Namaste आप सबी का सत्र एक में स्वागत है। इस सत्र का शीशक है सत्य के चार मार्क। क्या कभी आपने ध्यान दिया है कि आध्यात्विक्ता के मामले में लोग कितने आलग-आलग होते हैं। कुछ लोगों को भजन गाना अच्छा लगता है। और कुछ लोगों को नाम समरन करना बहुत अच्छा लगता है। वो घंटों भक्ती में बैठे रह सकते हैं और उनका हिर्दे आनन्स पर जाता है। कुछ लोग उस से बिल्कुल आकरशित नहीं होते हैं। वे अपना समय लोगों की सहायता करने में,
किसी उद्धेशे की सेवा करने में या दुनिया में सकारात्मक परिवर्तन लाने में लगाना पसंद करते हैं। कुछ लोगों को ध्यान प्रिय होता है। उन्हें एक शान्ध कमरा थोड़ी नीरवता और एक घंटा बैटने का अफसर दे दीजिए,
फिर देखिए वे पूरीस तरह संतोष्ट हो जाते हैं। और फिर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो लाकतार प्रशन पूछते हैं। मैं कौन हूँ?
मैं यहां क्यूं हूँ?
छेतना क्या है?
सत्ते क्या है?
शायद आप मेंसे कुछ स्वैम को इन मेंसे किसी एक प्रवर्ती में पैचानते होंगे। सुन्दर बात यह है कि इन मेंसे कोई भी गलत नहीं है। वास्तव में प्राचीन रिश्यों ने इसे बहुत पहले ही समझा दिया था। उन्होंने देखा कि मनुश्या का स्वभाव भीन है। जो बात एक व्यक्ति को प्रेवित करती है,
वे दूसरे को बिल्कुल प्रेरीट नहीं करती। जो एक के हिर्दय को खुल देती है। कई दूसरी को इसके हिदे को छूकर भी न जाये। इसलिए उन्होंने सबी के लिए एकी मार्क पेंधारित नहीं किया। बल्कि सत्य तक पहुँचने के लिए चार प्रमुख मार्गों का वणण किया है। और मुझे ये बहुत अच्छी लगती है जो उन्होंने दी है। उन्होंने कहा कि सत्य एक परवद की तरह है। सत्ते एक शिकर है,
लेकिन वहां तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हैं। कोई उतर दिशा से बढ़ता है,
कोई दच्चिन दिशा से आता है। कोई गहने जंगलों से होकर घुमता फेरता वा मार्क चुनता है। रस्ते भले ही अलग-अलग दिखाईते हैं लेकिन सबी एक शिकर तक पहुंचते हैं। तो चली पहले ग्यान योग,
पहला मार ग्यान योग के बारे में बात करते हैं। ज्यानियोग वतलब ज्यान का मारक जब हम घ्यान शब्स सुनते हैं तो सामाने थे हमारी जानकारी पुस्तके,
पढ़ाई या अधिक बुद्धिवान बनना यादाता है। लेकिन यह मार्क उसके बारे में नहीं है। यह मार्क केवल एक प्रश्णी के बारे में है,
मैं कौन हूँ?
आप नाम नहीं हैं,
व्यवसाय नहीं हैं,
राश्वियेता नहीं हैं,
व्यक्तित्व नहीं हैं। वास्तब में आप कौन हैं?
तेरा सुर्ची बच्चपन से आपका शरीर बदल चुका है,
आपके विचार परते दिन बदलते हैं। बाहुनाया आती जाती रहती हैं। यहां तक कि आपकी मानेताएं भी समय के साथ बदलती रहती हैं। फिर भी एक चीज ऐसी है जो इन सब के बीच सद्धेव उपस्तित रही है। कुछ ऐसा जो हर अनुभव को देखता रहा है। ज्यान योग उसी की खुछ है। ये है उत्तर इकट्टे करने से अधिक गलत फैम्यों को हटाने की प्रक्रिया है। ये खिर्की की साफ करने जैसा है आप सूर्य का प्रकाश नहीं बनाते आप केवल उन फर्तों को हटाते हैं जो उसे डख रही हैं। अब चलिए दूसरी माँ के तरफ चलते हैं.
इस मारक का नाम है भखती योग.
प्रेमोड समर्पनकमार्ग यह मार्क पूरी तरह अलग है। इस मार का सादक सब कुछ समझने की कोशिश नहीं करता। वेतमस प्रेम में डूबना चाहता है। इश्वर प्रेम में। उसके लिए आध्यात्मिकता एक संबंध है। वे भजन गाता है,
प्रार्थना करता है। इश्वर का स्मर्ण करता है,
समर्पण करता है। यदि ज्ञान्योग पूछता है मैं कौन हूँ तो भक्तियोग पूछता है मैं कितनी घहराईसी ईश्वर से प्रेम कर सकता हूँ। और तब कुछ अद्बत गटे तो होता है। जैसे जैसे इश्वर प्रेम भडता है,
आएंकार छोटा होता जाता है। भीतर बनी दिवारें खुलने लगती हैं। अन्तत्य भक्त ये सुक्खोज लेता है। कि उसके और परमात्मा के बीच जो दूरी दिखाई देती थी विफासतमें कभी थी ही नहीं। चलिये थीसरी मा की तरफ चलते हैं जिसका नाम है कर्म यूग। कर्मकमार्क यह मार्क विशेश रूप से हमारे लिए महत्पुर्ण है क्योंकि हमें हम्मे से अधिकांच लोग अपना जीवन कारे करते वे बिताते हैं। हमारे पास नौकरी है,
परिवार है,
जिम्मेधारिया है,
मीटिंग्स हैं,
सीमाएं हैं,
परियूजनाएं हैं। कर्मियों की सुन्दर्त्या यह है कि आप से जीवन छोड़ने के लिए नहीं कहता। यह आप से नहीं कहता कि जीवन छोड़ना है। पलकि यह कहता है कि आप अपने जीवन को ही साधना बना लो। अपना कारे करो,
लोगों की सेवा करो,
अपनी जिम्मेधारिया निपाओ। लेकिन अपनी खुशी को परिर्णाम पर निर्भर मत बनाओ। हमारे अधिकाश दुख का कारण आ सकती है। हम काम करते हैं और तुरंद पूछने लगते हैं,
क्या मुझे पहचान मिलेगी?
क्या मैं सफल हो जाऊँगा?
क्या लोग मेरे थारीफ करेंगे?
क्या मुझे वो मिलेगा जो मैं चाहता हूँ?
कर्मयोग ये सिखाता है पूरे मन से करम करो और फिर छोड़ दो। अपना सर्वशेष्टू फल अरपित कर दो और आगे बढ़ जाओ। जब ऐसा होता है तो काम हलका लगने लगता है। सेवा आननद बन जाती है। और धीरे धीरे एंकार की पकड़ धीली होने लगती है। चलिए अब छौते मार्क की बारे में चर्चा करते हैं। चौता मारग है या राज योक। राज्यूक मतलब ध्यान का मार्क। आजकल अधिकांश लोग इसी मार्ड से परिछते हैं। इसका मूल अवलोकन बहुत सरल है। अधिकांश लोगों का मन कभी रुकता नहीं। एक विचार आता है,
फिर दूसरा आता है,
फिर तीसरा आता है। हम लगतार अतीत को दोराते रहते हैं या फिर बाविशे की कल्पना करते रहते हैं। पर याराज्योग हमें स्थिर होना सिखाता है। श्वास,
एकागरता,
अनुसाशिन और ध्यान के माध्यम से मन दिरे दिरे शांत होने लगता है। खल्पना कीजे कि आप किसी जील पर तेज हावा चल रही हैं। पानी की सत्य विचलित है। अब उसमें कुछ सपष्ट नहीं दिखाई दे रहा। अब उसी जील को पून्ते शांत होते हुए देखिए अचानक सब कुछ स्पर्ष्ट प्रतिबिन बित उन्हें लगता है। मन भी ठीक ऐसा है,
जब शांत होता है तो वास्तविकता सपश दिखाई देने लगती है। और उसी निरवता में हम उस शांती को खूजते हैं जो हमेशा से वही थी। पच विशारों के शोर से कहीं छिपी वै थी। यदि पुझे इन चार मार्कों को एक साथ,
एक वाक्य में,
संख्षिप में कहना हो,
तो मैं कहूँगा भकती के मार्क पर शित्य पिखलता है। कर्म के मार्क पर एंकार नर्म पढ़ता है। ध्यान के मारक पर मन शान्त हो जाता है। और घ्यान के मार्क पर अलगाव का भ्रम मेट चाता है। मार्ग अलग हैं?
लेकिन गंतवे एक ही है। अब आपके मन में यह प्रश्ना आ सकता है कि यदि चारो मार्ग इतने सुन्दर हैं,
तो इस पाठे क्रम में हम विशेस रूप से ग्यान मार्ग पोय की क्यों ध्यान दे रहे हैं?
क्योंकि जीवन में किसी न किसी समय लगबग हर मनुषे इस गहरे प्रेशन से तक्राता है। शायद आपने सफलता प्राप्त कर ली हो,
शायद आपने एक अच्छा करियर बना लिया हो। शायद आपने बहुत से अनुभरोज उठा लिये हो,
शायद आपने ने ये सब हासिल कर लिया हो जो आपको पून देने वाला लगता था.
फिर भी बीतर कहीं एक रश्न उड़ता है। वस क्या इतना ही है?
मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?
मुझे सच में क्या चाहिए?
अधिकाश लोग सोचते हैं कि वे धन,
संबन्त,
सुरक्षा या सफलता की खोच कर रहे हैं। लेकिन दी आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि वास्तब में आप स्थायी शांति की खोच कर रहे हैं। स्थायी संतोष की खोज करें। ऐसी किसी चीज की खोश कर रहे हैं?
जो आये और जाये ही नहीं। घ्यान मार्घ यहीं से आरम होता है। उत्तरों से नहीं,
इमान्दार प्रश्नों से। और इस माँ के सबसे अनुखी बात है कि ये आप से किसी बात पर विश्वास करने को नहीं कहता। यह आपसे कोई नई पैचान अपनाने को नहीं कहता,
यह आपसे किसी धर्म में शामिल होने के लिए नहीं कहता। ये केवल इतना कहता है कि देखो। उत्ते अनुभाव को देखो,
जो बदलता है उसे देखो। जो बना रहता है उसे देखो। उस जाग्रूक्ता को देखो। तो इस चार में उपस्तेत है। जैसे जैसे हम इस पाटेक्रम में आगे बढ़ेंगे हम उसे साथ मिलकर खोजेंगे। एक दर्शन के रूप में नहीं,
एक विश्वास प्रणाली के रूप में नहीं। बल्कि एक प्रत्यक्ष जाज के रूप में। कि हम वास्तब में है कौन?
और शायद सबसे बड़ी खोज जो हमारा इंतजार कर रही है वै यह है आप सत्य की ओर नहीं बढ़ रहे हैं। आप स्वेम सत्य हैं। जो कुछ समय के लिए अपनी वास्तिक प्रकृति को भूल गया है?
अब उसे पुने स्मरण कर रहा है। यही यात्रा है और यहीं से हमारी शुरुवात होगी। आज के लिए इतना ही धन्यवाद अगले सत्र में फिर मिलेंगे। नमस्का