वतस्यपत्रस्यपुतेशयानम् بالوں दंदं मनता मरा गोविन बहरे मुरारे वेनात नारायण वासुदेव जिखवे पिबस्का अमृतमेत देव गोविन्द दामूदर माध्रवे कुविन्द दामूदर मात्वेते ओष्ण रादा वर्गू कुलेश पाल कुरुवर्दन नात भिश्नू जिख्वे पिबस्वाम् रितमेत देव वुविन्द दामूदर बातवे कुविन्द दामोधर आतर ही उम सहनावतू सहनावनत्तू सहवेयं करवाव है। यस्त्रिनावधीतमस्तुमावित्रिशावहेति उम शानते शानते शानते हे बागवत अंतरगत 11 सकंद इति अध्याइप चुकदेव जी और परिक्षीत के बीच में जो समवाद है उसमें अभी नारद मुनी और वसुदेव जी उनके बीच में सुम्बार चल रहे हैं नारत भुनी वसुदेव जी के वहां पदारे है। वसुदेव जी ने अच्छी तरह से उनकी आगता स्वागता की धन्यवाद किया भभीवादन किया बाद में जब उन्होंने देखा आपकी नारत मुणी अत्यंता प्रसन है। और जिनके रदे में सादुवों के प्रति अपार आदर है,
प्रेम बाव है। श्रद्धा है ओब शर्दा प्रगट बेकी नोने प्रशंसा भी की सादुवों की सत्पुरुषों की वहाँ पुरुषों की और कहा के इनका आग्बन हमेशा जीवों के कल्यान के लिए हैं। तो अत्यांत प्रसन हैं वसुदेव जी। देवर्शी हमारे यहां पदारे हैं तो इसका मतलब है अवश्य हमारा कल्यान होगा। साधु पुरुषो का पायदा कैसे उठाना चाहिए?
कैसे उनका लाब मिलना चाहिए?
पाइदा उठाना मतलब?
उनके संपर्क में आये हैं,
तो हमें क्या सिखना चाहिए,
क्या उनसे लाब लेना चाहिए। उच्चतम् लाब। जो दूसरी जगसे समसार में कवी हमें नहीं मिलता हैसा लाग है। देवा अदु तो है ही लेकिन खास करके ग्रियान के संदर्भी ग्न्यान दुख का कारण है,
बंदन का कारण है इसे लेव मर्यादा परवस्ता में से बाहर निकलने के लिए उनका मार्दशन जैसे शंकराचारी जी माराज समझाते हैं भवातरण नोका भवातरने नोका तज्जन संगतेका। त्री जगते सजजन संगते का पवास भवार भवस्तरने नवका भवार नवस्तरने नवका भावा आरणाव। जंगल है समसार का वन में से समुद्रा है न समुद्रा है उन में से समसाल समुद्र से निकलने के लिए पार करने के लिए प्रिजगति सज्जन संगति एका एक मात्र सच्चंग ही उपाय है समसार समुद्र को पार करने के लिए वो सप्संग के लिए भी सब पुरुष पसानिक दे चाहिए महापुरुष्यों का सानिद्य चाहिए,
संतपुरुष्यों का सानिद्य चाहिए। और वो हमें जिस रास्ते पे ले जाते हैं,
जो मार्क दर्शन देते हैं,
उनको शर्दा पुरोख हमें अनुसरन करना चाहिए। तब ही फाइदा मिलेगा,
अली शरौन करके हम संतोष लेके हां,
हम तो शरौन करते हैं,
ऐसी बात नहीं है। उनकाल जोभी उपदेश है,
उपदेश को हमें अपने जीवन में उतारना पड़ेगा। अनुसरन करना पड़ेगा तो वसुदेजी उनके लिए उसके लिए वो सबके लिए तयार है अपनी चिंता व्यक्त करते हैं,
अपना दुख भी व्यक्त करते हैं। कोई तो कबूल करते हैं इतरी लोग नाते बगुआ परमात्मा स्वयम द्रिलोक के स्वामी स्वयम मेरे यहां पुत्र के रूप में बदारे हैं जन्मल लिया है और मेरी वही आकांख शाती मेरी इच्छा यही थी। मेरी प्रार्थना दी तो भगवान ने वो प्रार्थना तो नहीं। और बगवानने मेरी जो इच्छा दी वो इच्छा पूरी की। बगवान मेरे यहां पूर्ण परमात्मा मेने यहाँ अवतर ही तो है लेकिन तब भी मैं दुखी हूँ। तो अभी उनको समझ में आ रहा है,
परम भक्तों तो थे ही,
शुद्ध चरितर ही थे,
उनका अंतकरण भी अत्यंत शुद्ध था। लेकिन फिर भी शोक नहीं गया था उन में से तो उन्होंनें सोचा होगा कि ऐसा क्यों है जीवन में?
जब इतनी बड़ी श्रेष्ट सिद्धी मैंने प्राप्त कर ली। बगवान खुद मेरे यहां पुत्र के रूप में होता रहे। तब भी मेरे रदे में जो शोक है,
उसको कैसे दूर किया जाया,
उसका क्या हुपा है?
और उसका उत्तर हो नारत मुनी से प्राप्त करने के लिए उनके उनसे प्रात्ना करते हैं। पिर नारद मुनी ने समझाया उनको बजरतिये यता देवान। देवा अपित तेवतां चायेवर कर्मसवचीवाहा साधवः धीनवच्चलाहा। अंतमे वसुदेव जी ने कहा की देवताओं में और सत्त पुरुषों में सादु पुरुषों में क्या अंतर है?
देवुता पल देने वाले है,
ता भी सिद्ध है उनकी पुजा करने से,
उनकी आराधना करने से,
यगने याग अधी करने से देवता भी हमें अपने अच्छे कर्मों का सत्कर्म का फल जरूर देते हैं। लेकिन देवताओं के मरियादा क्या है?
तो केक तो हम हमें कर्म करना पड़ेगा शास्त्रोक्त करम का अनुष्ठांग में करना पड़ेगा। और अपनी कामना को ध्यान में रखते हुए। जब हम ऐसे कर्म करते हैं,
भले पुन्य कर्म हो,
सत्कर्म हो,
तो उनका फल हमें देवुताओं के माध्यम से अवश्य प्राप्त होता है। तो हमारी इच्छा है जितना हम चाहते हैं जिस मात्रा में और ऐसा क्यों है क्योंकि हमारी समझ ऐसी है जैसी हमारी समझ हो जैसे हमारे चित्त के अवस्ता अमारी आंतरिक उन्नती मन की चित्तकी जैसी अवस्ता है उससे साब से हमारे मन में कामनाएं उठती हैं। उसे निष्टो दाए के हम क्या बरातना करते हैं हमारे बुद्धे क्या उनके मरियादा कहां तक है,
कहां तक हम सोच सकते हैं अपना कल्यान के लिए जगत में कौन सी उत्तम वस्तु है संपदार्थ लाबाद न अपर लाबा असती। ऐसा अगर हम समझ सकते हैं यही जीव की प्रार्थना है असतो मा सद्गमय तमसो मा जोतिर गमय,
मृत्योर मा अमृतं गमय। तो अमरुत के प्रार्थना,
ग्रहान के प्रार्थना और जीवन की प्रातना,
अस्तित्व की प्रातना ये हमारी एक मात्र जंकनार सर्वप्राणि भूत के रदे में यही एक प्रार्थना है। वो समझते नहीं है,
उनको पता नहीं है कि मैं ये जाता। क्योंकि संस्कार के जो जो कामना उठती है उसको ही हम सच मान लेते हैं। और हम समझते हैं बस यही मेरी चाप दर्वासिरेष्ट इसके बिना तो मेरा जीदा कुछ काम का नहीं है। अगर मेरी चाय पुरी नहीं होई तो मेरा जीना जीना नहीं है,
बस पृत्य के समान है। ऐसे हमारे मुझे सोचते हैं। लेकिन जिस मुद्धी में परी पक्वता है इस चित्तमे परी पकौता है। बगवान के परती शरद्धा है। और देवी संपत जहाँ है वहां विवेक करने का सामर्थ्या है। ऐसे जो सादु पुरुष है,
वक्त है,
सादक है वो जब भगवान के पास मांगते हैं। और उसको पता है कि जो मांगेंगे वो भगवान देने वाले है ही,
तो हम क्या उपतं चीज मांगे?
तो अगर उन्होंने पैचान लिया कि हमारे रदाई की एक ए मातर जंकना है। वह बोलना ताक है। जैसे उपनिश्यत समझाते हैं कि जीव की जो इच्छा है सत्यम। न्यानम् अनंतम् ये इच्छा है सतो मा सद्गमय तमसो मा जोतिर गमय अमृत्योरमा अमृतम् गमय ये जो हमारी प्रार्थना है ये वास्तव में ब्रह्म के ही प्रात्ना हैं। क्योंकि सत्यम् ज्ञानमनंतम् ब्रह्म ये सवाब्र मकाई है। और मकामत लब्बरमात माका तो हमारे इतने उत्तम इच्छा है फिर भी हम उस इच्छा को पहचान नहीं सकते। बस यही एक दुख की बात है। इसलिए हम संवसार में सड़ते रहते हैं जन्ममृत्यों को प्राप्त करते रहते हैं जिस तीन हमें ये अच्छी तरह से,
स्पष्टा रूप से یہ سمجھ میں آئے گا ये तो बुर्णता की इच्छा है,
परमात्मा की इच्छा है। कर ये इच्छा पुरी हो जाये तो फिर हम हमेशा के लिए बंदन में से मुक्त हो जाएगे। ऐसा अगर कोई व्यक्ति समझ सकता है तो वो रोज भगवान को ऐसी प्रातना कर सकता है। भगवान हमें जणान दिजिये,
भगवान हमें पूर्णता की प्राप्ति कराये। हमें मोक्ष प्राप्त कराईए। ऐसी उनके प्रात्ना रहेगी। ये स्तित्ती वसुदेव जी की है इसलिए वो कोट करते हैं कि हमने भी ऐसी कामणा की थी और देवताओं की कुरुपा से हमें वो फल मिला हमारी कामणा पूर्ण हुई लेकिन फिर भी हमारे अदय में जो दुख है विशाद है शोक है پسکا کیا ہوتا رہے और वो जानते हैं कि देवता तो ये इच्छा बुरी नहीं कर सकते हैं। तालोगों के भी मरियादा हैं। देवान बजनती ये यता दिवान बजनती तास्त धयव इवा हाफी हम जिस प्रकार देवताओं को बचते हैं,
बतलब जिस कामणा से,
जिस उद्धेश से हम देवता की आरादना करते हैं,
जिस मात्रा में हम उनकी पुजा आरादना करते हैं,
और हमारी जो कामणा है,
उस कामणा को द्यान में रखे ही देवता बचते हैं। पल दे सकते हैं उससे ज्यादा वो नहीं दे सकते हैं क्यों?
तो करवा सजीवा हाँ वो तो कर्म के जैसे नौकर है। करमोका अनुसरन करने वाले इसा हमारा कर्मा है उसको द्यान में रखकर ही वो फल दे सकता है। चाया इवा जैसे हम जहां जाते हैं वैसे हमारी चाया उस प्रकार से जैसे उमरे कर्म है उसी साफ से उनका पल भी होता है। पादवः सादवाहा जो है,
सादु संत है,
संत महात्मा है,
महरश्य है,
वो तो कैसे है?
वो कर्म सजीव नहीं है। उब भवान कैसे जीवे?
और दीनवचसलाहा। उनके रदे में अपार करुणा बसती है। तो वो कर्मा के तरफ नहीं देते हैं,
हमारे कर्मा चाहे कितने भी उरे हो उर्वा में वो कर्मों को द्यान में रखके हमें फल नहीं देते। वो हमारी प्रातना अवश्य सुनते हैं। प्राक्षिना होनी चाहिए बस इस रदे में जिस जिव के रदे में ये भगवान के प्रती भगवान के लिए प्रातना होती है। उल्लता के लिए प्रार्थन होती हैं। कोई भी बिशे में प्रातना होती है तो अगर वो सज्जनों के पास जाते हैं संतों के पास जाते हैं सादु पुरुशों के पास जाते हैं क्या देवताओं के पास जाते हैं?
असकर करके यहाँ सादु की प्रशंसा कर रहे हैं। क्योंकि नारद मुनी सांते मुनी हैं। इसलिए हमें समझा रहे हैं। इजिस सादक के रदे में भगवान के परती अपार शद्दा है,
भगवान को प्राप्त करने की आकांख्षा है,
दुख में से हमेशा के लिए मुक्त हिन होने की इच्छा है। तो उनके मन में पादों के प्रति हमेशा आदर होना चाहिए। श्रद्धा होनी चाहिए और उनसे यही प्रार्थना करनी चाहिए तो अवश्यद और संतबरुष्या मारे प्रार्थना सुन्ते क्योंकि धेनवत सलाहा दिनों के प्रति हमिशा वाथ सल्यबाव रखने वाले ये सचन सादु संत हमारा कुछ पूर्वा का जो भी चरितर हो,
पूर्वा के करम हो,
उसके दियाल में नहीं रखते हैं,
केवल हमारी स्थिति के उपर कृपा करके और हमारी श्रिद्धा के हमरुख हमें मारा कल्यान हो,
ऐसा ज़रूर हमारे साथ वो विवाग करते हैं। उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है उनकी कृपा होती है इस अनुकम्पा अपनी तरफ प्रगट हो नारंगोनी के रदे में इस प्रकार से वो संतों की सादु पुरोशों की प्रेशंसा भी करते हैं और जो सच है और वो जानते भी है मैच्योर है परीपक्व है इसलिए निखालस्ता से वो उनके प्रती फिर्दा आदर के साथ वो प्रार्चना करते हैं कि हे मुनी जना,
हे सादू जना जिनों पर रुपा करने वाले धीन वच्चल आप लोग हैं तो मेरी ये प्रार्चना सुनिये मैं आप को एक प्रेशन कर जाओ रम्मः सतापि पुरुच्छामः धर्मान् भागवतान्स्तव जान्चुत्वाश्रद्धयामर्त्यह मुच्चते विश्वतो भयात साथ वेश लोग में वसुदेव जी कहते हैं ब्रह्मन ए ब्रह्मन देवर्शी मुणी को ब्रम्मन करते हैं,
ब्रम्मन मतलब परमाद्म,
परमेश्योर,
ब्रम्मन ततापी का अर्थ करना चाहिए आगे कुछ कहा गया है। आगे समसा की गई साधु पुरुषों की उनका आगमन मातर सल्यान का कारण बन जाता है। तो वो ये तो महिमा है ही कि दर्शन मात्र से ही हवाबंदन कट जाते हैं दुखदारिद्रे सब मीटे गयोरी। तद गुरु घराई तो कदारितर्य सबका नाश हो जाता है। एतो है ही तथापि का मतलब ये है कि देपी आपके दर्शन मातर से शर्मात्र से ही मैं पवित्र हो गया हूँ। तटापी अपका धर्शन का फल तो मुझे मिला ही है,
मैं बहुतर तो अवश्य हुआ हूँ तताभी। हाप से धर्मान भागवतां भागवत धर्मों के वीशे में पुरुच्चा में पुरुच्चा महा अपने आप के लिए वो बहु वचन का प्रयोग करते हैं पृच्चा महा पृच्चा में एक वचन लेकिन अपने आपके सो रुपा है इसलिए वह वचन का प्रयोक कर रहे हैं। पुछा महा हम आपसे ये पूछ रहे हैं। हम आपसे जानना चाहते हैं। क्योंको पता है मैं एक ही जानना नहीं चाहतू मेरे माध्यम से हने को कि ये जिग्ञासा पूर्ती होगी तब के मन में ये मतलब काफी जो सादक हैं चुद्ध चरित्र है,
चुद्ध चित्त वाले देवी मुक्षलोर है,
उनके भी ये प्रार्त्रा होगी। उनकी भी है जानने की इच्छा होगी। इसने वो पुर्चामहा ऐसा कहते हैं। मैं आप से भागवच धर्मों के विशे में ऊचना चाहता हूं। भागवतान् धर्मान् प्रच्चामह जान शुट्धा यान शृद्धया शृद्धा अगर कोई भी व्यक्ते पूर्ण शृद्धा से इसको सुन ले छने देया है अन्छुता परंश्रिद्धा से अगर उनका श्रुवन किया जाये। इतना महत्तपूर्ण इस प्रकारकाश्रवात पूर्ण शुद्धान से,
प्रेम से,
आदर से अगर व्यक्ति ये भागवत धर्म को सुनते हैं,
सुनते हैं मतलब समझते भी हैं समझते इतना इने ही अपने जीवन में वो आत्मसात करते हैं। उसका अपने आप अपना सुभाव परिवर्तन होता है,
तो सुभाव परिवर्तन होता है,
तो कर्म में परिवर्तन होगा,
विवार में परिवर्तन होगा,
उसका नाम आच्रण है। इसलिए पहले अपनी समझ बदलनी चाहिए,
फिर वो समझ जब परिपको हो,
स्तीर हो जाए,
फिर अपने आप,
अपने विवार में वो प्रगट होता है। पर उसके लिए अच्छी तरह से प्रेम से,
स्वधा से,
आदर से उसका शरुवन करना चाहिए। इसलिए कह रहे हैं यान शुरृत्वा यान भागवतान धर्मान शुरृत्वा उनको प्रेम से शरुवन करने के बाद मत्यः विश्वतः भयात्मुच्यते मर्त्य है,
मतलब जीव,
जो अपने आपको मर्त्य समझ रहा है,
मर्त्य है नहीं,
लेकिन अंग्लियाम के वश्च मृत्यू को प्राप्त करता रहता है। ऐसा मरत्य जीवात्मा जो अपने आपको जीव समझता है ऐसा प्रिक्ति विश्वतह बयात बुच्चते। सर्वतः विश्वतः सर्वतः विश्वतः मतलब सर्वतः तब प्रकार के भई से मुक्तो हो जाता है संसार में जितने भई हैं उनसे भागवत धर्म का शरुवन करके बड़ें त्रुप्टी होंदी और वो तुरुपते ही आत्मसंतोष इसको बोलते हैं इसका कारण है कि आत्मदर्शन भागवत दर्शन,
मतलब आत्मा के दर्शन,
उनको अची तरह से समझ के,
अपने आपके स्वरुप के दर्शन होते हैं। तब पुर्ण संतोष की अनुबुति होती है। और फिर जन्ममरुत्यों से व्यक्ति परोट जाता है,
जन्ममरुत्यों के बंदन से वो मुक्त हो जाता है। अहम् किलपुरानन्तम् प्रजार्ते भूतमुक्तिदम् आपुचयन्नमोक्षाय ओंहितो देवमायया अम्रा नहीं चल ले चल ले आठ नंबन लाज़ लोग थी आठ नंबन मारा मा टैबलेट चे कुछ तक नधी एकादश वीडियो अधियार 12 मुख पालों हैं अहं किला पुरानन्तं प्रजारते भूई मुक्तिदं अपुजयन। अपूजयन वसुदेव जी कहते हैं मैंने भगवान की प्रार्थना की उनका उनके आरादना की कब प्रार्थना के पुरा पुरा मतलब बहुत पहले हम किला पुरा अपूजयन अगर इंटे हो आनंतं मतलब पर मार्क मार्क। अनन्त धर्म जिसका है,
सवभाव जिसका है,
तो ब्रह्मय परमात्मा है। परमात्मा के भुजा मैं ने परमात्मा के पुजा के अरतार आराजना के लेकिन उस आराधना का बराजन क्या था?
बुक्ते दम विशेशार वसुदेव जी यहां लगारे अनन्तव मुक्तिरम् परमात्मा कैसे पुक्त परमात्मा जो अनन्त है जिन में कोई मरियादा नहीं है जो बोलना है और जो मुक्ति दा,
हम मुक्ति देने वाले जिनका सवभाव मुक्ति देना यही है। देना ही जिनका सुबाव है। परमात्मा काम हमेशा देना ही है। कुछ लेते नहीं हो,
क्या लेंगे?
सब उनका ही है। और सब वही है,
तो किस से क्या लेंगे भगवाँ?
तो भगवान का तो सुबाव देना ही है,
सब कुछ देगा,
जो चाहिए वो देगा.
इसलिए विश्व में ब्रह्मानमें एक तथास्तु महा मंत्र चलता रहता है। हम जिसकी भी कामणा करते हैं,
आज नहीं तो कल वो कामणा अवश्य पूर्ण होता है। तो वसिदे जी कह रहे है कि मैंने ऐसे मुक्ति दं,
जो मुक्ति देना जिनका सुभाव है और जो अनन्त है सुभाव में.
इसे परमात्मा की पुजा की मैंने आरादना की। मैंने क्या कामणा थी?
मैंने अपने कामणा पूर्टी के लिए। क्या कामनाती प्रजार थें प्रजार की प्राप्ति के लिए प्रजा की प्राप्ति की पामना मनुश्या के रदे में होती है लेकिन वो संस्कार वश्व प्रजा की कामना,
धन की कामना,
जो भी कामना है। ये मुझे प्रेकर अलावा जितने भी कामना है हमारे अन्धरमोड तेर ये सबी की सबी कामना है संसाव के अनतर बोते हैं। मतलब वो हमारे सही कामणा नहीं है इसलिए श्रवन का फल क्या मिलना चाहिए,
सर्थन का फल क्या होना चाहिए हमारे रदे में दिरे दिरे करके एक दिन हम अपनी वास्तविक कामना है इसको जंकरा बोलते हैं उसको हम पैचान सकते हैं। जिस तिन हमने उसको पैचान लिया.
ये तो बुद्धी से तो हम बोलते रहते हैं,
सुनते रहते हैं,
लेकिन हमारे निष्चे थोड़ी ऐसा होता है.
हमारा मन समत नहीं होता है। मन तो अपनी कामणाव के पुर्ति में ही लगा रहता है। बुद्धी में बले। हम कितना भी जानते हो जिगन्यासा चाहिए,
मुक्षतन चाहिए,
साधन चतर्ष्ट संपत्ति चाहिए। उससे वो बोलते रहते हैं लेकिन जब मन खुद अपने आप एसना डिक्लेर करें,
गोशना करें। मुझे कुछ नहीं जाएगा न कांक्ष विजयं कृष्ण न चराज्यं सुपानी चर। राज्य चाहिए,
सुख चाहिए,
भोग चाहिए शब्द नहीं रहना चाहिए,
मन अपना जब कोड़ व्यक्त करें अपने आप से कि मुझे कुछ नहीं चाहिए,
मुझे इसमें अभी कोई रस नहीं है। और ऐसे स्थिति तो गब दुख होता है तबी मनुशे के अंदर तो नहीं होती है लेकिन वो तो मशान वेराज्य जैसा है। विवेक के द्वारा अगर ये समझ में आ जाए कौन साभी वेक?
कि सर्वसुक्षणिक है ऐसा विवेक नहीं वो तो ठीक है उसमें तो कोई बड़ी बुद्धी की जरूरत नहीं है,
इतने सुक्ष्यों बुद्धी की जरूरत नहीं है,
वो तो कोई भी व्यक्ति समझ सकता है क्योंकि वो अनुबोब में भी होता है। लेकिन मेरे रदे की इच्छा अपने रदे की जो गहराई से जितनी इच्छा है एक ही इच्छा है,
एक ही कामना है इसको बोलते है पूर्णा पूर्ण की कामला आप तक कामः हा आत्म कामः हा आत्मा की कामणा हमारे अंदर है बासतो मैं तो इसको हम बोलते हैं सत्यम। सत असतो मा सत गमया समसो मा जूतिर गमया बृत्योर मा अम्रुतमु गमया। ये प्रेरम करते रहते हैं,
प्रार्तना हम रखते रहते हैं इसलिए कि एक दिन हमें समझ में आए तो कम से कम बोलने से तो हम अभ्यास चुनु करें,
फिर एक दिन समझ पाएंगे कि बात तो सही है। मेरे अंतर में तो एकी इच्छा है वो शांती की,
प्रेम की,
पूर्णता की। तो यग ब्रह्म के कामणा हुई तभी जीव के अंदर यही काम लगता है। और वेदान्त के विद्याक्त ये भी जानते हैं कि ऐसे कामना क्यों है?
पहला पहला पहला पहला पहला पहला ये समझ रहा चाहिए अच्छी तरह से के अपने रदे में यही कामना है। बाकि जो सब कामना है वो अग्ञानवश है। हम उसका अभ्यास करते आये हैं इसलिए उस उपर उठती रहती हैं संसकारवाशय हमारी वो सही कामणा नहीं है हम उसमें फस जाते हैं इसलिए हम उसको पूरी करने में पूरा जीवन व्यतित कर देते हैं। जनमों जनमों उसके पीछे हम लगा देते हैं। पर इतना शरौन करने के बाद भी व्यक्ति नहीं समझ पाता। इसने कल्या होने में बस देरी होती रहते हैं। इस तीना हम समझ गए। यही मेरी मुक्या कामणा है,
मुक्या इच्छा है। गुरुजी कहता है कि यही इच्छा वोती है इसका अनाधर नहीं करना चाहिए। प्रम्म की इच्छा,
पुन्णता की इच्छा जग दे में प्रगट होते हैं,
तो इस इच्छा की पूर्ति के लिए हमारे जीवन का उप्योग करना चाहिए। तो कहां जाएगे?
ये प्रश्ना को लेकर कहा जाएगे?
वेद का पहला विबाग है वहां तो ये प्रजार थे। संतान प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए तो उसका विदान है,
उसका उपाय उसमें बताया है वेद में भी बताया है इतका पहला विबाग है कर्मकांड विबाग ये हमारी जो भी साहंसारी कामनाये हैं उसके पूर्थे के लिए उसमें विदाम है लेकिन धर्म कैनूसा तो ठीक है,
धर्मकारुष्टान करके करके हम आगे बढ़ते हैं,
जैसे वसुदेव जी के मन में आया आमसे क्या मालका?
मैं मुक्ति मांगता तो मुक्ति भी दे जा जाते बगवान। लेकिन मैंने क्या प्रार्चना की प्रजार थे अपूजयन। मैंने प्रजा के प्राप्ती के लिए,
संतान के प्राप्ती के लिए भगवान से अलाधने की और ये मेरी प्रार्चना थी। मतलब वो पहचान नहीं पाए। कि मेरे ही आवश्यक्ता क्या है?
करम आवश्यक्ता जीन की क्या है?
वो अभी उनका समझ में आ रहा है कि इतनी उज्जटम कामणा के पूर्टी के बाद भी मेरे जीवन में चान्ती नहीं है। दुख है मोक्ष नहीं मिला है मुझे और क्यों मैंने मोक्ष के लिए प्रात्रण नहीं कर। तो ये विववदाप्पे मोही तहां। मोहीता हाँ हमें मोहीता देओ माया देव माया मोहीता हाँ अगर नहीं आज से लेकिन मनुष्य का जन्म ये माया को समझने के लिए। के माया भगवान के वश्महत हम माया के वश्मे हैं माया बभुन के वश्म अगर माया से मुक्ते नहीं पाई,
तो हमें मोक्ष नहीं मिल सकता। मामये वये प्रपज्यन्ते मामये वये प्रपज्यन्ते मायामेतां तरंतिते वसुदेव जी को पता है कि अगर ये माया से मुक्ती पानी चाहिए,
मुक्ती जाते हैं,
तो किसकी शरण में जाना चाहिए?
देवी येशा गुणमैं। मम माया दुरत्यया। देव माया। ये वो तिक्कि देव के माया है। तो भगवान इसलिए कह रहे हैं। ये वो मैई। पेंवी ही एशा बोलमाईं अममाया। मेरी माया है इसलिए देव माया इसके तुरित्याल वक्ते एक बचन है देव मायया देव माया हम मोही तहां पबुल कर रहे हैं कि मैं ऐसे माया के प्रभाव में हूँ। बेबी ओ लेकिन मुझे अभी पता चला है कि ये माया के प्रवाह में से मुक्तभ होना चाहिए। तो क्या उपाई है?
भगवान खुद कहते हैं,
जीता जी में समझाते हैं,
क्या उपाई है?
दुबान कहरे माया मेरी शरंद मयाज्यक्षेण रक्रकिही सुयते सचराचरम् मैं अध्यक्षब हूँ,
मेरी माया है,
मैं उसके अंडर में नहीं हूँ,
वो मेरे अंडर में है। वो मेरे बच्च में है तो सारे दुनिया माया के वश्म है। हम मुक्ति जाते हैं तो हमें इनकी शरण में जाना चाहिए। माया पती की शरण में मां एवये प्रपध्यन्ते मायामेतां तरंतिते। तो इस माया को कौन तर सकते हैं?
جو مہدی چرم میں آتے ہیں तो भगवान के शर में जाने का मार्ग क्या है?
ये जैसे नारत बली उनके घर पदा रहे हैं। तो अभी वसदेव जी को समझ में आ रहा है कि ये परम हित के लिए ही इनका आगमन है,
तो मुझे उनसे घ्णान प्राप्ति करनी चाहिए। और मोक्ष के विशे में प्रश्ना पूछना चाहिए। इनके माध्यम से शरुवन करके और मेरे निमिता से बाकी जीववए भी शबन करके ये जो प्रश्न है,
मोही तहा?
तब लोग मोई वीटे माई आसे और बंदन मेंसे वो बुखती चाहते हैं,
तो उनको भी लाब मिलेगा.
तो यही उपाय भगवान की शरम में जाने की रीत यही है गुरू उपसदन यातो संतों के पास जाना। तेसा प्रशन कभी विद्धे प्रणिपात प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया तद विद्धी प्रणिपात है न परिप्रशने न सेवया तो ये सेवा भी की नारद मुन्य ने वसुदेव जी की वसुदेव जीने नारद मनी की सेवा विकी अच्छे तरह से आपता स्वापता के प्रणिपात नमस्कार किया,
सेवा कियी और प्रश्ण प्रश्ण करना चाहिए तो प्रश्ण कर ले बग्वान केरें तद्विद्धी प्रणिपातेन परीप्रश्णेन सेवया पदक्षंदी पदेक्षंदी ते घ्ञानम जारेंगा सर्वधर्शेंगा ज्यानी नहाई। जो भी ज्यानी है,
सर्वधर्शी है,
अर्जुर अवश्य तुम्हे मार्दुर्शन देंगे। इसलिए उन्होंने पसंदेख जीने नाराज लुप्पी को ये प्रेशन किया। यतावि चित्रव् गसनान् भवन्द्विर् विश्वतो बयार। मुच्चे मयंज सैवाद्वा ततानशाधि सूरत इस उरदा तो नाराद मुनी जो व्रत करने में हमेशा उत्ताहित है और व्रत में ही उनकी निष्ठा रहती है स्थिती रहती है इसलिए उनका विशेशन ये है सुवरत इसु प्रता तथा नशाधी। तुवरत तथा नहशाधी। इस प्रकार से अमे मार्द सुन दीजिये। इस प्रकार से हम अमे उपदेश दीजिये। ये सुवरत नह शादी। आप हमारा कल्यान करिये हमें उपदेश दिजिये। यथा जिस प्रकार विचित्र रसनाद भवदबिर विश्वतो बयात मुच्चेमा। ऐसा उपनेश दिजिये कि जिन के माध्यम से,
जिस ग्नान से,
जिस मार्ध नर्शन से मुच्चे मां,
हम मुक्ति प्राप्त करें। किसे मुक्ति चाहिए?
भयात,
भयमैस इसका बय है विश्वतः सरों प्रकार से जीवन में बय है। बवत बिही मुझेमा आपके द्वारा हमारी मुक्ति हो। इस से विचित्र वैसनात। विश्वतह भयात नाना प्रकार के दुख कर जीवन में। रोज रोज कोई न कोई निमित है किसे न किसे सरुप में दूखा आते ही रहते हैं हम उसमें फसे ही जाते हैं। तो हमें अभी ऐसी मुक्ति चाहिए। हम अपने उपाय से थोड़ी देर के लिए मक्त हो सकते हैं। कही अपना मन दुसरी तरफ लगा दिया,
ये किया,
वो किया। कुछ ना कुछ उपाय करते रहते हैं लेकिन वो समस्या है कभी जाती नहीं है। हमेशा के लिए समस्याओं के निवर्त नहीं हो पाता। और दुख दुर नहीं होता है। एक के बाद एक समस्याएं जीवन में आती रहें। अधिआत्मी का,
अधिबोती का और अधिदेवी का तक जाता है विचारा मनुष्य.
पहाण तक यह सब करता रहें जब तक शरी किता करते हैं उद्धी का सामर्त्य हैं,
समपत्य का सामर्त्य हैं,
वजनों का सामर्थ्य सखार है तब तक मनुष्य लडता रहता है। लेकिन जब शरीर सात नहीं देता है कुछ रोग आ जाते हैं। कुछ अशक्तियां चरीर में आ जाती हैं। मनो बल हो जाता है,
मनो बल नहीं रहता है। बुद्धी सामर्त्य नहीं रहता है। negativity आ जाती है। परवश्ता आ जाती है,
मनुष्य कभी अकेला हो जाता है,
ठक जाता है। लोग भी कितना मुदद करें कहा तक मदद करें वो तो हमें भुगतना पड़ेगा पेडा है वो भी हमें सहन करने पड़ेगी। तो इस समसार लुख से बर्पूर है,
वो लोग समझ नहीं पाते हैं। एक नशा छाया रहता है इसलिए दोड़ते रहते हैं ये कर लिया वो कर लिया बस एक सपर्दार सबके साथ है और ऐसा ही समझते कि जीवन में यही करना चाहिए बस पढ़ाय कर लो केरियर बना लो अपना मकान बना लो परिवार हो,
शादी हो जाये,
बच्चे हो जाये,
उनके भी बच्चे हो जाये,
सब ठीक-ठाक हो जाये,
इसमें ही लगे रहते हैं,
बस.
पता नहीं चलता कब साट्ड साल हो गए,
सिट्टर साल,
सप्टर साल हो गए। और फिर ये हो गया,
वो हो गया निकब में समच मैं नहीं आता है लोगों को पहले लगता है कि अभी से कहा,
अभी से क्यों सच्चन करना चाहिए। समसाब में बग न रहते हैं। फिर जब ठक जाते हैं। तब लगता है कि अभी सचसंग करना चाहिए तो शरीर साथ नहीं देता है करें क्या तब बस जिवन तो इससा ही है सब इतना जल्दी अगर मनुश्या अपने जीवन में अपने कल्यांग के लिए कोई प्रति करें। तो उसका कल्यान होगा उसके माध्यम से उनके जंग्रेश प्रस्तुत्र प्रस्तुत्र पोत्रा पोत्रा देखें। उनको भी मार्गुषन मिलेगा। क्योंकि हम ऐसे पागल की तरह ना जीएं। उसमें इना फसे गए वसुदेव जी की प्रार्थना है कि नाना प्रकार के भुपो से और सब और से,
सब और बयो से। इस समसारसे भयात विश्वतः भयात विकेट्र विसनाद ववद भीही विचित्र वे सनात भयात। अंजसा एवाद्वा,
अंजसा एवाद्वा अब मुक्ता हो जाये ऐसे समसार से दुखा लें अशाश दं पहले में संसार तो दुख माई नी था लेकिन अब तो दुख नहीं था। व्यक्ति थक जाता है तब उनको ये सब स्पश्ट होता है कि ये तो दुखते ही बढ़ा हुआ,
कभी दुख मेंसे मुक्ति नहीं मिलती है। बरह में से मुक्ति नहीं मिलती है। इसलिए वसुदेव जी कह रहे हैं कि हमेशा दुखों से पूर्णा और सब और बहुत से जाते हैं। कमसार से अनाया से ही हम मुक्त हो जाये मतलब बहुत तरालितास बिना कश्चसे तो किसे हम इसम सार्थे मुक्त हो जाए पैसा आपके द्वारा इस मुक्ति प्राप्त हो ऐसा हमें उपदेश कीजिए। कृशुकवाच राजनेवं कृतप्रश्नः असुधेवे नधीमता पीतस्तमाः भेवर्षि हरे संस्मारितो भुने शुक्देजी कहरे हे राजन एवं प्रता प्रेश्ट नहां देवर शहीब धीमता वसुदेवेन कृतप्रश्नह प्रीतः देवर्शिही तम आह तुम सारी तो बड़े ही। तो सारी तहां प्रितः हरेहे हुनेही संस्मारितः प्रितः देवर्शिही। कुरुत प्रश्न हा यसाब विचेशा नारंधनी के हैं राजन तो संभोधन है। राजन मंतलः परेक्षित राजा کیونکہ अभी शुक देवधी परिक्षित जी को याद दिरा रहे है कि एसी कथा,
एसे समवाद हुए नारत जी के बीच में और वसलते हुझे के लिए तो है परिक्षित इस प्रकार जब वसुदेव जीने बुद्धि पूरोक प्रशन किया धीमता वसुदेवेन वसुदेव जी का जो प्रशन था ओ अध्यांता प्रस्चासनिय जैसे विवेख चुडा मनी में शंकराचारी जी शीष्य के प्रिसंसा करते हैं। जब शिष्या मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है कि मैं इस बंदन मेंसे कैसे बाहर आओ। बंदन का स्वरुप क्या है?
इसका कारण क्या है?
मैं जानना चाहता हूँ। तब ऐसा प्रश्ना शीषिय ने किया?
तब गुरुजी प्रशंसा करते हैं। तुम दन्य हो,
कृते करते हो तुमने अपने कुल को तार दिया। कुलै को तेर तारे आड़े इसके गुट्रुम में,
इसके परिवार में फिर कोई अज्ञानी नहीं रहता। उप कैसे भी एक के बाद एक कि जन्म में कुछू पोड़े ही जन्म में उसताब बुखतो जाते हैं ता प्रबाव एगर्यान का जर में एक व्यक्ति ने भी ब्रिम्म घ्रियान प्राप्त किया,
तो गर के सभी प्राप्त किया। परिवार के सब्यत धीरे धीरे उस यात्रा में आगे जाते हैं परिवार के जुरुपार से का महत्व है अध्यात्मका तो इताग दिमान वसुदेव जी ऐसा उनका प्रश्न है दी मता वसुदेव ये न उनके द्वारा वसंद युजिके द्वारा बुद्धिमान वसंद युजिके द्वारा कृतप्रश्नः जो प्रश्न किया गया है जिसको प्रश्न किया गया है वो देवरशी। उसके क्या स्थिति है?
करेहे उड़ेंगी संस्मारी तहाँ वो अपने आपको क्या अभी अनुबोग कर रहे हैं अपने बारे में?
क्या अनुबोग हुआ आई ये प्रश्न सुनकर?
तो उनको भर्वाण के जो भी गुण है वो उनके चित्त में प्रगट हो। सुनस्मारी तो बुले ही वाले क्लिप रिया है और याद दिला दिये अपने बगवान की बस प्रसंद हो गये प्रितः सेंत प्रसनोगायफ अर प्रसनतास तम आहा पसंद होकार होकर उन आवची को अभी कह रहे हैं। शुरी नारदवाच सम्यगेतव्यवसितं भवता सात्वर्शव यत्पुच्छसे भागवतान्धरमान् तमिश्वभावनान् सारा जी बोले हवता प्रवासिता साथ वर्षब हे यादवश्रिष्ट हे साथ वर्षव नारज्जी बोले हे यादव श्रेष्ट हे साथ वर्षब सम्यत एक विवनसितम भवता। सुझे से वसुझे उठी प्रसन वसुदर्जी के प्रशन से प्रशन से हे प्रसनन हुए तो खुद उनके मुक से अभी वो प्रसंसा वयक्तर कर रहे हैं ये साथ वर्षब मतलब आप या दो में श्रेष्ट रादवों में श्रेष्ट हैं वसुदेव जी आप रादव श्रेष्ट हैं अब सारे यादोगो का कल्यार हो जाएगा यादवश्रेष्ट साथ वर्षब इतत भवता सम्मे भवसितम् ये आपने अच्छी तरह से निष्चे कर दिया इसको बोलते है साथ पर यह निष्य है। इस भी जो भी सप्सन है वेदान तका और जो भी हम शरौन करते हैं,
मनन करते हैं,
अध्यान करते हैं,
उसका फल होना चाहिए साथ पर या निष्चे?
अद परनेश चैम अद लोग एक ही काम है जीवन में एक ही काम है बस जाएं आप कोई भी अवस्ता में क्यों ना। ब्रह्मचरी अवस्ता में हो,
व्रस्त आशरम में हो,
वानब्रस्तमें हो। जुवन के कोई भी पड़ाव पे आप हो। कही भी हो,
किसी विस्तिति में हो,
गरीब हो,
दन्वान हो,
किसी विस्तिति में हो विमार हो सहस्ता हो उसत्री हो पुरुषो चाहे कोई भी अवस्ता है। इसी वी रूप में आप हैं। लेकिन मनुष्य के जीवन में इतना समझ में आ जाना चाहिए। मुझे क्या करना है तो इसका उत्तरह कुछ नहीं करना है। कुछ नहीं करूँगा और जो भी करना है हो किसके लिए करना है?
मैं अपने मैं अपने सत्य स्वरुप को पईचान सकते हूं। उसको नहीं जानना उसके विश्वरती ये एकी समस्या है। You are the problem.
ये समझ में आ जाना चाहिए। पुतात पर या निष्चे के?
जब अग्र्यान ही समस्या है तो करने का तो प्रश्ना है इने करने के वृते ही अग्ञान में से उत्पन होती है इसलिए कुछ करके अभी मुझे ना तो दुक दूर करना है। कुछ करके ना तो मुझे किसी चीज की प्राप्ती करनी है। और कुछ करके ना तो सुख मिलते हैं। मुझे प्राप्त करना सुख के लिए कुछ कर्म नहीं करना है,
सुख की प्राप्ति के लिए कुछ कर्म नहीं करना है। रुख के निवरत्ते के लिए कुछ कर्म नहीं करना है। क्या करना क्या है तो कि ये सब का जो कारण है उसको दूर करना है कारण एक ही है अपने सरुपका अगन्यान अगर मैं अपने आपको नहीं जानती हूँ,
मेरे सुरुफ को मैं नहीं जानती हूँ,
तो कोई भी जन्म इतने भी जन्मले हैं तभी जन्म में प्रश्न रहेंगी। नहीं जानना वो ही एक समस्या है। पाकि सब बगवान करते हैं बगवान के द्वारा ही हो रहा है सब वो तो हमारा पागल पन है,
मुझे ये करना चाहिए,
मेरी ये जवाबदारी है,
मुझे ये हो,
सब अपनी एक स्थिति है। ज्ञान तो यही प्राप्त करना है कि सब कुछ भगवान ही कर रहे हैं। तो मुझे क्या करना है?
भगवान ने किसले जन्म दिया है?
मेरे अग्ञान का मुझे परेचै हो मैं आपने प्रश्ना को सबद सको कि मेरे बुद्धी में अग्ञान है,
अग्ञान के सिवा कुछ नहीं है। इन्यान में सिर्फन भुआ सुन्सकार यही मेरी प्रापर्टी है। मेरी चित्ते में वोही सब बरा है। उसको दुर करने के लिए जीवन है। पुरा जीवन तो ये संसकार जमा करने में हमने उसका उप्योग कर दिया। तो ज्ञान का तो ब्याफ्य किया है। इसलिए बंदन का स्वरुप बढ़ता गया। बंदन को हमने द्रट किया है। सबको पता नहीं है ये बात वनुष्य क्या कर रहा है?
ग्रेहां ग्रड कर रहे हैं इसलिए जिस मनुष्यों को ये समझ में आ जाये ये तो बलत रास्ता है। को ताक पर ही निच्चे कहते हैं तर क्या है?
ले शुपी पास जाना चाहिए शास्तर के पास जाना चाहिए गुरू के पास जाना चाहिए तो हो जो एक मात्रों पदेश है। समसारी नासी संप्रुणासी सत्तमसी तो ये एक ही उत्ताने उसका तुम ही उत्तर हो। तुम प्रश्न हो जब अपने आपको नहीं जानते हो। आप अपने आपको नहीं जानते हैं आ नहीं जानते हैं ये तो अकिकत है अगर नहीं जानते हैं ऐसा नहीं,
नहीं जानते हैं,
नहीं जानते हैं यही प्रश्मा तो उत्तर क्या है,
अपने आपको जानो,
अगर किसी ने,
अगर आपने अपने आपको जान लिया जीवन में सब समस्याहों का अंत आ गया है। इसलिए ये निष्चे होना बहुत बड़ी बात है भगवान के कुरपा कहते हैं उसको तो वसुदेव जी के उपर भगवान थी कुरुपा हो गए। भगवान ये तो करेंगे न। जब भगवान की प्राप्ती उनोंने की,
उनके घर भगवान पदा रहे है। बगानी तातों सो चेहें गए मेरे पिता है उन्हांने भक्ति बाव से रैंप से मेरे लिए प्रार्चना की थी?
तो उसको पता नहीं था कि मोक्ष क्या है,
लेकिन मेरे लिए प्रात्ना की थी,
तो मेरा कर्तव है,
मैं पुत्र हूँ। पिता को मुक्ति दिलाने चाहिए। इसलिए नारत मुणी को बेजाए नाराद मुणी को शोगे परसे नोगे और उनका उनकी प्रसंस आ कर रहे हैं वसुदेव जी रिया दूसरेश्ट सम्यत् भवता विवसितम् ये तो आपने बहुत बड़ी बात की हैं आपका यह विचार बहुत उप्तम है पाथ इपके आप संसार को पवित्र करने वाले भागवत धर्म हमें पूच रहे हैं। तो वसुदेव जी का तो काम ही है यही है। बर्मात्मा के गुणगान करना,
भगवान के बारे में कुछ बोलना। देश करना यही देख मातर काम है। और वो तो परंब दोते है भगवांतु बगवान का स्वरुप जो जानते हैं बगवान प्रैम स्वरुप है। जो उनको जानते हैं तो वो प्रेम से बर्पुर उनका रदे होगा। इले नारद मनी अच्यंद प्रैम से उल्ला प्रैम से जब स्वृति उनके रदे में ताजा हो गए। सो स्पारिदो रहे गुडई ही। तो मैं तो अभी मेरे स्थिता ऐसी है वर्मातमा के कुण आपको यादा आगए। चलो चलो उनका रदया प्रैम से बलपूर तो वो तो उत्सोक है भगवान के गुण गाने के लिए भगवान के बारे में कुछ कहने के लिए इसलिए वो कहते हैं प्रशन से ही खुश हो गए कह रहे हैं यत पुरुच्चसे भागतान धर्मान पंविश्वभावनान। यत पुरुच्चसे भागतान धर्मान पंविश्वभावनान। यत पुरुच्चसे भागतान धर्मान पंविश्वभावनान। विश्व का भी कल्या होता रहे हैं। बात तो सही है बसुदेव जी तो किस जमाने में थे और ये कौन सा जमाना है इतने युगों के बाद जब मनुष्य के लिए यही एक भागवत धर्म उत्तर है। इसलिए हमारे धर्मकों सनातन धर्मक हैं। क्योंकि कोई भी युग क्यों न हो। उत्तर को यही है,
सबके यही है उसमें कोई बदलाव नहीं आ सकता यह अच्छत है धर्मा सनातन धर्मा और सबका स्वरूप है। नहीं जानना एक ही समस्य है,
इसलिए जब हम अपने आपको जानते हैं,
तो जानने का उपाई भी वही है,
सरुभ भी वही है.
इसलिए उपदेश तो वही चलायेगा,
इसलिए ये उपदेश को भगवान शुरु कृष्णा गीता में कहते हैं कि अरजुन ये पहली बार मैं तुम्हें ये उपदिश नहीं कर रहा हूं। सुर्या को भी मैंने यही उपड़ेश किया था। सुरिष्टे हे प्रारम सुरिष्टे के प्रारम में मैंने यही उपदेश किया था। दुले नाराण को बेरे उनसे आगे परंपरा चली जो उपदेश मैंने हरे नारण को दिया था वह विवस्वान मनवे प्राह मन वाई,
मनोईक श्वाक वे,
अपरवीत ऐसी जो परंपरा चले तो वही उपदेश अरजुन मैं तुम्हे कह रहा हूँ मैं कुछ नया घ्यान उपन नहीं कर रहा हूँ कुछ नई बात तो मैं नहीं बोल रहा हूँ,
यही उपतेश है,
का मतलब ये धर्मा सनातन धर्मा है,
ज्यान भी सनातन,
इसमें कोई परिवर्थम नहीं है,
उपतेश तो यही है.
वह सुदेव जी को मिला वसो देवजी ने जिन विसकारम,
मोक्ष प्राप्त किया। अर्जुन को वही उपदेश मिला,
अर्जुन का कल्यान हुआ। वसुदेव जी को कहा से प्राप्त हुआ नारद मुनी से तो नारद मुनी का कल्यांग भी हुआ भी उपते से नारद मुनी ने किस से प्राप्त किया सनत कुमारों के पास हैं उन्होंने कहा से प्राप्त किया दक्षिया मुर्थी बवान से?
तो ये सारी परंपरा यही एक ग्डान जो सनातन धर्मन्स को बोलते हैं। सब तयस्ट यहां भी है उनका उपदेश एक बुद्धी मेंसे दूसरी बुद्धी तरफ पर प्रावाच्यस्ट ग्र्यांका ऐसे पवित्र करने वाले भागवत धर्म एवसुदेव जी आप मुझे पुछ रहे हैं। तो ये मुझे आपका प्रशन तो बहुत ही बाया। श्रुतो नुर्फटितो ज्यातः आद्रुतो आनुमोधितः सध्यस्पुनाति सध्धर्मः एवविश्वत्रोकि सुरृता प्यो ये भागवतान धर्मान विश्व भावनार,
विश्व का कल्यान करने वारा क्यू है?
सब जिवों का कल्यांग क्यों होता है इससे क्या फल है?
कहरें शुर्तः अनुपटीतः,
यातः,
आग्रुतः वा अनुमोधीतः तत्यह पुनाति देव विश्वत द्रुहो पिही। तो हेवसुदेव देवा देवशब्दारो सम्बोधन इसका सम्भादर है पस उदर्भी इवसु देव ये भागवत धर्म कैसा है?
तक खालू.
विश्वद्रोगः अपिही पुनाते सद्धर्मः सद्ध्रह सद्धर्मः पुनाते या भागवत धर्म तदकाल ही विश्व के द्रोही को भी पवित्र कर देता है विश्वद्रुहः अपी मुनाती,
मुनाती मतलब पवित्र कर देता,
इसको विश्वद्रुहापी,
जो विश्वद्रुही है कुछ दुषकर्म करने वाले हैं,
विश्म को दुख पहुंचाने वाले हैं,
कुछ पापी जीव हैं,
उनका भी तुरन्त कल्यान करना चाहते हैं। तो ये अमरुत के समान है सद्धः पुनाति किसी को भी वो पवित्व कर देना वाला ये धर्म है सद्धर्म कैसा उसका सरुप है और ये धर्म का अनुष्टान कैसे किया जाएँ शुरुमतः मुझे अगर पवित्र होना है दर्म का अचर करना है तो उसे जानना पड़ेगा.
जानने का उपाई क्या है?
श्रुतः तः अतलब श्रौनत एवसुदेव जी इस तनातन दर्मकाशरवाण तिरुसका पठल उसको रखते हैं याद करना शावाण पठं स्मरंग सेंदन करना आदर,
उनके परती आदर करना अथ्वा अनुमोधन किये जाने पर जार करो ये तो अनुमोधन की बात आ गई। नुमोदर मतलब क्या?
नूवारदन अभी तो हमें अनुमदन के लिए किसको किसका आबार प्रगेट करना चाहिए। अन्लाइन सेस्टर में हम किसका आबार प्रगेट करें। टेक्नोलोजी का प्रेपास जो विसासं साधनेवसका अनूगोधन का मतलब है कि पहले के जमाने में अभी भी इतनी है। जब बिफ़ोर कोरोना हम जहां जहां भी सचसंग करते हैं तो किसे ना किसे किसे ने इसे की सेड़ा भी जहां जहां पर भी हमने सट्संग किया वो सब ने हमें आप हमारी जगबे ये सप्संग कीजिए। कोई तर्मस्तान हो देवमंदिल हो या कोई हॉल,
कोई स्कूल का बैदान हो,
किसी का घर हो। अगर वो व्यक्ते प्रैम से निषकाम बाव से अपनी जगा इसके लिए देते हैं। उसको अनुबोदन करें जैसे ओन्लाइन सत्संग शुरू किया तो कोई-कोई लोगों को पता चल गया यहां से अगर जहां से ये सप्तंग इस जगह में क्या-क्या तक मुश्किल है?
तो व्यक्ति को पदा चला कि यहां लेक्ट्रिसिटी पावर सप्लाइ का प्रोब्लेम है। सुरंथ आके व्यवस्ता करा दें। इभी आप इन्वर्टरन डलवा दो। किसी को पता चला वाइफाई का प्रॉब्लेम है तो चलो उसका टावर परमिशन लेनी है या connectivity जो करनी है वो करा गया है तो ये सब अनुमोदन बोलते हैं इसका पुन्या अगनीत है लोग हैं आज भी,
बिना बताये वो आके मदद कर जाते हैं,
किसे को पता भी नहीं चलता। कौन यह कर गया?
तो ये भगवान के आप अपने आप व्यवस्तव हैं। वो सबको प्रेणा नहीं देते। जो पवित्रा आत्मा होती उनको ही प्रेणा बिलती है। वो अपना कुछ नहीं सोचते बस आके चुपचाप काम करी देते हैं अपने भगवाद क्या बगता है वो?
भगवार अनके द्वारा ये कारिया करा दें। इसको हम बोलते हैं अनुमोधर तो उस दिव का तो कल्याण अवश्य होगा ही होगा वो कहा कहीं जाके दिखाते नहीं कि हमने इतने पैसे दिये,
हमने ये दान किया,
हमने ये डलवा दिया,
हमने ये मदद किया,
वो कुछ नहीं होता है। अपना आप करते हैं,
प्रैप से बिना बताये करते हैं। ऐसे लोग भी हैं रशासनी यहों सब भगवान के वो बड़े पेये होते हैं। तो हे वसुदेव ये भागवत धर्म इसको कहते हैं कि जिन में अनुमोदन है। इसके प्रति अध्यन के प्रति सच्चंग के प्रति आदर है। पुर्ण आदर है। उनका कुद कानु मोधन है। सबी प्रकार की अनुकूलता व्यवस्ता कर देना कुछ ना कुछ contribution अपनी जगा कोई देते हैं,
कोई पैसे द्रव्य देते हैं,
कोई दूसरी तरफ से मदद करते हैं। इसी प्रकार सिखो। जैसे सादकों को बताया उसका प्रचार किया प्रचार किया यखने का आनुष्ट्यान किया अबलिक्टार ज्ञान यगन्या उसके व्योस्ता के इस साब अनुवोधर गोते हैं। ये सब भागवत धर्म के अंदर आते हैं। कारियम में मदद करना वो भी उस प्रकार से धर्म के तरमा कानो सरण होता है पेड़ शावन से,
पतल से,
सबरन से ऐसे किया किया जाने पर किया भागवत धर्म ततकाल ही विश्व के द्रोही को भी पविता कर देता है। इसका एक मतलब ये पवित्र करने वाला भागवत धर्म मनुश्योगो पवीत्र कर देता जीवन ही इसके लिए मुर्क मनुचे समस्ताने पवित्र होने की आवश्यक्ता है पवित्रता ही एक मात्र जीवन का देह है क्यों वो समसार में सरता रहता है समझ में नहीं आता है मैं है मेरा,
मैं है मेरा,
बस उसको यही दिखता है। पवितरता नाम की क्या चीज है आत्मकल्या नाम की क्या चीज है अपने सोजनों को इस रास्ते में कैसे लाना हो कुछ समझ में नहीं है कोई ग्ञान नहीं है होते ग्ञाम देंगे हो सबसे बड़ा साफ़दानी से कितना भी पैसा खर्चा करके अच्छी अच्छी फुल में अपने बच्चे को डालेंगे ये शिक्षा देंगे वो शिक्षा देंगे मार्ड बनाएंगे ये बनाएंगे वो पर लेकिन भागवत धर्म के नाम पर जीरो संस्काम के नाम पे जीरो ये हिंदुवों की तो विदुबाग्य ही हैं दुसरे संप्रंदाय वाले अपना कुछ तो सिखात है लेकिन हिंदु और ज़्यादा करके ऐसे पढ़े लिखे और धन्वान लो उनको तो कोई किमती नहीं है। बच्चों को क्या सीखा है कुछ नहीं। बात दो किकी बात एक स्लोक भी नहीं आता है बच्चे को उच्छे वेजनकाट कैसे ये शुची नाम श्रीमताम नहीं है ये कुटुम पैसा बले हो दन बले हो लेकिन शुची कुटुम नहीं है पवितर नहीं है तो पवित्र बनने के लिए अपना जीवन है मनुष्य जीवन कैसे अपने आपको हम पवित्र बना उसका उपाय कहते हैं वसुदेव जी को दाला जी समझा रहे हैं कि ये वसुदेव पवित्र बनाने वाला धर्म है इतने भी कोई भी पापी क्यों न हो उसको उनन्त पवित्र कर देता है। वया परमकल्यान पुण्यश्रवण कीर्थनना पारितो भगवान्यत्या देवो नारायणों बबा वहाँ परमकल्यान पुण्यश्रवनकीर्तनः वगवाँ बन दिया मारी तहां ममा मारीतः एवसु देवजी ये तो आपने मेरे पर बड़ी कृपा दिखे। वसुदेर जी ऐसा समझ रहे है कि नारद मुने की कृपा होगी। और मुझे उपदेश मिलेगा। लेकिन नारद मुनी कह रहे हैं वसंदेव जी आपकी मेरे पर बड़ी कृपा हो गई क्यों आपने इस प्रश्ना किया उसके निमिते से मेरे प्रिया भगवाईं नारायं परंकल्यानकारी भवान नारायं उसका तुमने मुझे स्मर्ण करा दिया। मारी तहा भगवान अध्याह तुमने मेरे भगवान का स्मर्ण करा दिया। मतलब भगवान धर्म से भिनना नहीं है धर्म भगवान से भिनना नहीं है बगवान का स्वरूपि धर्म है। उबर वाल काने देवा देवहा नारायणः,
राक्षात नारायणः। परमात्मा भगवान देवः परमकल्यानः पुन्यश्रवन केर्तनः भगवान का स्वरुप,
भगवान का चरित्र वार के नाम पुन्यश्रवणकीर्तना पुन्यकारी है। बगवान को याग करना उन्ने कका भगवान का नाम का शरुवन करना पुण्य का का भगवान के राम का कीर्तन करना पुन्य का कारण ऐसे पुन्य श्रमन कीर्तन हा परमकल्यानः जिनके चरित्र अथ्वा नाम सुनने या बान करने से ही पवित्र करने वाले उनके श्रोवन से किर्तन से हम पवित्र हो जाते हैं ऐसे वदम कल्यान सुरुफ परमात्मा भगवान नारायनू तुमने प्रया ए वसंदेव जी आपने मुझे मेरे उपर कृपा करके यात लिलाते उनने मुझे स्मरन्त करा दिया है कि मेरे उपर बड़ा उपकार किया है। को प्रसंद है। नावग मनी अभी अत्राब्युदाहरंतें अमितिहासं पुरातनं आध्यमानां चसंवादं विदेहस्य महात्वन अत्रा अत्रा मतलब इस विशे में महाराजा विदे विजेहर्स्यमहात्मनः आर्श माना चा समवादम। रुशा पुछ त्रोके सोभाद विदे और रुशपुत्रों के सहोहाद रूप इस प्राचिन इत्यास का उदारण देते हैं। इस विशे में,
मतलब जो ये प्रशन किया वसुदेव जी ने भागत धर्म के बारे में,
तो ये उपदेश देने की रीत क्या है?
तो वो भी सवमात के माध्यम से ही उपनेश देंगे.
तो किसका उदाहरण देते हैं?
इतिहास का उदारन देते हैं पुरातनम् भूटकाल में पूर्वा में जो इतिहास,
जो गटनाई बनी इस विशे में ऐसा ही प्रशन किसी का था और किसे ने उतर दिया तो वो समवात किसके मीच में है,
राजा विदे और रुशब पुत्र?
नो योगेश्वर उनके मीच में यही सम्वात्ते हैं। इसे विशे के बारे में सम्वात्ते हैं। इसलिए उनका उदारण लेते हैं। अत्र अपि उदाहरन्ति उदाहरन्ति इवं इत्यासं पुरातनं। तो वो इत्यास का हमें उदारण दे करते हैं। आच्छमारांचसंवादं विदेहस्यमहात्मनः। अभी ये विपार्वत धर्मों के बारे में। नारग मुनी जब वसुदेव जी को समझाना चाहते हैं,
उपदेश देना दा चाहते हैं,
तो किस माध्यम से वो उपदेश करेंगे?
तो याद दिलाते हैं पूर्व की गटना.
कौन सी गटना?
विदेह राजा और नव योगिश्वर के बीच में जो समवाद हुआ,
क्योंकि व उपदेश किया गया नो योगेश्वर के दारा राजा विदे को उसके बारे में हमें क्यों समझाएंगे कल देखेंगे ओम् पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदज्जते पूर्णस्त्यपूर्णमादायः पूर्णमेवावशिष्यते ओम् शान्ति शान्ति शान्ति अरिही ओम श्री गुरुब्यो लमः अरिही ओम