैठा हूँ सूरत के आजपास हैं,
गुजरात में हैं बहुत आपको गोल्ड और दाइमेंट जूआलर्स होना होगा। ओकेट अब हम कहते हैं कि आप ज्वैलर हो तो जब हीरे को या सोने को खदां से निकालते हो तो क्या मट्टी है मट्टी में इतनी बड़ी मट्टी में सौना जड़ा सा होगा हीरा जड़ा सा होगा उसको आप हीरन निकालनी के लिए क्या करते हो,
मट्टी को तोड़ते हो,
फोड़ते हो,
अंत में क्या करते हो,
उसे एट ए वेरी हाई टेंपरेचर हीट करते हो,
तपाते हो,
तपाते हो नहीं,
तपाते हो.
क्यों तपाते हो?
क्योंकि हीरे के उपर जो मट्टी रूपी मैल है वो हट जाए और अंदर से हीरा निकलाए सोने को भी हम तपाते हैं इसलिए के वो अथारा करट के बदले उननीस का हो जाए,
बीस का हो जाए,
बाईस का हो जाए,
चौबीस का हो जाए.
तो हम इंप्यूरिटिस को दूर करने के लिए तपाते हैं.
इसी प्रकार हमारी जो आत्मा है इसपे जो कर्मरूपी मैल है जो जुड़ा हुआ है,
इसको दूर करने के लिए हमें इसे तपाना पड़ेगा,
सिंटर करना पड़ेगा,
ताकि जो कर्म हमारी आत्मा से जुड़े हुआ हैं,
ये धीले हों,
इनको अपने से दूर कर सकें। तो भईया आत्मा तो कोई हिदे की थाना चीज़ है नहीं कि ले गया मैंने भट्टी में डाल दिया चलो बही तप के निकल लेगी। तो ये भाव प्रधान हैं,
भाव सरी करने पड़ेंगे हमारे क्रिया सरी करने पड़ेंगे क्रियाँ से अक्टिविटी से करना पड़ेगा तो हमारे शास्त्रों में दो प्रकार के तप बताये हैं। एक भाहियत तप है,
एक आंतरिक तप है। भाहियत तप वो हैं जो आपको दिखते हैं। और फूडस से रिलेट्रिक हैं। कम खाओ,
कैसा खाओ,
कितना खाओ,
वगेरा वगेरा। अंकुष करने के लिए अश्टमी 14 पक्खी को हरी मत खाओ,
इस दिन घी मत खाओ। ताकि आपका कंटोल सयम बढ़े। लेकिन असली चीज क्या है वो है आंतरिक्ता प्राहिष्चित करिए जो आपने गल्टी करिये प्राहिष्चित कीजिए क्या नामें विने,
विने लाईए,
अपने मृता लाईए,
वैया वरत लाईए,
गुणी जनों की सेव करिये,
स्वाध्याय करिये ताकि आपका ज्ञान बढ़े द्यान लगाईए अन्तिमें व्युत्सर्व के सब को छोड़के एक आंतमें द्यान लगाते हैं। तो यह हमारे तप करने के तरीके हैं,
जिससे हमारे आत्मा के ऊपर कर्म रूपी महल हरते हैं। तो इहो गई आइंसा संग्याँ तब इसको हम अपनी लाइश में कैसे उता रहे हैं?
प्रैक्टिस् वैल्यूद हैं श्रम्द मैं नहीं कूँगा कि अमश्रमन है हम जैन धरम है भगवान महावीर कभी नहीं कहते के पैसा मत कमाओ। पैसा कूप कमाल लेकिन अहिंसात्मक तरीके से कमाओं। तो श्रम तो आपको करना पड़ेगा। ये हमारी मूल वैल्यू है। लेकिंग इसके बाद की जो वैल्यूज हैं वो हैं आहिंसा जो भी हमारा आचार है उसमें आहिंसा सर्वो परी है। अनेकान्त इन थोड़्स और तीसरा है जीवन शेली और समाज में अपरिग्र है। प्रवर्तियों चाहिए स्यात्वार मतलब हमारी बोलने की शैलिये ऐसी होनी चाहिए कि हम अपनी बात कहें भी लेकिन दूसरे की बात को नका रहें भी नहीं यह है स्यात्वार तो ये हमारी चार वैल्यूज हैं अहिंसा,
अनेकांत,
अपरिग्रह और श्यादवाद.
अहिंसा तो हम बहुत डिस्कत कर लिए,
अनेकांत को मैं दो मिनित लेता हूँ.
अनेकांत का देखें,
मूल सिद्धान जो है,
ये जैनदरम की सत्थ की परिवाश से आता है.
सत्थ,
जिसकों द्रव्य कहते हों सत्थ कहते हों,
उसकों कहते हैं उत्पाद व्यह द्रव्य युत सत्थ.
कि सत् क्या है जो हमेशा रहता है लेकिन सतत् हमेशा चेंज भी होता रहता है। इसका मतलब कि पर्मानेंट और इंपर्मानेंट दोनों साथ साथ चलते हैं ये बहुत important है and this encourages us to improve.
वन्डमे गरीब हो गया तो मैं हमेशा गरीवी रहंगा। नहीं। वो कहते हैं आप जाना हैं। इसका मतलब दो अपोसिज गुन हमेशा रहते हैं। तो जब भी हम किसी के बारे में सूचे हैं तो स्वर्फ चाहिए अगले की वराई वराई न देखो उसमें सोचो इसमें अच्छाई भी है क्या अच्छाई है इसमें आत्मा है इसमें शक्ती है इसको करें तो हो सकती हो सकता है दूसरा यह है कि वस्तु में अनेको धर्म होते हैं। एक ही नहीं है,
आत्मा के लिए हम बात करते हैं,
तो हम सिर्फ आनन्द की बात नहीं करते हैं.
जब हम अपनी फैमिलें बात करते हैं,
तो हम आत्मा के आजन गुण की ज़्यादा बात करते हैं। जब अपने उत्थायन की बात करते हैं,
तो ज्यान की बात करते हैं। जब हम improvement की बात करते हैं तो VRA की बात करते हैं। तो अच्छा में,
हम एक क्वालिटी के लिए बाते हैं। तो इसका मतलब है कि जब हम कभी ही बात करते हैं,
तो हमारा जो ज्यान है,
हमारी जो सोच है,
वस्तु के एक गुण के लिए बोलती है.
मानलो मैं ज्यान के उपर बोल रहा हूँ,
ये भेन जो हैं जी,
ये आनन्त के उपर बोल रही हैं,
है नहीं?
गुरुदेव जो हैं तरक्की क अनेक अन्त मतलब मैनी अन्त means views.
There are many views to the truth.
I cannot know the whole truth.
Only a Jinnah can know the truth.
I understand this.
So therefore I should develop an attitude of reconciliation.
समन्मे की भावना होनी चाहिए.
सबके साथ लेके चलना चाहिए.
सब हट नहीं करना चाहिए.
मैं ही,
मैं,
मैं,
मैं,
एहंकार के बात छोड़के हमें सबके साथ रहना चाहिए.
अब परिग्रह क् अपरिगरा का मतलब कभी ये नहीं है कि समान मत रखो। लेकिन साथ के साथ important क्या है भाव के दरस्ची से पजसिवनेस,
ममत्व नहीं होना चाहिए और दूसरा है एक्विजिटिवनेस,
तृष्णा नहीं होनी चाहिए इनको कम कैसे करें इसको कम करने के लिए हमारे भौसचाचारी ने कह दिया भाई जो तमा इस परीग्रह है इसकी सीमाये बान लो जैसे मेरी मदर थी उन्होंने कहा जब बड़ी हुई कि मैं पांच साली से जादा नहीं रखोंगी। उन्होंने प्री एक सीमा बान ली। तो भाईया उनको कोई भी सारी लाके दे,
मेरी वाईशा कोई भी लाके देती थी। दे दे,
अपनी प्राणी एक सारी में निकाल के,
चाय किती भी अच्छी हो,
दूसरों को दे दे थी। तो उनमें एक्विजिटिवनेस बिल्कुल नहीं संतोष है,
मैंने ये कर लिया है। तो इसलिए हमारे हैं परिग्रे परिमान की बात करते हैं। और स्यादवाद में ये है कि हम कहते हैं कि एक द्रिष्टी से ये ठीक है तुम भी ठीक हो। एक दर्शी से तुम भी ठीक हो। लेकिन ये पून ठीक नहीं है। मैं अपनी बात को विराम दूँगा अब इसके एक उधान के बाद महत्मा गान्दी के तरफे लेके जाता हूँ आपको महत्मा गान्दी जब पॉलिटिक्स में आये तो मैंने मुसल्मानों को बहुत उससा आता है। क्योंकि मुसल्मान की सोचने का तरीका अलग था उनका सोचने का तरीका अलग होता था तर फिर वोने जेहन धर्म का अनिकांत दान पड़ा। और जैनत का अनेकांत और हिंसा में अवरत ये तीं चीज़ां सबसे जाधा प्रिये थी। तो मैंने जब मुसल्मान से बात करता था तो मैं अपने आपको मुथलान बनके देखता था कि मैं क्या सोचूँगा। तो मैंने कहा जब सोचने देखने शुरू करी तो उसकी बात को मैंने अप्रिशेट करना शुरू किया उससे रीकंच्टेशन लाने शुरू करी और उनको अपने साथ जोड़ा इसके साथ आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद आपने इतनी शांती से सना मिच्चामी दुखकळम कोई बात मैंने गलती कहियो आगम अनुकूल ना कियो तो प्लीज चमा करिये मैं अज्ञानी पुरुष हूँ धन्यवाद