नमस्ते आज हम शिव को किसी मूर्ती या कथा में नहीं बल्की चेतना के रूप में अनुभव करेंगे आराम से बैठ जाएं रीड की हड़ी को एकतम सीधा कर लें शरीर एकतम स्थिर आखे धीरे से बंद करें और एक गहरी सास अंदर लें धीरे से गहरे श्वास को बाहर छोड़ दें फिर से अंदर भरें और एक बार फिर से श्वास को बाहर छोड़ दें अब अपनी सासों को स्वाभाविक होने दें कल्पना करें आप हिमाले की उचाई पर बैठें हैं चारो ओर शान्ती,
सफेद बर्फ और नीला आकाश है हवा ठंडी ठंडी बह रही है लेकिन भीतर एक इस्थिर गर्माहट है आप अकेले नहीं हैं आपके पीछे एक विशाल मोन उपस्थिती है वेह कोई आकृति नहीं है वेह एक उर्जा है गहरी,
इस्थिर और अनंत वही शिव तत्व है महसूस करें वेह मोन आपके भीतर उतर रहा है आपकी सांस धीमी हो रही है विचार आते हैं और उसी मोन में विलीन हो जाते हैं शिव का अर्थ है जो देख रहा है लेकिन उलज नहीं रहा अब ध्यान अपनी ब्रो मध्ये पर लाए दोनों भोहों के बीच जहां आप बिंदी या तिलक करते हैं वहां एक बिंदु की कलपना करें गहरा,
नीला,
शांत,
इस्थिर हर सांस के साथ वहां बिंदु हलका चमक रहा है मन ही मन जपें ओम नमः शिवाई धीरे,
बिना जोर दिये ओम नमः शिवाई हर जप के साथ मन और शांत,
और गहरा होता जा रहा है अब जप भी छोड़ दे बस शुन्यता में बैठे कोई पहचान नही,
कोई भूमिका नही कोई कहानी नही सिर्फ साक्षी,
यही शिव है महसूस करें,
आपके भीतर जो इस्थिर है वहे कभी बदलता नही,
वही आपका असली स्वरूप है धीरे,
धीरे,
अपनी सास को थोड़ा गहरा करे शरीर को महसूस करे हथेलिया रगडे उन्हें अपनी आखो पर रखे और जब आप तैयार हो तो धीरे से अपनी आखो को खोले याद रखे,
शिव बाहर नही आपके भीतर का मोन है जब भी जीवन शोर करे उस मोन में लोटाईए हर हर महदेद